कायर,कमजोर,नपुंसक नेता , डरकर बिल में दुबक गया है ;
एपस्टीन-फाइल का चक्कर , डोनाल्ड-ट्रंप से सहम गया है ।
ये कोई अच्छा काम न करता , सब बुरे काम ही करता है ;
केवल कुर्सी से चिपके रहने का , हरदम प्रयास ये करता है ।
सारे बुरे मार्ग अपनाता , अपनी मंजिल पाने को ;
केवल सत्ता है इसकी मंजिल, हर वासना पूर्ति करवाने को ।
सत्ता जाते ही जेल जायेगा , किसी तरह न बच पायेगा ;
इसका सारा गंदा – पैसा , धरा का धरा रह जायेगा ।
इसीलिये ये हर कीमत पर , हर ऐसा वो कार्य करेगा ;
जिससे सत्ता बची रहे व मरते दम तक टिका रहेगा ।
लेकिन मनचाहा कार्य हमेशा, क्या किसी व्यक्ति का होता है ?
चाहे जितनी लम्बी रात हो , प्रातः काल तो होता है ।
अब तक क्यों डूबा हिंदू का सूरज ? क्योंकि हिंदू सोया है ;
अज्ञान में आंखें बंद हैं उसकी , इसीलिये तो रोया है ।
पर अब हिंदू जाग रहा है , भाग्य का सूरज निश्चित चमकेगा ;
नेतृत्व संभाला “शंकराचार्य” ने , अब पापी-नेता भागेगा ।
अब तो इसको जाना ही होगा , कुछ भी काम न आयेगा ;
चुनाव-आयोग हो सुप्रीम-कोर्ट हो,सब फ्लाप यहां हो जायेगा ।
जनार्दन रूप प्रकट हो रहा, अब भारत की हिंदू-जनता का ;
इसके आगे न टिकेगा कोई , राज आयेगा अब जनता का ।
लोकतंत्र में जान आयेगी , नवजीवन संचारित होगा ;
भ्रष्टाचार भी मिट जायेगा,जब कानून का शासन देश में होगा ।
भारत की सबसे बड़ी समस्या,कानून का शासन कहीं नहीं है ;
चरित्रहीन-कामातुर नेता , विश्व में सबसे अधिक यहीं हैं ।
लाखों का मेकअप रोजाना , दसियों बार कपड़े बदलें ;
लाइट – फोटो और कैमरा , सारे अरमान इसी में निकलें ।
सीमा पर आतंकी हमला , ये फोटो खिंचवाता रहता ;
अंधभक्त – अज्ञानी हिंदू , जय – जयकार लगाता रहता ।
इतने बड़े अक्ल के अंधे , अपना विनाश भी देख न पाते ;
मन में भरी गुलामी इतनी , नेता के तलवे चाटा करते ।
अंधभक्त दुर्भाग्य देश के , भारत – वर्ष मिटाते जाते ;
अब्बासी-हिंदू के पाप का गागर , पापों से भरते जाते ।
अंधभक्त अब आंखें खोलो , धर्म – सनातन में जागो ;
स्वयं बचो – परिवार बचाओ , नेता के पीछे मत भागो ।
“शंकराचार्य” साक्षात धर्म हैं , उनसे है कल्याण तुम्हारा ;
“राम-राज्य” हमको पाना है , एकमात्र उद्देश्य हमारा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
