यह ‘India Speak Daily’ के लिए एक विशेष खोजपरक लेख (Investigative Feature) है, जो व्यापमं घोटाले की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहाँ न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी ने ‘मोहरों’ को तो देख लिया, लेकिन ‘शहंशाहों’ तक पहुँचते-पूँछते उसकी धार कुंद हो गई।
विशेष संपादकीय, India Speak Daily. कल, 26 मार्च 2026 को जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और मध्य प्रदेश सरकार से व्यापम घोटाले पर ‘स्टेटस रिपोर्ट’ तलब की, तो एक बार फिर वही पुराना सवाल गलियारों में गूंज उठा— क्या इस बार न्याय का हाथ उन गिरेबानों तक पहुँचेगा जिन्हें ‘रसूख’ और ‘संगठन’ की ढाल ने अब तक बचाए रखा है?
व्यापमं घोटाला भारत के न्यायिक इतिहास का वह पन्ना है जहाँ जांच की आंच ने छोटे कर्मचारियों और बिचौलियों को तो झुलसा दिया, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे ‘शहंशाह’ आज भी बेदाग होने का दंभ भर रहे हैं।
मोहरों की बिसात: बलि के बकरे!
व्यापमं की जांच में सबसे पहले गाज गिरी उन ‘मोहरों’ पर जिन्होंने सिस्टम के भीतर रहकर फाइलें घुमाईं और ओएमआर शीट से छेड़छाड़ की।

- नितिन महिंद्रा और पंकज त्रिवेदी: व्यापमं के ये अधिकारी जेल की सलाखों के पीछे सड़ते रहे। ये वे ‘तकनीकी ऑपरेटर’ थे जिन्होंने आदेशों का पालन किया, लेकिन उन ‘आदेश देने वालों’ की पहचान फाइलों में धुंधली कर दी गई।
- सैकड़ों छात्र और अभिभावक: वे छात्र जो डॉक्टर बनने का सपना देख रहे थे, आज अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। इनमें से कई ने जेल काटी, कइयों का करियर बर्बाद हुआ और कई ‘रहस्यमयी’ तरीके से दुनिया छोड़ गए। व्यवस्था ने ‘मछलियों’ को तो पकड़ा, लेकिन ‘मगरमच्छ’ पानी में सुरक्षित रहे।
शहंशाहों’ की ढाल: सत्ता और संगठन का संरक्षण!
इस घोटाले की असली कहानी उन डायरियों और एक्सेल शीट में दर्ज थी, जिन्हें जांच एजेंसियों ने ‘साक्ष्य के अभाव’ का नाम देकर ठंडे बस्ते में डाल दिया।
- सुरेश सोनी (RSS): संघ के तत्कालीन सह-सरकार्यवाह का नाम सुधीर शर्मा की डायरी में दर्ज होना और हवाई टिकटों के भुगतान के सबूत मिलना, क्या एक गंभीर अपराध नहीं था? लेकिन ‘संगठनात्मक दबाव’ और ‘जांच की सुस्ती’ ने उन्हें एक ऐसी ‘क्लीन चिट’ दिलाई, जिसे व्हिसलब्लोअर्स आज भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं।
- शिवराज सिंह चौहान (तत्कालीन मुख्यमंत्री): “CM” शब्द वाली एक्सेल शीट का विवाद सालों तक चला। डिजिटल फॉरेंसिक एक्सपर्ट प्रशांत पांडे ने चीख-चीख कर कहा कि साक्ष्यों से छेड़छाड़ हुई है, लेकिन सत्ता की मशीनरी ने उन आवाजों को दबा दिया।
- गुलाब सिंह किरार: संघ के करीबी और राज्य मंत्री रहे किरार का नाम एफआईआर में होने के बावजूद वे लंबे समय तक ‘फरार’ रहे। यह सत्ता का ही संरक्षण था कि वे जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर रहे।
‘इन्वेस्टिगेटिव’ सवाल: क्या सीबीआई ने सच दबाया?
सीबीआई, जिसे ‘स्वतंत्र’ एजेंसी कहा जाता है, व्यापमं मामले में अक्सर ‘बचाव की मुद्रा’ में दिखी।
- डायरी बनाम गवाही: सुधीर शर्मा की डायरी में दर्ज नाम और रकम के पुख्ता होने के बावजूद, उन नेताओं से कड़ी पूछताछ क्यों नहीं की गई?
