शंकराचार्य की धर्म की सेना
शंकराचार्य की धर्म की सेना , चतुरंगिणी बनने वाली है ;
सारे हिंदू ! शामिल हो जाओ, तब पूर्ण सुरक्षा मिलने वाली है ।
बहुत शीघ्र दूजा-महाभारत , भारत में होने वाला है ;
शंकराचार्य को “कृष्ण” बनाओ , तभी धर्म बचने वाला है ।
धर्म-विरोधी भारत का नेता और धर्महीन-अज्ञानी हिंदू ;
ऐसे हिंदू हैं बहुतायत में , महामूर्ख बन चुके ये हिंदू ।
अब्बासी-हिंदू के ये पिछलग्गू , धर्म-सनातन के द्रोही हैं ;
धर्म के असली-शत्रु यही हैं , महाकुटिल-मक्कार यही हैं ।
पर ये सब के सब मिट जायेंगे , कहीं भी नहीं टिक पायेंगे ;
धर्म-युद्ध निश्चित ही होगा , उसी में ये सब मिट जायेंगे ।
बकरी के बच्चे की अम्मा , कब तक खैर मनायेगी ?
बहुत शीघ्र इसकी कुर्बानी , एपस्टीन-फाइल में होगी ।
कब तक चढे़गी पाप की हांडी,घड़ा पाप का भरेगा कब तक ?
रेत में कब तक नाव चलेगी , नेता का जादू चलेगा कब तक ?
पूरी-अति हो चुकी है अब तो , हिंदू ! अब उठने वाला है ;
अज्ञान की निद्रा सोने वाला , सारा हिंदू ! जगने वाला है ।
शंकराचार्य ने अलख लगायी, सुनकर हिंदू ! जाग गया है ;
नेतृत्व विहीन हिंदू सदियों से , जिसको हिंदू ने प्राप्त किया है ।
अब्बासी-हिंदू की घड़ी आ गई,जलने वाली है काठ की हांडी ;
घड़ा पाप का भर चुका है पूरा , पड़ने वाली ईश्वर की डांडी ।
खामोशी से पड़ती ये लाठी , पापी कभी न बच पाया ;
हमको देर भले ही लगती , पर अंधेर कभी न हो पाया ।
इस नेता ने पूरे भारत को , अंधेर-नगरी बना रखा है ;
इतना बड़ा ये चौपट-राजा , खुद को ईश्वर मान रहा है ।
“राम-लला” की उंगली पकड़े, पोस्टर बनवाने का साहस ;
अंधभक्त जो इस नेता के , उनका कितना है दुस्साहस ?
जितना बड़ा ये नेता पापी है ,उतने ही पापी सब अंधभक्त ;
अपनी मौत बुला ली खुद ही , चारों ओर बहेगा रक्त ।
यदि हिंदू ! धर्म-मार्ग न आया,तो उन्हें बड़ा पछतावा होगा ;
जान-माल-सम्मान मिटेगा , बहुत शीघ्र ये निश्चित होगा ।
अब्राहमिक-ग्लोबल-एजेंडा , सदियों से चल रहा देश में ;
अब तक दुश्मन रहा सामने, इसी से हिंदू बचा देश में ।
अब हिंदू का चोला ओढ़े , अब्बासी-हिंदू नेता आया है ;
अब धर्म बचाना बड़ा कठिन है , क्योंकि हिंदू धोखा खाया है ।
अब बचने का मार्ग यही है, धर्म की सेना में हिन्दू ! आओ ;
शंकराचार्य हैं “कृष्ण” तुम्हारे , हिंदू ! विजयश्री को पाओ ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
