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India Speak Daily > समाचार > न्यायपालिका > शंकराचार्य जी की जवाबी नोटिस से उप्र सरकार और मेला प्रशासन बैकफुट पर!
न्यायपालिका

शंकराचार्य जी की जवाबी नोटिस से उप्र सरकार और मेला प्रशासन बैकफुट पर!

ISD News Network
By ISD News Network 8 Min Read
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यह कानूनी नोटिस (Legal Notice) जो सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड अंजनी कुमार मिश्रा ने ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज की ओर से प्रयागराज मेला प्राधिकरण को भेजा है, प्रशासन और संत समाज के बीच चल रहे संघर्ष को एक नए कानूनी स्तर पर ले जाता है। इस जवाबी नोटिस से उप्र सरकार और प्रयागराज माघ मेला प्रशासन बैकफुट पर आ गया है।

शंकराचार्य जी के अधिवक्ता द्वारा भेजे गए 8 पन्नों के दस्तावेज के आधार पर, यहाँ एक विस्तृत विश्लेषणात्मक लेख प्रस्तुत है:

शंकराचार्य बनाम मेला प्रशासन: कानूनी नोटिस का विस्तृत विश्लेषण
दिनांक: 20 जनवरी 2026
प्रसंग: प्रयागराज माघ मेला 2025-26 के दौरान उत्पन्न विवाद और प्रशासन द्वारा 19 जनवरी 2026 की मध्यरात्रि को शंकराचार्य जी को थमाया गया पत्र।
प्रयागराज मेला प्रशासन ने 19 जनवरी को एक पत्र जारी कर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ‘शंकराचार्य’ पद और उनके अभिषेक पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में, शंकराचार्य जी की कानूनी टीम ने 24 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए एक कड़ा नोटिस जारी किया है। इस नोटिस में प्रशासन के हर सवाल का बिंदुवार खंडन किया गया है।
नीचे प्रशासन द्वारा उठाए गए (अप्रत्यक्ष) सवालों और नोटिस में दिए गए (प्रत्यक्ष) जवाबों का विश्लेषण है:

शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।

सवाल: क्या आपका ‘शंकराचार्य’ पद वैध है?
प्रशासन का तर्क था कि शंकराचार्य पद को लेकर विवाद है और मामला कोर्ट में है।
शंकराचार्य पक्ष का जवाब (नोटिस के पैरा 2 और 3 के आधार पर):

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शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।
    • वसीयत और पंजीकरण: नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी ने 01.07.2021 को एक घोषणा पत्र और वसीयत (Will) तैयार की थी, जो पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 41 के तहत विधिवत पंजीकृत है। इसके अनुसार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष्पीठ का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था।
    • अभिषेक संपन्न हो चुका है: 11.09.2022 को स्वामी स्वरूपानंद जी के ब्रह्मलीन होने के बाद, 12.09.2022 को परमहंसी गंगा आश्रम (म.प्र.) में वैदिक रीति-रिवाज, अभिषेक, तिलक और चादर विधि के साथ उनका अभिषेक संपन्न हो चुका है। इस समारोह में लाखों लोग और अन्य पीठों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

    सवाल: क्या सुप्रीम कोर्ट ने आपकी नियुक्ति पर रोक लगाई है?
    प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश (दिनांक 14.10.2022) का हवाला देकर दावा किया था कि नए शंकराचार्य के अभिषेक पर रोक है।
    शंकराचार्य पक्ष का जवाब (नोटिस के पैरा 5, 8 और 9 के आधार पर):

      • ‘स्टे’ (Stay) का सच: नोटिस में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद पर बने रहने या उनके नाम के उपयोग पर कोई अंतरिम रोक (Interim Injunction or Stay) नहीं लगाई है।
      • आदेश की व्याख्या: 14.10.2022 को सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था (जिसमें अभिषेक न करने की बात थी), वह “निष्प्रभावी” (Futile/Ineffective) था। कारण यह है कि अभिषेक तो उससे एक महीने पहले ही 12.09.2022 को संपन्न हो चुका था। जो घटना पहले ही घट चुकी है, उस पर बाद में रोक नहीं लगाई जा सकती।
      • गुजरात हाईकोर्ट का फैसला: वसीयत को चुनौती देने वाली एक याचिका गुजरात हाईकोर्ट में दायर की गई थी, जिसे कोर्ट ने 02.09.2025 को खारिज कर दिया था, जिससे वसीयत की वैधता पुख्ता होती है।
      शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।
      शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।

