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India Speak Daily > धर्म > सनातन हिंदू धर्म > ॥ श्री हनुमते नम: ॥ 🌿
🌿🌼 श्री हनुमान चालीसा (भावार्थ एवं गूढार्थ सहित भाग – ११) 🌼🌿
सनातन हिंदू धर्म

॥ श्री हनुमते नम: ॥ 🌿
🌿🌼 श्री हनुमान चालीसा (भावार्थ एवं गूढार्थ सहित भाग – ११) 🌼🌿

ISD News Network
By ISD News Network 8 Min Read
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8 Min Read
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श्वेता पुरोहित :-

लाय सजीवन लखन जिवाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥

अर्थ –
हे हनुमानजी आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मणजी को जीवाया जिससे श्रीरघुवीर ने हर्षित होकर आपको अपने हृदय से लगा लिया।

गुढार्थ –
लक्ष्मणजी रामजी के बहिचर प्राण थे, लक्ष्मण जी को यदि राम जी का दाहिना हाथ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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रामजी हैं और लक्ष्मणजी नहीं, यह कभी संभव ही नहीं हो सकता है, रामायण में राम जी कभी अकेले थे ही नहीं।

जिस प्रकार मनुष्य के साथ उसकी छाया का होना निश्चित है, उसी प्रकार रामजी के आते ही लक्ष्मणजी का आना अनिवार्य ही है।

विश्वामित्र जी राजा दशरथ जी के पास केवल राम जी को ही मांगते हैं।

रामजी का जाना निश्चित हुआ कि लक्ष्मण जी तो चलेंगे ही, उन्हें अलग से निमंत्रण देने की आवश्यकता ही नहीं थी।

राम जी को आमंत्रित करने का अर्थ है साथ लक्ष्मण जी को आमंत्रित करना।

माँ को बुलाया कि उसके साथ तीन वर्ष के बालक को बुलाया ही समझो।

‘बालक को साथ लेती आना’ ऐसा कहना जिस प्रकार माँ का अपमान है, ठीक उसी प्रकार राम जी को बुलाने के पश्चात् लक्ष्मण जी को निमंत्रण देने का अर्थ यही समझा जाएगा कि इन दोनों के पारस्परिक संबंध का यथार्थ ज्ञान हमें नहीं है।

यदि आदमी को बुलाने के बाद उसकी छाया को उसके साथ जाने से रोका जा सकता है तो लक्ष्मणजी को भी रामजी के साथ जाने से रोका जा सकता है

दोनों में इतनी अभिन्नता थी, कोई भी कार्य करवाना हो तो राम जी को ही कहते और उनका बोलना लक्ष्मण जी को भी कहने के समान होता।

इस प्रकार भाई-भाई का अभिन्न संबंध केवल रामायण ही संसार को दिखा सकती है।

रामजी का लक्ष्मणजी पर असीम प्रेम था, रामजी के राज्याभिषेक के समय रामजी, लक्ष्मणजी के लिए जो कहते हैं वह विचार करने योग्य है।

राम जी यह नहीं कहते कि ‘मैं राजा बनने चला हूँ’ ‘लक्ष्मण, मया सार्धं प्रशाधि त्वं वसुंधराम्’ लक्ष्मण तुझे ही राज्य करना है ऐसा रामजी कह रहें हैं।

कितनी उच्च भावना है, दोनों का जीवन अभिन्न है, यदि रामजी कीर्ति की पताका है तो लक्ष्मणजी पताका का दण्ड है।

ध्वजकी पूजा करते समय काष्ठनिर्मित दंड को ही चांवल-चंदन चढ़ता है।

तुलसीदासजी ने तथा महर्षि वाल्मीकिजी ने रामचन्द्र जी का चरित्र-चित्रण करके मानव जाति के समक्ष संस्कृति का उच्च ध्येय रखा और इस ध्येय के समीप पंहूँचने के लिए लक्ष्मणजी के जैसी उग्र साधना करने का इशारा किया है।

साधक की कठोर उग्र साधना का ऐसा महान आदर्श लक्ष्मण जी ने उपस्थित किया है कि जिसकी रजकण तक पहुँचने के लिए अनेक जन्मों का परिश्रम करना पड़ेगा।

राम जी ने जिस समय लक्ष्मणजी को वन में साथ चलने को मना किया तो लक्ष्मण जी ने कहा – ‘जिस प्रकार जल के बिना मछली नहीं रह सकती उसी प्रकार लक्ष्मण भी राम के बिना नहीं रह सकता है।’

यह शब्द केवल शिष्टाचार के नाते अथवा रामजी को भला लगने के लिए नहीं बोले गये थे, लक्ष्मणजी के विशुद्ध अन्त:करण से निकले हुए ये उद्गार थे।

