संपादकीय: इंडिया स्पीक डेली (India Speak Daily)
भारत के मध्यमवर्ग और आम आदमी को ‘मूर्ख’ समझने की एक सुव्यवस्थित परंपरा चल पड़ी है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में युद्ध की चिंगारी उठती है, भारतीय तेल कंपनियों के मुख्यालयों में ‘घाटे’ का मातम मनाया जाने लगता है। पश्चिम एशिया के तनाव के बीच एक बार फिर माहौल तैयार किया जा रहा है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाना अपरिहार्य है। लेकिन क्या यह घाटा वास्तविक है या यह आंकड़ों की बाजीगरी के पीछे छिपा मुनाफे का एक बड़ा पहाड़ है? आइए, तथ्यों के आईने में इस तिलिस्म को तोड़ते हैं।
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तेल का खेल करके मालामाल हो रही है सरकार और इनके यार और जनता को थमाते है केवल जुमले
इस समय सत्ता इतिहास के धूर्ततम आदमी के हाथ में है, जिसका काम मध्यम वर्ग का खून चूसना है।
रोज १६ किलोमीटर का commute करके अपने कार्यस्थल पर जाता हूँ। मुझ जैसे मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाले व्यक्ति का सरकार कुछ नहीं सोचती। MoNa कहती है कि हमें पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक विकास ले जाना है। तुम्हारा बस चले तो हम मध्यम वर्गीय को भी गरीब बना डालो, बस किसी तरह से मध्यम वर्गीय कर्मठ होने के कारण बचा हुआ है।
गडकरी ने कैसे २० प्रतिशत इथैनॉल मिलाने का नियम लागू करके अपने बेटे को लाभ पहुँचाया, ये तो हम देख ही चुके। साथ ही गाड़ियों के इंजन भी खराब होंगे।