श्वेता पुरोहित एक उपदेशप्रद दृष्टान्त किसी संयुक्त परिवार में दो स्त्री-पुरुष, उनके पाँच लड़के और दो लड़कियाँ थीं। लड़कों का विवाह हो चुका था। उनमें से चारके बाल-बच्चे भी थे। लड़कियाँ दोनों क्वारी थीं। सबसे छोटे लड़के का ब्याह कुछ ही दिन पहले हुआ था। उसकी स्त्री अभी मैके में ही थी। इस प्रकार दोनों लड़कियोंको मिलाकर घरमें कुल सात स्त्रियाँ थीं। वे चाहतीं तो सब मिलकर घरका काम-काज अच्छी तरह कर सकतीं थीं; परन्तु उनकी आपसमें बनती न थी। वे एक दूसरीसे जला करती थीं और घरके काम-काजसे जी चुराती थीं। उनमें से प्रत्येक यही चाहती कि उसे कम-से-कम काम और अधिक-से-अधिक आराम मिले।
आये दिन उनमें तू-तू, मैं-मैं हो जाया करती थी; घरमें अशान्ति और कलहका साम्राज्य था। इसी परिस्थितिमें सबसे छोटे लड़केकी स्त्री भी अपने मैकेसे आ गयी। वह उत्तम घरानेकी लड़की थी। उसे बचपनसे ही बड़ी अच्छी शिक्षा मिली थी। वह अपनेको उस क्षुब्ध वातावरणमें पाकर घबरा उठी। अपनी सास और जिठानियोंको आपसमें लड़ते-झगड़ते देख वह एक दिन रो पड़ी और अत्यन्त आर्त होकर मन-ही-मन भगवान्से प्रार्थना करने लगी- ‘प्रभो! क्या यही सब देखने-सुननेके लिये मुझे आपने इस घरमें भेजा है? यहाँ तो मैं एक दिन भी न रह सकूँगी। मुझे रात-दिनका झगड़ा अच्छा नहीं लगता। न जाने मैंने पिछले जन्मोंमें ऐसे कौन-से दुष्कर्म किये हैं, जिनके कारण मेरा इस घरमें ब्याह हुआ है?’ रोते-रोते उसकी आँख लग गयी। उसे स्पष्ट सुनायी दिया मानो उसे कोई सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें कह रहा है- ‘बेटी! घबरा मत, इस घरका सुधार करनेके लिये ही तुझे यहाँ भेजा गया है। तुझ जैसी लड़कीकी यहाँ आवश्यकता थी।’
इन शब्दोंको सुनकर छोटी बहूको बड़ी सान्त्वना मिली। उसकी सारी घबराहट जाती रही। उसने मन-ही-मन अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया। उसने कलहका मूल जानना चाहा। उसे मालूम हुआ कि उसकी सास और जिठानियों तथा ननदोंने आपसमें घरका काम बाँट लिया है। सास और ननदें ऊपरका काम करती थीं और बहुएँ पारी-पारीसे भोजन बनातीं। और-और कामोंके लिये भी पारी बाँध ली गयी थी; परन्तु यदि उनमेंसे दैवात् कोई बीमार हो जाती तो दूसरी बहुएँ उसके बदलेका काम करनेमें आनाकानी करतीं। वे उसपर बहानेबाजीका आरोप करतीं और अनेक प्रकारके आक्षेप करतीं। लड़ाईका दूसरा कारण यह होता कि जब कभी घरमें बाहरसे कोई खाने-पीनेकी चीज आती तो सब-की-सब यह चाहतीं कि अच्छी-से-अच्छी चीज अधिक-से-अधिक मात्रामें मुझे मिले। बस, इसीपर झगड़ा शुरू हो जाता और आपसमें गाली-गलौजतककी नौबत आ जाती। कभी-कभी मामूली बातोंको लेकर बखेड़ा खड़ा कर लिया जाता। यदि कभी एक भाईका लड़का दूसरे भाईके लड़केसे लड़ पड़ा तो इसीपर दोनोंकी माताएँ एक दूसरीको खूब खोटी-खरी सुनातीं। इन सब बातोंको देखकर छोटी बहूको बड़ा दुःख हुआ। जिस दिन उसने भगवान्का आदेश सुना, उसी दिनसे वह झगड़ा मिटानेका उपाय सोचने लगी। उसने सोचा कि भगवान्ने इसी बहाने