विशेष संपादकीय, इंडिया स्पीक्स डेली। इतिहास की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि वह कभी ख़ामोश नहीं रहता; वक्त की धूल जैसे ही हटती है, छुपे हुए सच सार्वजनिक पटल पर आ जाते हैं। हाल ही में डिजिटल मीडिया मंच ‘द प्रिंट’ (ThePrint) ने ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स (UK National Archives, Kew) के अवर्गीकृत राजनयिक दस्तावेज़ों के हवाले से एक असाधारण दस्तावेज़ी खुलासा किया है। यह रिपोर्ट स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव (1951-1952) की पूर्वसंध्या पर दक्षिणपंथी राजनीति के एक प्रमुख संगठन—‘अखिल भारत हिंदू महासभा’—के रणनीतिक कदमों, उनके वैश्विक संपर्कों और आंतरिक वैचारिक विरोधाभासों को पूरी तरह बेनक़ाब करती है।
1. 27 अगस्त 1951 का गोपनीय दस्तावेज़: ब्रिटिश उच्चायोग में क्या पहुंचा?
‘द प्रिंट’ द्वारा सार्वजनिक किए गए आधिकारिक पत्राचार के अनुसार, 27 अगस्त 1951 को अखिल भारत हिंदू महासभा के केंद्रीय संसदीय बोर्ड (11, सुकिया स्ट्रीट, कलकत्ता) की ओर से ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर (1, हैरिंगटन स्ट्रीट, कलकत्ता) को एक अत्यंत गोपनीय पत्र सौंपा गया।
इस पत्र को संगठन के केंद्रीय संसदीय बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष आशुतोष लाहिड़ी ने व्यक्तिगत रूप से ब्रिटिश अधिकारियों तक पहुंचाया था।
दस्तावेज़ की मूल पंक्तियां: “The political situation in Bengal is a matter of growing anxiety to all those who would like to see stable condition continue in the province… The present ministry has decisively lost all popular support… there is no possibility of Congress returning to power… We are now confronted with the problem as to how the possibility of success of the pro-communist elements can be prevented in the forthcoming election.”
पत्र की प्रमुख दलीलें और मांगें:
*कांग्रेस के पतन और साम्यवाद के प्रसार का दावा: पत्र में तर्क दिया गया कि बंगाल में कांग्रेस सरकार जनसमर्थन खो चुकी है और वयस्क मताधिकार के आधार पर होने वाले चुनाव में उसकी वापसी असंभव है। यदि गैर-वामपंथी ताक़तें एकजुट नहीं हुईं, तो प्रांत पूरी तरह साम्यवादियों (कम्युनिस्टों) के नियंत्रण में चला जाएगा।
*हिंदू महासभा का ‘मध्यमार्गी’ दावा: दिलचस्प बात यह है कि पत्र में संगठन को धुर-दक्षिणपंथी न बताते हुए एक “सेंटर ग्रुप” (मध्यमार्गी ताकत) के रूप में पेश किया गया, जिसने 1943 के बंगाल अकाल और मुस्लिम लीग शासन के दौरान व्यापक राहत कार्य किए थे।
*ब्रिटिश सहयोग की गुहार: कम्युनिस्ट प्रभाव को रोकने के नाम पर पत्र में ब्रिटिश सरकार से चुनावी समर्थन और रणनीतिक मदद की अपील की गई थी।

2. उच्चायोग की ‘पॉलिटिकल रजिस्ट्री‘ (File P/204) और ब्रिटिश रुख
