प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज को अपमानित करने और काशी में मंदिर विध्वंस को लेकर आवाज उठाने वाले हिंदुओं पर कराए गये FIR के ट्रेंड से पता चल रहा है कि यह सब लखनऊ पीठ और दिल्ली सल्तनत के बीच चल रहे पावर गेम का नतीजा है! दिल्ली सल्तनत द्वारा निर्देशित नौकरशाही ने उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मणिकर्णिका क्षेत्र का दौरा करने से न केवल रोका, बल्कि बिना तथ्य के मुख्यमंत्री को प्रेसवार्ता में बैठाकर उनसे ‘AI जनरेटेड फोटो’ जैसा हास्यास्पद बयान दिलवा दिया, जिससे मुख्यमंत्री की किरकिरी हुई।
योगी इससे संभले भी नहीं थे कि प्रयागराज की नौकरशाही ने शंकराचार्य को गंगा स्नान से रोक कर और उनके संन्यासियों के साथ मारपीट कर, मुख्यमंत्री को और ही मझधार में फंसा दिया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने जो फोटो जारी किया है, उससे स्पष्ट है कि यह सब कुछ उप्र के गृहविभाग के सचिव के इशारे पर कमिश्नर, जिलाधिकारी जैसे बड़े नौकरशाह कर रहे थे। यह मत भूलिए कि ये बड़े नौकरशाह लोकसेवा आयोग के जरिए चुने जाते हैं और केंद्र सरकार के मातहत काम करते हैं। हद तो तब हो गई जब 19 जनवरी की रात कानूनगो शंकराचार्य जी के शिविर में नोटिस चिपकाने पहुंच गया। उप्र के मुख्यमंत्री की हिंदुत्व की पूरी छवि काशी से प्रयागराज तक एक झटके में खत्म कर आखिर केंद्रीय नौकरशाही किसे फायदा पहुंचाना चाहती है?
आइए कुछ बिंदू से इसे और स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं:-
“LIU (खुफिया विभाग) का फेलियर” – असली प्रशासनिक चूक
ज्यादातर लोग पुलिस की धक्का-मुक्की की बात कर रहे हैं, लेकिन असली सवाल Local Intelligence Unit (LIU) पर उठता है।
- सवाल: अगर शंकराचार्य जी ने (जैसा उनका दावा है) 3 दिन पहले व्हाट्सएप पर सूचना दे दी थी, तो LIU ने उस इनपुट को ‘खतरे’ (Threat Perception) के रूप में मार्क क्यों नहीं किया?
- चूक: पुलिस को उन्हें कैंप से निकलते ही या बैरिकेडिंग से बहुत पहले ही बातचीत (Negotiation) से रोकना चाहिए था। उन्हें ‘संगम नोज’ (बिल्कुल भीड़ के पास) तक पहुँचने देना और फिर वहां रोककर धक्का-मुक्की करना—यह साफ तौर पर इंटेलिजेंस और ग्राउंड मैनेजमेंट का फेलियर है। यह प्रशासन की रणनीति की पोल खोलता है।
“सिलेक्टिव टारगेटिंग” (Selective Targeting) का सबूत
शंकराचार्य जी ने अपने बचाव में एक बहुत बड़ा तर्क दिया है जो प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है, लेकिन मीडिया में कम हाईलाइट हुआ है।
- फर्जी शंकराचार्य का एंगल: मेला क्षेत्र में अनेक फर्जी शंकराचार्य का भी कैंप लगा है और वहां भी शंकराचार्य का बोर्ड लगा है।
- भेदभाव: प्रशासन ने केवल अविमुक्तेश्वरानंद के बोर्ड और पदवी पर ही नोटिस क्यों दिया? अगर सुप्रीम कोर्ट का आदेश “शंकराचार्य पद” पर रोक का है, तो वह नियम फर्जी शंकराचार्यों और संघ के प्रिय और अदालत द्वारा फ्रॉड घोषित वासुदेवानंद सरस्वती पर लागू क्यों नहीं है? प्रशासन का यह ‘पिक एंड चूज’ (Pick and Choose) रवैया साबित करता है कि कार्रवाई नियमों के तहत नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति विशेष’ (Targeting the Person) को देखकर की जा रही है।
2027 चुनाव और ‘ब्राह्मण-ठाकुर’ की अंदरूनी रिपोर्ट
इस घटना का सीधा असर 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर पड़ सकता है।
- अंदरखाने की खबर: चर्चा है कि संघ (RSS) की आंतरिक सर्वे रिपोर्ट्स में यूपी में ‘ब्राह्मण वोट बैंक’ की नाराजगी की बात सामने आई है।
- कनेक्शन: यह घटना उस नाराजगी में ‘आग में घी’ का काम करेगी। क्या प्रशासन के कुछ अधिकारी जानबूझकर (विपक्ष के इशारे पर या आपसी गुटबाजी में) सरकार और ब्राह्मणों के बीच खाई पैदा कर रहे हैं? यह ‘ब्यूरोक्रेसी की साजिश’ (Bureaucratic Sabotage) है या लखनऊ पीठ के विरुद्ध दिल्ली सल्तनत की साजिश है?
निष्कर्ष:
“क्या प्रशासन की यह सख्ती वास्तव में ‘भीड़ नियंत्रण’ के लिए थी, या फिर दिल्ली और लखनऊ के बीच चल रहे ‘शह-मात’ (Checkmate) के खेल में एक शंकराचार्य को मोहरा बना दिया गया?”
