शंकराचार्य पर आघात हो रहे
भारत में छाया घोर-अंधेरा, क्या प्रकाश की किरण नहीं है ?
शंकराचार्य पर आघात हो रहे,लगता भारत का क्षरण यही है ।
साक्षात् धर्म की मूर्ति यही हैं , इन पर हमला करते हो ;
नहीं देश के रक्षक हो तुम , धर्म का भक्षण करते हो ।
धर्म नहीं तो देश नहीं है , क्या तुम इतना नहीं जानते ?
अब्बासी-हिंदू है धर्म का दुश्मन , मूरख-हिंदू नहीं जानते ।
तुम सब बहुत बड़े पापी हो , घोर-नरक में जाना होगा ;
जीते जी भी सुख न मिलेगा , बड़े कष्ट से मरना होगा ।
मरने के बाद भी प्रेत बनोगे , सदियों – सदियों भटकोगे ;
बड़ा भयानक फल पाओगे , पशु – योनि में अटकोगे ।
सांप , छछूंदर , सूअर बनोगे , सबका मैला खाओगे ;
अभी भी रिश्वत का मैला है , और भला क्या पाओगे ?
समर शेष है , नहीं पाप का भागी केवल ब्याध ;
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा , उनके भी अपराध ।
परम-सत्य “दिनकर” ने कहा है , हिंदू कब समझेगा ?
जागो हिंदू ! अब तो जागो , वरना तू निपटेगा ।
इसी से हिंदू सिमटता आया , लगातार पिटता आया ;
स्वार्थ ,लोभ ,भय ,भ्रष्टाचार से , हिंदू ! तू मिटता आया ।
गद्दारों की बहुतायत है , हिंदू ऐसा ही बनता जाता ;
हिंदू ! तेरा दुर्भाग्य यही है , गद्दारों को चुनता जाता ।
नब्बे – प्रतिशत हिंदू – नेता , धर्म – सनातन के गद्दार ;
चरित्रहीन – अय्याश बन चुके , म्लेच्छों के ये पक्के यार ।
इन्हें धर्म से कुछ न मतलब , बगुला-भगत ये पक्के हैं ;
कायर , कमजोर , नपुंसक नेता , धर्महीन ये छक्के हैं ।
छक्के बनकर नाच कर रहे , कमर बहुत मटकाते हैं ;
अपने आका की कठपुतली हैं , मनचाहा नाच दिखाते हैं ।
अरब, अमेरिका और चीन हैं , इनके आका कुल तीन हैं ;
रजिया इनके बीच फंस गयी , सरकारें श्रीहीन हैं ।
हिंदू की बुद्धि में पड़े हैं पत्थर, कैसा अपना नेतृत्व बनाया ?
धर्म के सबसे बड़े शत्रु को , अपना हृदय-सम्राट बनाया ।
जागो हिंदू ! अब तो जागो , तेरा सब-कुछ छिनने वाला है ;
जान – माल – सम्मान जायेगा , धर्म तो जाने वाला है ।
धन – दौलत सब धरी रहेगी , पर प्राण नहीं बच पायेंगे ;
गैंगरेप बच्चों संग होगा , टुकड़े – टुकड़े कट जायेंगे ।
महामूर्खता अपनी छोड़ो , कायरता को त्यागना होगा ;
अपना अस्तित्व बचाना है तो, अच्छी-सरकार बनाना होगा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