- मौतों का रहस्य: 50 से अधिक संदिग्ध मौतों को ‘प्राकृतिक’ या ‘दुर्घटना’ बताकर फाइलों को बंद कर देना क्या न्याय के साथ क्रूर मजाक नहीं था? पत्रकार अक्षय सिंह की मौत का सच आज भी उनकी आँखों में ठिठका हुआ है।
व्हिसलब्लोअर्स: बिना सेना के योद्धा
इस पूरी लड़ाई में अगर कोई ‘नायक’ बनकर उभरा, तो वे थे डॉ. आनंद राय और आशीष चतुर्वेदी। इनके पास सत्ता नहीं थी, सुरक्षा के नाम पर जासूसी करने वाली पुलिस थी और घर के बाहर खड़ी मौत थी। लेकिन इनकी जिद्द ने ही ‘व्यापमं’ को एक सियासी मुद्दा बनाए रखा। कल का सुप्रीम कोर्ट का आदेश इन्हीं ‘अकेले योद्धाओं’ की जीत का पहला पड़ाव है।
व्यापमं घोटाला: न्याय का तराजू (2013-2026)
| श्रेणी | नाम और पद | मुख्य आरोप | वर्तमान स्थिति (कल के सुप्रीम कोर्ट आदेश के आलोक में) |
| सत्ता के शीर्ष (छूटे हुए) | शिवराज सिंह चौहान (तत्कालीन मुख्यमंत्री) | एक्सेल शीट में “CM” नाम का उल्लेख और प्रशासनिक संरक्षण का आरोप। | क्लीन चिट: सीबीआई और विशेष अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में क्लीन चिट दी। विपक्ष अब भी ‘डिजिटल टेम्परिंग’ का आरोप लगा रहा है। |
| संगठन के रसूखदार (राहत प्राप्त) | सुरेश सोनी (तत्कालीन सह-सरकार्यवाह, RSS) | सुधीर शर्मा की डायरी में नाम और नियुक्तियों में सिफारिश करने का आरोप। | जांच बंद: एसटीएफ ने 2014 में ही क्लीन चिट दे दी थी। वर्तमान में संघ की कार्यकारिणी में मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। |
| राजनीति का चेहरा (सजा/दोषी) | लक्ष्मीकांत शर्मा (दिवंगत पूर्व शिक्षा मंत्री) | घोटाले के मुख्य राजनीतिक मास्टरमाइंड। ओएसडी के जरिए सिफारिशें भेजने का आरोप। | निधन: लंबी जेल और कानूनी लड़ाई के बाद कोरोना काल में उनका निधन हो गया। उनके खिलाफ मामले बंद कर दिए गए। |
| सिंडिकेट का फाइनेंसर (जेल/जमानत) | सुधीर शर्मा (खनन माफिया) | नेताओं और अधिकारियों के बीच अवैध धन के लेन-देन और फंडिंग का मुख्य सूत्रधार। | जमानत पर: कई साल जेल में बिताने के बाद वर्तमान में जमानत पर हैं। कल के फैसले के बाद उनकी फाइलें दोबारा खुल सकती हैं। |
| प्रशासनिक मोहरे (दोषी) | पंकज त्रिवेदी और नितिन महिंद्रा (व्यापमं अधिकारी) | परीक्षा प्रणाली और कंप्यूटर डेटा में सीधे तौर पर हेरफेर करने के मुख्य आरोपी। | दोषी/जेल: कई मामलों में सजा काट चुके हैं और अभी भी अन्य मामलों में ट्रायल का सामना कर रहे हैं। |
| रसूखदार लाभार्थी (जांच के घेरे में) | गुलाब सिंह किरार और पुत्र शक्ति सिंह | अपने बेटे को धोखाधड़ी से पीएमटी (PMT) परीक्षा में टॉप कराने का सीधा आरोप। | फरार/जमानत: लंबे समय तक फरार रहने के बाद सरेंडर किया था। वर्तमान में कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। |
| व्हिसलब्लोअर्स (संघर्षरत) | डॉ. आनंद राय और आशीष चतुर्वेदी | घोटाले का पर्दाफाश करना और ‘एक्सेल शीट’ के सच को सामने लाना। | अजेय: जानलेवा हमलों और कानूनी मुकदमों के बावजूद अभी भी सुप्रीम कोर्ट में ‘बड़ी मछलियों’ के खिलाफ लड़ रहे हैं। |
निष्कर्ष: 2026 की नई उम्मीद
व्यापमं का जिन्न अब दोबारा नहीं सोएगा। सुप्रीम कोर्ट की ‘स्टेटस रिपोर्ट’ की मांग इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका अब ‘मोहरों’ की कुर्बानी से संतुष्ट नहीं है। यदि इस बार भी ‘शहंशाहों’ की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो आने वाली नस्लें कभी इस सिस्टम पर भरोसा नहीं करेंगी।
“न्याय में देरी, न्याय की हत्या है, और व्यापमं में यह हत्या सरेआम हुई है।”
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