“शंकराचार्य” अब कमर कस चुके
मिलकर देश को लूट रहे हैं , बेईमान-नेता व अफसर ;
इनका नेता अब्बासी-हिंदू है, आपदा में ही पाता अवसर ।
इसीलिये आपदा बढ़ाता , साजिश करके पैदा करता ;
फूट डालकर राज कर रहा , वर्ग-संघर्ष बढ़ाता रहता ।
कहीं ये करता हिंदू-मुस्लिम और कहीं पर अगड़ा-पिछड़ा ;
एकमात्र उद्देश्य है इसका , हिंदू में सद्भाव को तोड़ा ।
ये परजीवी-जीव हैं सारे , हिंदू का खून चूसते हैं ;
शैतान की पूजा करने वाले , हिंदू का धर्म तोड़ते हैं ।
इसीलिये ये तोड़ें मंदिर , गंदे – गलियारे बनवाते हैं ;
धर्म – विरोधी ये गलियारे , हिंदू को भटकाते हैं ।
बुद्धि नष्ट कर दी हिंदू की , गंदी-शिक्षा झूठा-इतिहास ;
धार्मिक-शिक्षा नैतिक-शिक्षा का , पूरी तरह कर दिया नाश ।
चरित्रहीन व गंदे – हिंदू , टुकड़े पाकर पूंछ हिलाते ;
झूठा-प्रोपेगेंडा नेता का करके , मास्टरस्ट्रोक-वादी बनते ।
परवाना हिंदू की मौत का , अब्बासी-हिंदू नेता लिखता ;
धर्म-विरोधी कानून बनाता, आतंकवादी घटनायें करवाता ।
गौधरा से पहलगाम तक , सभी में पूरी-पूरी साजिश ;
हिंदू-धर्म मिटा देने की , हरचंद कर रहा ये कोशिश ।
हिंदू-धर्म से इसे बहुत चिढ़ , क्योंकि चरित्र की मर्यादा है ;
ये सारे पापी-चरित्रहीन हैं , व्यभिचार बहुत ही ज्यादा है ।
व्यभिचारी ये पापाचारी , महाम्लेच्छ ये सब के सब हैं ;
पूरा शासनतंत्र इन्हीं का , साथी बाबा – व्यापारी ठग हैं ।
नेता , अफसर , व्यापारी , बाबा , पूरी चांडाल-चौकड़ी है ;
नोंच-नोंच खाते हिंदू को , चील-कौवे व लोमड़ी हैं ।
पूरी लोमड़-बुद्धि है इनकी , इनका नेता खूंखार-भेड़िया ;
खाल भेड़ की ओढ़ रखी है , इसकी पूरी पाप की दुनिया ।
“फ्री-मेजन” है इनकी दुनिया , दुराचार बच्चों के संग ;
उन्हें मारकर खून भी पीते , करते सदा धर्म से जंग ।
पर अब इनका घड़ा पाप का , पूरी तरह भर गया है ;
सारे हिंदू अब जागने वाले, पापी का अंत निकट आया है ।
“शंकराचार्य” अब कमर कस चुके,हर-हिंदू को जगाना है ;
“धर्मो रक्षति रक्षित:” , हर धर्म – विरोधी मिटना है ।
“शंकराचार्य” ही “धर्म-ध्वजा” हैं, हिंदू ! इसके नीचे आओ ;
“गौ-गीता-गंगा” की रक्षा , इन्हें बचाकर धर्म बचाओ ।
धर्म बचेगा – देश बचेगा , पूरा – भारत बच जायेगा ;
“धर्म-सनातन” सर्वश्रेष्ठ है “राम-राज्य” ये ही लायेगा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