दस्तावेज़ों में ब्रिटिश उच्चायोग (Office of the High Commissioner for the United Kingdom) की आंतरिक लाल फ़ाइल—Political Registry (P/204)—भी शामिल है। इस पर ब्रिटिश राजनयिकों (मि. विल्टन, मि. शैटॉक, मि. ह्यूजेस और ब्रिटिश उच्चायुक्त) के हस्ताक्षर और जनवरी-फ़रवरी 1952 की तारीख़ें दर्ज हैं। यह प्रमाणित करता है कि हिंदू महासभा के इस पत्र को ब्रिटिश साम्राज्य के कूटनीतिक तंत्र ने आधिकारिक तौर पर दर्ज किया और विचारार्थ आगे बढ़ाया।

तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त सर आर्चीबाल्ड नाई (Sir Archibald Nye) ने इस पर टिप्पणी करते हुए दर्ज किया कि जवाहरलाल नेहरू की सरकार कम्युनिस्टों से उतनी ही सख़्ती और कठोरता से निपट रही है, जितनी औपनिवेशिक दौर में भी मुमकिन नहीं थी। नतीजतन, अंग्रेजों ने हिंदू महासभा के प्रस्ताव पर सीधे कोई कदम उठाने से परहेज़ किया, क्योंकि आज़ाद भारत का जनादेश और राजनीतिक संतुलन स्पष्ट रूप से नेहरू और कांग्रेस के पक्ष में खड़ा था।
3. CIA और शीत युद्ध (Cold War) का वैश्विक कोण
यह घटनाक्रम महज़ एक क्षेत्रीय पत्राचार नहीं था, बल्कि यह उस दौर के वैश्विक शीत युद्ध की जटिल राजनीति का हिस्सा था:
*साम्यवाद का भय: 1949 में चीन में माओ की क्रांति और उसके बाद कोरियाई युद्ध के चलते पश्चिमी शक्तियां (अमेरिका और ब्रिटेन) पूरे एशिया में कम्युनिज्म के प्रसार को लेकर भारी दहशत में थीं। वाशिंगटन और लंदन दोनों को चिंता थी कि यदि भारत या बंगाल जैसा रणनीतिक सीमावर्ती राज्य वामपंथियों के प्रभाव में गया, तो पूरा उपमहाद्वीप सोवियत खेमे में जा सकता है।
*सीआईए (CIA) और खुफिया नजरें: अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और ब्रिटिश MI6 इस दौरान भारत के उन तमाम राजनीतिक धड़ों और नेताओं की टोह ले रहे थे जो एंटी-कम्युनिस्ट (कम्युनिस्ट विरोधी) मोर्चे में इस्तेमाल किए जा सकते थे।
*पश्चिमी समर्थन पाने की कोशिश: हिंदू महासभा और उससे जुड़े रणनीतिकारों ने पश्चिमी शक्तियों के इसी डर को भांपते हुए खुद को एक विश्वसनीय कम्युनिस्ट-विरोधी विकल्प के रूप में पेश किया, ताकि पर्दे के पीछे से पश्चिमी ताकतों (अमेरिका/ब्रिटेन) के साधन और कूटनीतिक समर्थन को चुनावी फ़ायदे में बदला जा सके।
4. आशुतोष लाहिड़ी: क्रांतिकारी अतीत से ब्रिटिश चौखट तक का सफ़र
इस पूरे घटनाक्रम के सबसे अहम किरदार आशुतोष लाहिड़ी का व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति के बड़े विरोधाभासों को दर्शाता है:
*सशस्त्र क्रांति और सेलुलर जेल (काला पानी): आशुतोष लाहिड़ी मूल रूप से बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल में भेजा गया था, जहां उन्होंने कठोर यातनाएं झेलीं।
*सावरकर का प्रभाव और वैचारिक बदलाव: अंडमान की जेल में ही उनका संपर्क विनायक दामोदर सावरकर से हुआ। इसके बाद उनके चिंतन में बदलाव आया और वे हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति की ओर मुड़े।
*इतिहास की गहरी विडंबना: जिस क्रांतिकारी ने अपनी जवानी में ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए जेल की कालकोठरी काटी, वही नेता आज़ादी के मात्र चार साल बाद 1951 में उसी ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिनिधियों के पास अपनी घरेलू राजनीति में मदद मांगने के लिए पत्र लेकर पहुंचा।
