संदीपदेव । यह महाराष्ट्र के भाजपाई मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस हैं। विधानसभा में यह क्या बोल रहे हैं, आप जानते हैं? वो बोल रहे हैं:- “मुस्लिम समाज को OBC आरक्षण किसने दिया? हमारी सरकार ने दिया।”
“मुस्लिम समाज को उच्च शिक्षा में स्कॉलरशिप किसने दी? हमारी सरकार ने दी।”
मुझे याद है, मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दू विखंडीकरण के संघी प्रयास पर वर्ष 2015 में मैंने अपना पहला लेख लिखा था, भाजपा का एक अंध-समर्थक होने के बावजूद! वर्ष 2020-21 से लगातार आप लोगों को इस पर लेख और वीडियो के जरिए जागरूक करता रहा हूं, परंतु अभी भी संघी-सरकारी हिंदुओं का एक वर्ग ‘स्टॉक होम सिंड्रोम’ का शिकार है!
सरकार के सारे दस्तावेज इसे साबित करते हैं कि संविधान के विपरीत जाकर मुस्लिम आरक्षण की शुरुआत संघी और उनकी सरकारों की ही देन है। भाजपाई नेता भी सदन से लेकर विधानसभा तक इसे गर्व से कहते हैं, लेकिन सोशल मीडिया में संघ के वफादार अपने ‘ब्रेनडेड’ आचरण के जरिए इस सच को झुठलाने के लिए गांधी-नेहरू-अदरख-लहसन सब प्रस्तुत कर देंगे ताकि आप अर्थात् हिंदू समाज इनके जातिवाद को बढ़ा कर ‘हिंदू विनाश’ के असली एजेंडे से भटक जाएं, हमेशा भ्रमित रहें और संघी पार्टी भाजपा और उसके नेता को हिंदू हितैषी समझ कर जिंदगी भर इनकी गुलामी करें, इनको वोट दें!
तो सुनिए और जो हमेशा से आपको लिख-लिख कर जागरूक करने का प्रयास कर रहा हूं, उन्हें सर्च कर फैक्ट चेक करते जाइए! भारत विभाजन के बाद संविधान सभा मेंं मुस्लिम समाज ने आरक्षण मांगा तो सरदार पटेल ने साफ कहा कि आपने देश मांगा, वो आपको मिल गया, फिर भी आप यहीं रहे! अब बड़े भाई (हिंदू) का गला इतना मत दबाइए कि उसका दम निकल जाए। सरदार के नेतृत्व वाली समिति ने SC/ST के अलावा किसी को भी आरक्षण की संस्तुति नहीं थी और अंत में यही लागू हुआ।
आपातकाल के बाद जनता पार्टी की गठबंधन सरकार बनी। इसमें सबसे बड़ी पार्टी संघ की जनसंघ पार्टी थी, जिसके 90 सांसद थे। अटल-आडवाणी इस सरकार में मंत्री थे। इस सरकार के मुखिया मोरारी देसाई थे, जिन पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एजेंट होने का आरोप था और माना जाता था कि CIA ने ही उन्हें प्रधानमंत्री बनवाया था!
लाल बहादुर शास्त्री की मौत में भी CIA की भूमिका साबित हुई थी। CIA को लगा था कि लाल बहादुर शास्त्री के मरते ही मोरारी देसाई प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन ‘कांग्रेस सिंटिकेट’ ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया। इंदिरा के समय रूस और उसकी खुफिया एजेंसी KGB की दखल सरकार में काफी बढ़ गई थी। कहिए कि नेहरू-इंदिरा सोवियत संघ की पिछलग्गू थी तो अमेरिका-CIA ने अपने पूंछ के रूप में संघ-जनसंघ-जनता पार्टी को चुना! उस समय दुनिया अमेरिका-सोवियत संघ के शीतयुद्ध में बंटा था। दुनिया भर की हर पार्टी व नेता, इन्हीं दो खेमों में बंटा था!
लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनते ही CIA के हाथ से चिड़िया उड़ चुकी थी, लेकिन वह प्रयास में जुटी रही! इंदिरा ने केजीबी के सुझाव पर आपातकाल देश पर ठोक दिया। CIA को पुनः अवसर मिल गया। जे.पी.आंदोलन में भी CIA की फंडिंग और भूमिका पर तब सवाल उठे थे और तब यह और स्पष्ट हो गया जब आंदोलन में शामिल लोगों की जगह मोरारी देसाई को प्रधानमंत्री बनवा दिया गया!