तभी तो जब लक्ष्मणजी को रामजी का वियोग हुआ है उसी स्थल पर रामायण की इतिश्री करनी पड़ी है।

लक्ष्मणजी का संपूर्ण जीवन रामजी की सेवा में बिता है, वे रामजी के साथ इतना घुलमिल गये थे कि राम शब्द का उच्चारण करते ही लक्ष्मणजी साथ में आते ही है।

लक्ष्मण जी जब मूर्छित होते हैं तो राम जी कहते हैं –

न हि मे जीवितेनार्थ: सीतया च जयेन वा।
को हि मे जीवितेनार्थ: त्वयि पंचत्वमागते॥

देशे देशे कलत्राणि देशे देशे च बांधवा:।
तं तु देशे पश्यामि यत्र भ्राता सहोदर:॥

ये दोनों श्लोक बतलाते हैं कि रामजी लक्ष्मणजी की ओर किस दृष्टि से देखते थे।

रामजी शब्द है और लक्ष्मणजी अर्थ, राम शब्द का अर्थ लक्ष्मण जी के कारण था, लक्ष्मणजी के बिना राम शब्द अर्थ रहित हो जाए।

तभी तो रामजी विलाप करते हुए कहते हैं:- ‘‘ सीता न मिले तो कोई बात नहीं, परन्तु यदि लक्ष्मण चला जाएगा तो मेरे प्राण निकल जायेंगे।’’

रामजी जैसे सत्यवादी पुरुष इन शब्दों का उच्चारण करते हैं।

वास्तव में देखा जाए तो रामजी कौशल्याजी के पुत्र और लक्ष्मणजी सुमित्राजी के पुत्र, फिर भी रामजी ‘सहोदर:’ (एक माँ के पेट से जन्मे हुए भाई) शब्द का प्रयोग करते हैं, यही बात दोनों के संबंध की विशिष्टता समझाती है।

लक्ष्मणजी जब रामजी के साथ वन गमन के लिए निकले तो अपनी पत्नी उर्मिलाजी को केवल ‘मैं जाता हूँ ’ इतना ही कहकर चल पड़े।

‘मैं जाऊँ या न जाऊँ’ यह पूछा तक नहीं, पत्नी की राय तो लेनी चाहिए, परन्तु नहीं ली, पती कर्तव्य का विचार ही नहीं किया।

जहाँ राम जी का संबंध आ गया वहाँ उन्हें दूसरी कोई बात सूझती ही नहीं थी।

उनके मन मे कभी भी धर्म और कर्तव्य के विचारों का संघर्ष रामजी के प्रेम के साथ नहीं हुआ, क्योेंकि उनका कर्तव्य एक मात्र राम जी ही थे।

उनके मन में राम जी के सिवाय दूसरा कर्तव्य नहीं, रामजी के सिवाय अन्य विचार नहीं।

धन्य उर्मिलाजी और धन्य है लक्ष्मणजी, धन्य है वह उर्मिला जी जिसने अपना व्यक्तित्व पति में एकरस कर डाला और धन्य है वह लक्ष्मण जी जिसने अपना समस्त जीवन राम जी की छायारुप बना डाला।

लक्ष्मण जी को रामजी के कीर्तिध्वज की लाठी ही समझो, क्योंकि लक्ष्मणजी के ही कारण रामरुपी ध्वज फहराता है।

हनुमान जी लक्ष्मण जी के प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लेने जाते है। बुटी की पहचान न होने के कारण हनुमान जी अपनी बुद्धि और बल का प्रयोग कर विराट रूप धारण कर पूरा पर्वत ही उठा लाते है। संजीवनी के उपचार से ही लक्ष्मण जी के प्राण बच पाते है इसी लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है “लाय संजीवन लखन जियाये” प्रभु श्री राम के सभी संकटो को दूर करने के कारण ही हनुमान जी को संकटमोचन भी कहा जाता है।

लक्ष्मण जी की मूर्छित अवस्था के कारण प्रभु श्री राम बहुत दुखी होते है । लक्ष्मण जी की मूर्छा टूटने के बाद प्रभु श्री राम के मुख पर पुनः प्रसन्नता आ जाती है, ओर प्रभु श्री राम हनुमान जी को अपने ह्रदय से लगा लेते है।
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये ॥

क्रमशः

श्रीराम जय राम, जय जय राम, जय जय जय सीता राम 🙏
कोटि कविकुल तिलक श्रीहनुमानजी की जय 🙏

ISD News Network July 30, 2024
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TAGGED: राम जी, लक्ष्मण जी', संजीवनी बूटी, सीता

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