“शंकराचार्य” बढ़ चुके हैं आगे
“राम-राज्य” अधिकार हमारा , ये जन्म-सिद्ध अधिकार है ;
पापी-नेताओं ने नष्ट कर दिया , जो महाधूर्त – मक्कार हैं ।
मानवता के ये अपराधी , चरित्रहीन हैं भ्रष्टाचारी ;
“एपस्टीन-फाइल” के पापी , बहुत बड़े हैं व्यभिचारी ।
लगभग सारे नेता – अफसर , धर्म – सनातन छोड़कर ;
इस हमाम में सब नंगे हैं , इक्का – दुक्का छोड़कर ।
तेजी से हो रहा पतन है , चरमावस्था में देर नहीं है ;
आरक्षण है – तुष्टीकरण है , सबसे – बड़ा अंधेर यही है ।
अब्बासी-हिंदू भारत का नेता , जहर की खेती करता है ;
भांग घोल दी हर-एक कुयें में, इसी की साजिश रचता है ।
ये आपदा में अवसर ढूंढे , इसकी ही ये खोज है ;
आपदाग्रस्त कर दिया है भारत , कोढ़ में कर दी खाज है ।
ये धोखा देने में माहिर व हिंदू ! धोखा खाने में ;
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू ! मिटता जाता अनजाने में ।
धर्म-सनातन को न जाना और कोई मजहब न जाना ;
जेहाद और गजवा न जाना , अलतकिया-सिद्धांत न जाना ।
हिंदू ! की सीमाहीन मूर्खता , इसीलिये आसान शिकार ;
अब्बासी-हिंदू है चतुर-खिलाड़ी, हिंदू का करता है शिकार ।
बात – बात पर झूठ बोलता , सदा – सदा धोखा देता ;
हिंदू ! इसे कभी न समझा , नाटक-नौटंकी में फंसता ।
हिंदू ! दुनिया का विचित्र प्राणी , खुद अपनी चिता सजाता है ;
अपने सबसे – बड़े शत्रु को , हृदय – सम्राट बनाता है ।
खुद अपनी मौत को दावत देता , अपनी गर्दन कटवाता है ;
फिर भी अब्बासी-हिंदू नेता को , अपना रक्षक बतलाता है ।
कहता कोई विकल्प नहीं है तो विकल्पहीन ही मर जाओ ;
अपनी नहीं तो बच्चों की सोचो व अच्छी-सरकार बनाओ ।
“शंकराचार्य” बढ़ चुके हैं आगे , सारे-हिंदू करें अनुसरण ;
गौ – गीता – गंगा की रक्षा , हर-स्थिति में इनका रक्षण ।
इनकी रक्षा करते-करते ही , धर्म की रक्षा हो जायेगी ;
इसी से देश की रक्षा होगी, अच्छी-सरकार भी बन जायेगी ।
धर्म – देश व राष्ट्र बचाओ , हिंदू ! इसको ठान लो ;
अब्बासी-हिंदू है देश का दुश्मन , इसको पक्का मान लो ।
जिस हिंदू की बुद्धि भ्रमित है , धर्म-सनातन में आ जाओ ;
पूरी तरह शुद्ध हो बुद्धि , “सत्य-मार्ग” को पा जाओ ।
“सत्य-मार्ग” पर चलेगा हिंदू ! सारे-तापों से बच जायेगा ;
इसी तरह से धीरे-धीरे , “राम-राज्य” भी पा जायेगा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”

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