5. संगठन का आंतरिक बिखराव: जनसंघ का उदय और महासभा की हताशा
इस पत्राचार के पीछे केवल वैचारिक रणनीति ही नहीं, बल्कि हिंदू महासभा का गंभीर आंतरिक संकट भी काम कर रहा था:
*गांधी हत्या के बाद का दबाव: 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा भारी राजनीतिक अलगाव और सामाजिक आक्रोश का सामना कर रही थी।
*डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का अलग होना: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने महासभा को गैर-हिंदुओं के लिए भी खोलने और लोकतांत्रिक राजनीति में व्यापक आधार बनाने का प्रस्ताव रखा था। जब महासभा ने इसे अस्वीकार कर दिया, तो मुखर्जी ने अक्टूबर 1951 में भारतीय जनसंघ (BJS) की स्थापना कर ली।

*जनाधार खिसकने का डर: 1951 की शरद ऋतु में हिंदू महासभा न केवल कांग्रेस और कम्युनिस्टों के सामने कमज़ोर पड़ रही थी, बल्कि नवगठित जनसंघ के कारण उसका अपना पारंपरिक समर्थक वर्ग भी छिटक रहा था। विदेशी ताकतों से गुहार लगाने के पीछे इस आंतरिक क्षरण और चुनावी हाशिए पर जाने की छटपटाहट भी एक बड़ा कारण थी।
6. ऐतिहासिक समानांतर: 1761 बनाम 1951 (विदेशी हस्तक्षेप की दो त्रासदियां)
भारतीय इतिहास के दो भिन्न कालखंडों का तुलनात्मक अध्ययन घरेलू वर्चस्व के लिए ‘विदेशी सत्ता को आमंत्रित करने’ की इस समान प्रवृत्ति को उजागर करता है:-
| पहलू | 1761: शाह वलीउल्लाह | 1951-52: हिंदू महासभा |
| लक्ष्य | मराठों और स्थानीय ताकतों के उभार को रोकना | कम्युनिस्टों और कांग्रेस के प्रभाव को रोकना |
| सहारा | विदेशी अफगान शासक (अहमद शाह अब्दाली) | पूर्व औपनिवेशिक ताकत (ब्रिटिश हुकूमत/कूटनीतिक तंत्र) |
| माध्यम | सैन्य आक्रमण का सीधा निमंत्रण पत्र | चुनाव पूर्व कूटनीतिक, वित्तीय व रणनीतिक समर्थन की गोपनीय अपील |
| वैचारिक आधार | मजहबी वर्चस्व की पुनर्स्थापना | कम्युनिज्म-विरोध के नाम पर अस्तित्व रक्षा |
1761 में शाह वलीउल्लाह द्वारा अब्दाली को बुलाए जाने के परिणामस्वरूप पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई, जिसने उत्तर भारत को अस्थिर कर अंततः औपनिवेशिक गुलामी का मार्ग खोला। ठीक इसी तरह, 1951 में 200 साल तक भारत पर दमन करने वाली ब्रिटिश सत्ता के आगे आज़ाद भारत के पहले चुनाव को प्रभावित करने के लिए अर्जी लगाना संप्रभुता के सिद्धांतों के साथ एक गहरा वैचारिक समझौता था।
(क). 1761: शाह वलीउल्लाह और अहमद शाह अब्दाली का आक्रमण
*18वीं सदी में जब मुगल साम्राज्य का पतन हो रहा था और मराठा शक्ति संपूर्ण भारत में अपने प्रभाव का विस्तार कर रही थी, तब दिल्ली के प्रमुख इस्लामी धर्मशास्त्री शाह वलीउल्लाह देहलवी ने उपमहाद्वीप के सत्ता संतुलन को बदलने के लिए एक कदम उठाया।
*पत्र और निमंत्रण: शाह वलीउल्लाह ने अफगानिस्तान के दुर्रानी साम्राज्य के शासक अहमद शाह अब्दाली को विस्तृत पत्र लिखकर भारत पर आक्रमण करने का सीधा न्योता दिया।
*तर्क और उद्देश्य: पत्र में दलील दी गई थी कि मराठों, सिखों और जाटों के बढ़ते प्रभाव से तत्कालीन सत्ता संरचना समाप्त हो रही है, इसलिए ‘इस्लामी सत्ता की पुनर्स्थापना’ के लिए एक बाहरी सैन्य अभियान आवश्यक है।