उसे सेवाका बड़ा ही सुन्दर अवसर प्रदान किया है। वह एक दिन चुपकेसे अपनी सबसे बड़ी जिठानीके पास गयी। उस दिन उसकी सबेरे रसोई बनानेकी पारी थी। उसने जिठानीसे कहा- ‘जिठानीजी ! मैं आप सबसे छोटी हूँ। मेरे रहते आप रसोई बनायें- यह उचित नहीं मालूम होता। फिर आपको तो बाल-बच्चोंकी भी सँभाल करनी पड़ती है। मेरे जिम्मे और कोई काम है नहीं। इसलिये बड़ा अच्छा हो यदि आप अपनी रसोई बनानेकी पारी मुझे दे दें। मैं आपका बड़ा उपकार मानूँगी।’ जिठानी पहले तो बड़ी देरतक आनाकानी करती रही। वह बोली- ‘बहू! अभी तो तुम्हारे खाने-पहननेके दिन हैं। जब कुछ सयानी हो जाओ, तब चूल्हा फूंकनेके काममें पड़ना। अभी कुछ दिन आराम कर लो, गृहस्थीका सुख भोग लो। आखिर तो यह सब करना ही है।’ छोटी बहूने कहा – ‘जिठानीजी! मैं आपके पैरों पड़ती हूँ, मुझे इस तरह निराश न करो। यही दिन तो मेरे काम करनेके हैं। अभीसे यदि मुझे आपलोग आरामतलब बना देंगी तो आगे जाकर मैं किसी कामकी न रह जाऊँगी। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण मुझे आप अपने अधिकारसे वंचित कर रही हैं।’ यह कहकर वह रोने लगी। अब तो जिठानी और अधिक उसकी बातको न टाल सकी।
उसने अपनी पारी उसे दे दी। इस प्रकार क्रमशः उसने सभी जिठानियोंसे अनुनय-विनय करके उन सबकी पारी ले ली।
यह काम अपने जिम्मे लेकर वह इतनी प्रसन्न हुई मानो उसे कोई निधि मिल गयी हो। वह प्रतिदिन सबेरे बड़े चावसे सबके लिये रसोई बनाती और सबको खिला-पिलाकर अन्त में स्वयं भोजन करती। उसे ऐसा करनेमें तनिक भी थकान नहीं मालूम होती, बल्कि उसे इसमें बड़ा सुख मिलता। वह दिनोदिन दूने उत्साहसे इस कामको करने लगी। वह रसोई भी बहुत अच्छी बनाती और फुर्तीसे बनाती। बात-की-बातमें बहुत-सी सामग्री तैयार कर लेती। यदि कभी कोई मेहमान भी आ जाते तो वह उकताती न थी। उन्हें भी बड़े प्रेमसे भोजन कराती; क्योंकि वह इसमें अपना लाभ समझती थी। उसकी इस अद्भुत लगन एवं सेवाभाव को देखकर सभी कोई उसकी प्रशंसा करने लगे।
एक दिन उसकी सास उसके पास आयी और बोली
- ‘बेटी! तूने यह क्या किया? सबकी पारी अपने जिम्मे क्यों ले ली?’ उसने बड़ी नम्रतासे उत्तर दिया- ‘माताजी ! मेरे माता-पिताने मुझे यही शिक्षा दी है कि यह शरीर तो एक दिन मिट्टीमें मिल जानेवाला है। इसे अधिक-से-अधिक दूसरोंकी सेवामें लगाना चाहिये। यही इसका सबसेअच्छा उपयोग है। सेवा ही सबसे बड़ा धन है। अतः आपसे भी मेरी यही प्रार्थना है कि आप मुझे इस कामके लिये बराबर उत्साह दिलाती रहें।’ उसका यह उत्तर सुनकर सास चकित हो गयी। उसने सोचा कि यह तो कोई देवी है, किसी मानुषीका ऐसा सुन्दर भाव हो ही नहीं सकता।
दूसरे दिन ससुरजी बहुओं को देनेके लिये बहुत-सी
साड़ियाँ लाये। उन्होंने प्रत्येक बहूको वर्षभर के लिये बारह-बारह साड़ियाँ दीं। छोटी बहू अपने हिस्सेकी साड़ियोंमें से दो साड़ियाँ लेकर अपनी सबसे बड़ी जिठानीके पास गयी और विनयपूर्वक बोली- ‘जिठानीजी ! मुझे यहाँ आते समय पिताजी ने बहुत-सी साड़ियाँ दी थीं। मेरा उनसे अच्छी तरह