      सवाल: स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का दावा क्या है?
      प्रशासन अक्सर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के दावों के कारण भ्रम की स्थिति का हवाला देता है।
      शंकराचार्य पक्ष का जवाब (नोटिस के पैरा 9, 10 और 22 के आधार पर):

        • वासुदेवानंद पर प्रतिबंध: नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 22.09.2017 के फैसले (पैरा 744) का हवाला दिया गया है, जिसमें स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को ‘शंकराचार्य’ की उपाधि, छत्र, चंवर और सिंहासन का उपयोग करने से रोका (Restrained) गया था।
        • कुंभ मेले का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2019-2020 के कुंभ के लिए स्पष्ट आदेश दिया था कि स्वामी वासुदेवानंद को जमीन दी जाए, लेकिन “शंकराचार्य की हैसियत से नहीं”।
        • आरोप: नोटिस में प्रशासन पर आरोप लगाया गया है कि प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए स्वामी वासुदेवानंद और अन्य “फर्जी बाबाओं” (जैसे स्वामी नरेंद्रानंद) को सुरक्षा और सुविधाएं दी हैं, जबकि वे इसके हकदार नहीं हैं।
        शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।
        शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।

        सवाल: प्रशासन ने मध्यरात्रि को नोटिस क्यों तामील कराया?
        प्रशासन ने 19 जनवरी की रात को नोटिस चस्पा किया था।
        शंकराचार्य पक्ष का जवाब (नोटिस के शुरुआती पैराग्राफ और पेज 1 के आधार पर):

        मेला प्रशासन का नोटिस
          • गरिमा का हनन: वकील ने लिखा है कि प्रशासन का पत्र मध्यरात्रि के बाद तब तामील कराया गया जब शंकराचार्य जी सो रहे थे। यह कृत्य द्वेषपूर्ण (Malicious), अपमानजनक और सनातन धर्म के 100 करोड़ अनुयायियों की भावनाओं को आहत करने वाला है।
          • उत्पीड़न का आरोप: प्रशासन के इस कृत्य को “उत्पीड़न” (Harassment) और शंकराचार्य संस्था की गरिमा को गिराने वाला बताया गया है।

          सवाल: क्या यह मामला ‘न्यायाधीन’ (Sub-judice) होने के कारण प्रशासन हस्तक्षेप कर रहा है?
          प्रशासन का तर्क है कि मामला कोर्ट में है, इसलिए वे प्रोटोकॉल नहीं दे सकते।
          शंकराचार्य पक्ष का जवाब (नोटिस के पैरा 16 और 18 के आधार पर):

          शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।
            • न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court): नोटिस में कहा गया है कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन (Seisin) है, तो प्रशासन या कोई तीसरा पक्ष यह तय करने वाला कौन होता है कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं? प्रशासन द्वारा शंकराचार्य जी की नियुक्ति को “अमान्य” जैसा प्रस्तुत करना कोर्ट की अवमानना है।
            • भ्रामक प्रचार: प्रशासन के पत्र ने मीडिया और समाज में यह झूठी धारणा फैलाई है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया है, जो कि सरासर झूठ है।
              निष्कर्ष और अल्टीमेटम
              नोटिस के अंतिम भाग में (पेज 1 और 8), वकील अंजनी कुमार मिश्रा ने मेला प्रशासन को सख्त चेतावनी दी है:
            • मांग: प्रशासन अपने पत्र (दिनांक 19.01.2026) को इस नोटिस की प्राप्ति के 24 घंटे के भीतर वापस ले।
            • चेतावनी: यदि पत्र वापस नहीं लिया गया, तो शंकराचार्य जी प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ:
            • मानहानि (Defamation) का मुकदमा।
            • सुप्रीम कोर्ट में न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही शुरू करेंगे।
            शंकराचार्य जी द्वारा भेजा गया जवाबी नोटिस।

            यह नोटिस स्पष्ट करता है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पक्ष कानूनी दस्तावेजों और पुराने अदालती आदेशों पर आधारित है, और वे प्रशासन के ‘हस्तक्षेप’ को कोर्ट की अवमानना मानते हैं।

            ISD News Network January 21, 2026
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