परिणाम: इस निमंत्रण के परिणामस्वरूप 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। इस भीषण युद्ध ने न केवल मराठा शक्ति को गहरा आघात पहुंचाया, बल्कि उत्तर भारत को बड़े पैमाने पर नरसंहार, लूट और अस्थिरता की आग में झोंक दिया। इस आंतरिक विखंडन ने अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत पर आधिपत्य का मार्ग प्रशस्त किया।
(ख). 1951-52: ब्रिटिश चौखट पर हिंदू महासभा का पत्राचार
*ठीक इसी तरह की वैचारिक और रणनीतिक विडंबना आज़ादी के ठीक बाद 1951-52 के पहले आम चुनाव के दौरान देखने को मिलती है, जैसा कि ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स के अवर्गीकृत दस्तावेज़ों से सामने आया है।
*पत्र और सहायता की गुहार: 27 अगस्त 1951 को अखिल भारत हिंदू महासभा के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष आशुतोष लाहिड़ी ने कलकत्ता स्थित ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर को एक अत्यंत गोपनीय पत्र सौंपा।
*तर्क और उद्देश्य: पत्र में दावा किया गया कि बंगाल में कांग्रेस अपनी पकड़ खो चुकी है और यदि कम्युनिस्टों (वामपंथियों) के उभार को रोकना है, तो ब्रिटिश हुकूमत को हिंदू महासभा जैसी ताकतों को समर्थन और रणनीतिक सहयोग देना चाहिए।
परिणाम और विडंबना: जिस ब्रिटिश औपनिवेशिक तंत्र ने 200 वर्षों तक भारत के संसाधनों का दोहन किया और स्वतंत्रता सेनानियों पर दमन चक्र चलाया, उसी तंत्र के कूटनीतिक अधिकारियों से आज़ाद भारत के पहले लोकतांत्रिक चुनाव को प्रभावित करने के लिए मदद मांगी जा रही थी।
7. 1952 के चुनावी नतीजे: जनता की अदालत का फैसला
विदेशी चौखट पर की गई इस पूरी कूटनीतिक कवायद का अंतिम परिणाम क्या निकला? इसका जवाब स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव (1951-52) के नतीजों ने साफ़ कर दिया:
*हिंदू महासभा का हश्र: पूरे देश में हिंदू महासभा को मात्र 4 लोकसभा सीटें और लगभग 0.95% वोट शेयर मिला।
*बंगाल का जनादेश: जिस पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों का हौव्वा दिखाकर विदेशी मदद मांगी गई थी, वहाँ जनता ने कांग्रेस को पूर्ण बहुमत दिया और डॉ. बी. सी. रॉय मुख्यमंत्री बने, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित हुई।
निष्कर्ष
‘द प्रिंट’ के इस दस्तावेज़ी खुलासे से सामने आए तथ्य यह सिद्ध करते हैं कि इतिहास नारों और कृत्रिम आख्यानों से नहीं, बल्कि अभिलेखागारों में दर्ज वास्तविक दस्तावेजों से आंका जाता है।
चाहे 1761 का मजहबी आख्यान हो या 1951 का शीतयुद्धीय दक्षिणपंथी पैंतरा—जब भी किसी विचारधारा ने अपनी ही जनता पर अविश्वास कर विदेशी ताकतों की बैसाखियों का सहारा लेना चाहा, इतिहास ने उसे संप्रभुता और जनविवेक के सामने विफल ही दर्ज किया। भारत के लोकतंत्र की शक्ति विदेशी दहलीज़ों पर नहीं, बल्कि उसकी जनता के स्वतंत्र मताधिकार में निहित रही है।
(संदर्भ एवं साभार: इस संपादकीय का आधार ‘द प्रिंट’ [ThePrint] में प्रकाशित प्रवीण स्वामी की खोजी रिपोर्ट, UK नेशनल आर्काइव्स और अवर्गीकृत राजनयिक रिकॉर्ड्स है)