काम चल सकता है। आप मुझ पर दया करके ये दो साड़ियाँ अपने लिये रख लीजिये। मुझे इससे बड़ा सुख मिलेगा और मैं आपका बड़ा अहसान मानूँगी।’ जिठानीने बहुत आनाकानी की, परन्तु उसका अत्यधिक आग्रह देखकर वह उसे अस्वीकार न कर सकी। इसी प्रकार आग्रह करके
उसने दो-दो साड़ियाँ अपनी अन्य जिठानियों को तथा दो अपनी सास को दीं और एक-एक साड़ी अपनी ननदों को दे दीं। उसके इस औदार्यपूर्ण व्यवहारकी भी सबके मनपर गहरी छाप पड़ी। सासके पूछनेपर उसने कहा- ‘माताजी ! मैं इस कार्य में भी आपकी मदद एवं प्रोत्साहन चाहती हूँ।
शरीरकी भाँति ये वस्त्र आदि भी क्षणभंगुर हैं। इनका संग्रह आत्मकल्याण में बाधक है। जीते-जी मोह एवं आसक्ति आदिके कारण इनमें फँसावट हो जाती है और मरते समय भी यदि इनमें मन अटका रहा तो प्रेत आदि योनियों में भटकना पड़ता है। सेवा के काम में लगाना ही इन सबका सर्वोत्तम उपयोग है। नहीं तो एक दिन ये यों ही नष्ट हो जायेंगी।’ सास उसका यह उत्तर पाकर बहुत प्रसन्न हुई और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगी।
इधर घरमें पैसा भी बढ़ गया। ससुरजी ने प्रत्येक बहू को छः-छः गहने तैयार कराके दिये। छोटी बहूने अपने हिस्से के गहनों को भी अपनी चारों जिठानियों और ननदों में बाँट दिया और अपने लिये उसने एक भी न रखा। पूछने पर उसने यही कहा कि ‘मेरे पास अपने पिताजी के दिये हुए बहुत-से गहने पड़े हैं। मेरे लिये उतने ही पर्याप्त हैं।’ इस प्रकार उसने अपने साधु व्यवहार एवं उदारता से सभी के हृदय में स्थान कर लिया। सभी उससे अत्यधिक सन्तुष्ट थे।
फिर एक दिन मौका देखकर उसने अपनी बड़ी जिठानी से सायंकाल की रसोई बनाने की भी आज्ञा माँगी। उसने कहा- ‘मेरे रहते आप रसोई बनाने का कष्ट करें, यह मेरे लिये बड़ी ही लज्जा की बात है।’ वह इस प्रकार कह ही रही थी कि उसकी सास वहाँ आ पहुँची। वह बड़ी उत्सुकता से अपनी बड़ी बहूसे पूछने लगी- ‘यह किस बातके लिये आग्रह कर रही है?’ जब उसे मालूम हुआ कि छोटी बहू सायंकाल की रसोई भी अपने ही हिस्से में कर लेना चाहती है, तब तो वह हँसकर बोली- ‘तुमलोग अपनी इस छोटी देवरानी से सावधान रहना। यह तुमलोगों से वास्तविक लाभ की वस्तु ठग लेना चाहती है।’ बड़ी बहू सासके अभिप्राय को न समझकर बोल उठी- ‘सासजी ! आप यह क्या कह रही हैं? आपकी यह छोटी बहू तो बड़ी ही साध्वी है, सब प्रकार प्रशंसा के योग्य है। इसके सम्बन्ध में आप ऐसी बात कैसे कह रही हैं?’ सासने कहा- ‘तुम समझी नहीं। यह हमलोगों की सेवा करके हमें गहने-कपड़े तथा शारीरिक आराम आदि तुच्छ वस्तुएँ देकर बदले में तप आदि हमारी आध्यात्मिक कमाई-जो आत्मोद्धार में सहायक है, हमसे छीन रही है। इससे बढ़कर ठगई और क्या होगी? इसने मुझे एक दिन बताया था कि दूसरों की सेवा करनेसे अन्तःकरण शुद्ध होकर आत्मकल्याण में समर्थ हो जाता है। इसने यह भी कहा था कि शुद्ध भाव से रसोई के रूपमें घरवालों की सेवा करनेसे एक ही सालमें कल्याण हो जायगा। इसलिये बहू ! सायंकाल की रसोई का काम तो मैं अपने जिम्मे लूँगी। मुझे भी तो आत्मा का कल्याण करना है। मैं ही उससे वंचित क्यों रहूँ?’ सास की यह बात सुनकर सबकी आँखें खुल गयीं। फिर तो सबको अपने-अपने कल्याण की फिक्र पड़ गयी। कहाँ तो सब-की-सब काम से जी चुराती थीं और छोटी बहू के एक समय की रसोई का भार अपने सिर पर ले लेने से एक प्रकार के सुख एवं सुविधा का अनुभव करती थीं; इसके विपरीत अब सबने अपनी-अपनी सबेरेकी रसोई बनाने की पारी छोटी बहूसे वापस ले ली। जहाँ काम को लेकर कुछ ही दिन पहले सबमें झगड़ा होता था, अब सब-की-सब बड़े उत्साह एवं दिलचस्पी के साथ अपने-अपने हिस्से का काम करने लगीं। छोटी बहूका उपाय काम कर गया।
जब छोटी बहूने देखा कि ये लोग कोई भी अब रसोई का काम मुझे नहीं सौपेंगी, तब उसने सेवाका दूसरा ढंग सोचा। उसने विचार किया कि घर में रोज आठ-दस किलो आटे की खपत है, वह सारा-का-सारा बाजार से खरीदा जाता है। इससे तो अच्छा है कि मैं बड़े सबेरे उठकर स्वयं गेहूँ पीस लिया करूँ। इसमें कई लाभ हैं। जो आटा बाजार से आता है, वह प्रायः पुराने घुने हुए गेहुँओं का होता है। उसमें मिट्टी मिली हुई रहती है। फिर कलकी चक्कियों में जो आटा पिसता है, उसका सार मारा जाता है। वह स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। मेरी जिठानियों ने रसोई का काम तो मुझ से वापस ले लिया। अब आत्मकल्याण के लिये मुझे यही काम करना चाहिये। उसने तुरंत यह प्रस्ताव अपने पति के सामने पेश कर दिया। तुरंत गेहूँ की व्यवस्था हो गयी। बाजार से आटा खरीदना बंद कर दिया गया। छोटी बहूने दिन में गेहूँ साफ करके रख दिये और दूसरे दिन सबेरे ही मुँह-हाथ धोकर वह गेहूँ पीसने के काम में जुट गयी। शरीर स्वस्थ एवं सबल था और मन उत्साह से भरा था। काम करने का अभ्यास था। बात-की-बातमें उसने आठ-दस किलो गेहूँ पीसकर रख दिये। सास को जब इस बातका पता लगा तो वह दौड़ी हुई छोटी बहू के पास आयी और बोली- ‘बहू! यह आत्मकल्याण का कोई नया तरीका ढूंढ़ निकाला है क्या?’ बहूने गद्गद स्वर में कहा- ‘माताजी ! जिठानियों ने रसोई बनाने का काम तो मुझसे वापस ले लिया। इसलिये मुझे आत्मकल्याण का यह दूसरा मार्ग ढूँढ़ना पड़ा। इसमें शारीरिक श्रम अधिक है। इसलिये जहाँ आध्यात्मिक लाभ के लिये रसोई का काम करने से सालभर में आत्मा का कल्याण होता, वहाँ आटा पीसने से छः ही महीनों में काम बन जायगा। फिर इसमें दुहरा लाभ है। आत्मा का कल्याण तो होता ही है, साथ-ही-साथ शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है, जिससे शरीर में फुर्ती और बल आता है तथा शरीर नीरोग रहता है। इससे गर्भवती स्त्रियों को प्रसव भी जल्दी और सुखपूर्वक होता है। घरवालोंको शुद्ध आटा मिलता है, जिससे उनके स्वास्थ्य और मन दोनों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इन सब कारणों से यह काम मेरे लिये अत्यन्त श्रेयस्कर है। आशा है, आप मेरे इस काम में मेरी सहायता करेंगी।’ अब तो सास अपनी छोटी बहू को गुरुवत् मानने लगी। उसकी एक-एक बात उसको सारगर्भित प्रतीत होने लगी। वह उसके प्रत्येक कार्य को गौरव की दृष्टि से देखने लगी और स्वयं भी उसीका अनुकरण करने की चेष्टा करने लगी। जहाँ छोटी बहूने पहले दिन सबेरे छः बजे आटा पीसने का कार्य आरम्भ किया था, वहाँ यह दूसरे दिन पाँच ही बजे उस काम में जुट गयी। उसकी देखा-देखी तीसरे दिन उसकी दूसरी बहुओंने चार ही बजे उस काम को शुरू कर दिया। इस प्रकार पहले जहाँ वे सब-की-सब कामसे जी चुराती थीं। अब उन सबमें काम करने की एक प्रकार होड़-सी होने लगी। सभी चाहती थीं कि अधिक-से-अधिक काम मुझे करने को मिले; क्योंकि सबको उसमें आत्मकल्याण के दर्शन होते थे। छोटी बहू की यह दूसरी विजय थी।
अब छोटी बहूने कमरे साफ करने तथा कुएँ से पानी खींचकर लानेका काम अपने जिम्मे ले लिया। सबेरे नौकर झाडू लगाने तथा पानी भरने आता, तो उससे पहले ही यह सारा काम स्वयं कर लेती। सासने उससे फिर पूछा- ‘बेटी! इस कामके करने में तुम्हारा क्या अभिप्राय है?’ छोटी बहूने बड़े ही मधुर स्वरों में कहा- ‘माताजी! आपको इन सब बातों का भेद बतला देनेसे सेवा से वंचित होना पड़ता है। इसलिये अब मैं इसका रहस्य आपको नहीं बतलाना चाहती। इस अविनयके लिये आप मुझे क्षमा करें।’ सासने कहा- ‘बेटी! अब मैं तेरे कार्य में बाधा नहीं डालूँगी। तू मुझे इसका आध्यात्मिक रहस्य समझा दे।’ बहूने कहा – ‘सासजी ! जहाँ रसोई का काम करने से सालभर में और आटा पीसने का काम करनेसे छः महीनों में आत्म-कल्याण होता, वहाँ पानी भरनेकी सेवा से तीन ही महीनों में काम बन जायगा; क्योंकि यह काम उन सबकी अपेक्षा अधिक कठिन है। इसमें श्रम एवं कष्ट अधिक है तथा जानकी भी जोखिम है।’ फिर क्या था, सास भी उसके इस काम में हाथ बँटाने लगी। दोनों का उसमें साझा हो गया। दूसरी बहुओं ने यह देखकर सास से कहा- ‘आपकी अवस्था अब पानी भरने लायक नहीं है। इसलिये यह काम आपको नहीं करना चाहिये।’ इसपर सासने उन्हें उत्तर दिया- ‘क्या मुझे आत्म-कल्याण नहीं चाहिये? मैं वृद्धा हूँ, इसलिये मुझे तो जल्दी-से-जल्दी आत्मा का कल्याण कर लेना चाहिये।’ फिर क्या था, दूसरी बहुएँ भी इस काममें शामिल हो गयीं। अब छोटी बहूने बरतन माँजने का काम अपने जिम्मे लिया। सासने इस पर आपत्ति की। वह बोली- ‘इससे तुम्हारे कपड़े खराब होंगे और आभूषण घिस जायँगे। इस प्रकार महीनेमें जहाँ तुम नौकर की मजदूरी के पाँच रुपये बचाओगी, वहाँ उसके बदले में तुम्हारा दस रुपयों का नुकसान हो जायगा।’ इसपर बहूने कहा- ‘माना कि ऐसा करनेसे आर्थिक लाभकी अपेक्षा हानि ही अधिक होगी; किन्तु मेरे कपड़े चाहे मैले हो जायँ, मेरा अन्तःकरण तो इससे बहुत जल्दी शुद्ध होगा। बात यह है कि जो काम जितना कठिन और लौकि क दृष्टिसे जितना नीचा होता है, आध्यात्मिक दृष्टि से वह उतना ही ऊँचा और कल्याणकारक होता है। बरतन माँजने से मुझे विश्वास है कि दो ही महीनों में मेरा कल्याण हो जायगा। और यदि कभी भगवान् ऐसा संयोग भेज दें, जबकि किसी रोगी की टट्टी-पेशाब उठाना पड़े, तब तो एक ही महीने में कल्याण निश्चित है। अवश्य ही भाव हमारा ऊँचे-से-ऊँचा – पूर्ण निष्कामता का होना चाहिये।’
