संदीप देव। भविष्य पुराण (140/46-48) के अनुसार शाकद्वीपी मगों को न सावित्री मंत्र का अधिकार है, न त्रिकाल संध्या का। जब उनके लिए भारतीय वेद में ही अधिकार नहीं है, तो फिर वह सावित्री मंत्र के उच्चारण के भी अधिकारी नहीं है। शाकद्वीपी सिर्फ सूर्य मंत्र का पाठ कर सकते हैं।

शाकद्वीपी मगों को उनके आदि नाना ऋजिश्व ऋषि ने अपूज्यता का श्राप दिया था अर्थात ये लोग पूजनीय नहीं हैं। अपने पिता का श्राप सुनकर मगों की आदि माता निकुक्षी रोने लगी और भगवान सूर्य से आग्रह करने लगी कि हमारे पुत्रों की अपूज्यता समाप्त कर दीजिए। भगवान सूर्य ने कहा कि मैं इतने बड़े ऋषि का श्राप तो समाप्त नहीं कर सकता, परंतु इन्हें मंत्रहीन-विधि हीन पूजा-अर्चन का अधिकार देता हूं। इस्लाम के मानने वाले जैसे पांच बार नमाज पढ़ते हैं, वैसे इन्हें पांच बार सूर्य भगवान को धूप-दीप दिखाने का अधिकार मिला।
भविष्य पुराण के अनुसार शाकद्वीपी मग अपूज्य हैं और इनकी कोई भी धार्मिक क्रिया मंत्र और विधि संपन्न नहीं है! इसका कारण यह है कि इनकी आदि माता निकुक्षी ने अवैदिक तरीके से अग्नि का लंघन किया था, जिसके फलस्वरूप अग्नि में उपस्थित भगवान भास्कर ने इस अवैदिक कर्म की सजा देते हुए उन्हें गर्भवती कर दिया था। आज भी भारत में अग्नि का लंघन धर्म विरुद्ध कार्य माना जाता है!
अपनी बेटी निकुक्षी के इस अवैदिक कार्य से आहत उनके पिता ऋजिश्व ऋषि ने अपनी पुत्री को श्राप दिया कि तूने काम वासना के वशीभूत होकर वैदिक मार्ग का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हारे पुत्र अपूज्य होंगे। यह अपूज्यता शाकद्वीपी मगों के साथ सदा के लिए जुड़ गया। भविष्य पुराण के अनुसार शक मगों का जन्म भी इनकी माता की काम वासना के कारण हुआ और यह बात स्वयं इनके आदि नाना ने श्राप देते हुए कहा है।
वैदिक धर्म के उलट और देवताओं की पूजा अर्चना के विपरीत निकुक्षी के शापित पुत्र जरथ्रुष्ट्र ने चारों भारतीय वेदों को ही उलटने-पलटने का कार्य आरंभ कर दिया और अपना अग्निपूजक नया पंथ ही चला दिया। वैदिक आर्य सुर अर्थात् देवता की पूजा करते थे तो जरथ्रुष्ट्र ने इसके उलट असुर पूजा आरंभ कर दिया। उसका अहुरमज्दा असुर देवता है। अहुरा मज़्दा पारसी धर्म के सर्वोच्च देवता हैं, जिसकी स्थापना शापित जरथ्रुष्ट्र ने किया था। महामहोपाध्याय पंडित मधुसूदन ओझा के अनुसार, पारसी पंथ का संस्थापक शाकद्वीपी मग जरथ्रुष्ट्र ही है।