सासकी तो छोटी बहूके वाक्यों में अब वेदवाक्यों के समान श्रद्धा हो गयी थी। वह भी बरतन माँजने के काम में उसे सहयोग देने लगी। अन्य बहुओंने उसे मना किया। उसने कहा- ‘अपने लड़कों के बर्तन तो मैं अवश्य ही माँज सकती हूँ। फिर वृद्धावस्था के कारण मेरा आत्म कल्याण के साधनमें सबसे अधिक अधिकार है। इसलिये इस विषय में तुम्हारा आग्रह नहीं माना जा सकता।’ फिर तो सब-की-सब बहुएँ उसी काम में जुट गयीं। सब काम बड़े उत्साहसे होने लगे। काम-काजकी जो पारी बाँधी गयी थी, वह टूट गयी। जो मौका पाती, वही आगे-से-आगे काम करनेको तैयार रहती। सबमें परस्पर प्रेम और सद्भाव की स्थापना हो गयी। जिस घरमें कलह और अशान्ति का एकच्छत्र साम्राज्य था, वही अब सुख-शान्ति का निकेतन हो गया। जो लोग यहाँकी स्त्रियों को लड़ते-झगड़ते देखकर हँसते थे, वे ही उनका आदर्श व्यवहार देखकर आश्चर्य करने लगे। शहरके लोग दर्शकरूपसे उन लोगोंका व्यवहार देखनेके लिये आने लगे। स्त्रियोंके इस आदर्श व्यवहार का पुरुषों पर भी कम प्रभाव नहीं पड़ा। इनकी देखा-देखी वे सब भी आलसी हो चले थे। अब इनका आदर्श व्यवहार देखकर वे सब भी कर्तव्यपरायण हो गये। जहाँ पहले दूकान का काम प्रायः चढ़ा रहता था, वहाँ अब कामकी अपेक्षा काम करनेवाले अधिक हो गये। जहाँ उनमें पहले कामसे जी चुराने के कारण झगड़ा होता था, वहाँ अब वे सब-के-सब एक दूसरे का काम छीनकर करने लगे। जहाँ पहली लड़ाई नरकों में ले जानेवाली थी, वहाँ यह दूसरी लड़ाई कल्याण करनेवाली थी। कहना न होगा कि यह सब परिवर्तन छोटी बहूके सद्भाव, सद्विचार और सच्चेष्टाओं का सत्फल था। जिस प्रकार एक मछली सारे तालाब को निर्मल कर देती है, उसी प्रकार एक ही महान् एवं पवित्र आत्मा घरभर का ही नहीं, मुहल्ले, गाँव और नगरभरका सुधार कर देती है। संगकी ऐसी ही महिमा है। सभी माता-बहिनों को इस आख्यायिका से शिक्षा लेकर आत्माके कल्याण के लिये निष्कामभावसे दूसरों की सेवा का व्रत ले लेना चाहिये। ऐसी सेवा बहुत शीघ्र मुक्ति का कारण बन जाती है-
‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥’
(गीता २ । ४०)
श्रीमद्भगवद्गीतामें ऐसे अनेकों वाक्य मिलते हैं, जिनसे इस बातकी पुष्टि होती है। श्रीभगवान् कहते हैं-
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
(५।१२)
‘कर्मयोगी कर्मोंके फलको परमेश्वरके अर्पण करके भगवत्प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होता है।’
असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
(३ । १९)
‘आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।’
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
(१८ । ५६)
‘मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मोंको सदा करता हुआ भी मेरी कृपासे सनातन अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जाता है।’