बाद में एक अमेरिकी लेखक सेमोर हर्श ने अपनी पुस्तक ‘द प्राइस ऑफ पावर’ में यह खुलासा किया कि मोरारी को CIA 20,000$/वर्ष देती थी। इसे झुठलाने के लिए मोरारी ने उस लेखक पर अमेरिका में केस कर दिया, परंतु मोरारी स्वयं को निर्दोष साबित नहीं कर सके और केस हार गये! अर्थात् मोरारी CIA एजेंट नहीं थे, वह यह साबित नहीं कर पाए!
उसके बाद जानते हैं क्या हुआ? भारत के अंदर अनेक संघी लेखकों ने मोरारजी को निर्दोष साबित करने के लिए न केवल पुस्तकें लिखी, बल्कि संघी प्रकाशकों ने ही इसे छापी भी! आखिर मोरारजी को निर्दोष साबित करने कि चुल संघियों में ही क्यों मची थी? क्या इसलिए कि वह भी उस सरकार और उस नेटवर्क का हिस्सा थे?
उसी संघ की पार्टी जनसंघ के सहयोग वाली मोरारजी सरकार में पहली बार हिंदू समाज को तोड़ने और मुसलमानों को फायदा पहुंचाने का काम अल्पसंख्यक आयोग (1978) और मंडल कमीशन (1979) बनाकर किया गया।
पहली बार OBC के नाम पर हिंदू समाज को जातियों में बांटने और उसकी आड़ में संविधान सभा की भावना के विपरीत जाकर मुसलमानों को आरक्षण देने का खेल आरंभ हुआ। जनता पार्टी के बाद इंदिरा और राजीव गांधी की सरकार बनी और उन्होंने मंडल कमीशन को भारत को बांटने वाला करार देते हुए रद्दी की टोकरी में डाल दिया।
राजीव गांधी ने तो बकायदा अपने संसदीय भाषण में मंडल कमीशन को देश तोड़ने वाला कहा, जिसका जिक्र वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार करते हुए कांग्रेस को आरक्षण विरोधी और स्वयं को आरक्षण चैंपियन साबित करते रहते हैं।
महाराष्ट्र की विधानसभा के इस वीडियो में देवेंद्र फडणवीस भी उसी चैंपियनशिप का दावा कर रहे हैं, जो मोदी संसद में करते रहते हैं!
ज्ञात हो कि मंडल आयोग से पूर्व प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पिछड़े वर्ग की पहचान के लिए काका कालेलकर आयोग का गठन किया था। काका कालेलकर आयोग (1953-1955), जिसे प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाता है, उसकी रिपोर्ट को नेहरू ने रद्दी में डालते हुए कहा था कि इसे लागू करने पर देश की प्रतिभा का हनन होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात का जिक्र संसद में बार-बार कर चुके हैं कि नेहरू ने कालेलकर आयोग को ठंडे बस्ते में डालकर आरक्षण का विरोध किया था!
1989 में संघी पार्टी भाजपा के सहयोग से वी.पी.सिंह की सरकार बनी और उसने CIA के अधूरे एजेंडे को पूरा करते हुए 1990 में मंडल कमीशन लागू कर दिया। अमेरिका की ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ को भारत के समाज में सबसे अधिक किसी ने लागू किया है तो वह पहले संघ-भाजपा समर्थित सरकारों ने और फिर बहुमत मिलने पर भाजपा सरकारों ने लागू किया है।
अब मोरारी सरकार के समय जो काम आरंभ हुआ, उसे प्रोटक्शन संघ की तीसरी सरकार वाजपेई और चौथी मोदी सरकार ने कानून बनाकर किया।
वर्ष 2000 में संविधान का 81वां, 82वां और बाद में 85वां संशोधन कर वाजपेई ने अमेरिकी ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ को ऊंचाई देना आरंभ किया। 81वें संशोधन के माध्यम से वाजपेई सरकार ने अनुच्छेद 16(4B) को लागू किया, जिससे नियमित आरक्षण पर निर्धारित 50% की सीमा को पार करते हुए आरक्षण को आगे बढ़ाया जा सका! वाजपेई ने ‘बैकलॉग व्यवस्था’ लागू कर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा आरक्षण पर 50% की कैंपिंग को बड़ी चालाकी से पार कर लिया!
इसके बाद 82 वां संशोधन के जरिए आरक्षण के मामलों में योग्यता अंकों और मूल्यांकन मानकों में छूट की सुविधा प्रदान की। यही संशोधन है जिसके कारण न्यूनतम अंक की बाध्यता समाप्त हुई और अब आरक्षित वर्ग से शून्य व माइनस अंक वाले भी चुने जा रहे हैं, जिस पर
अभी सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया है! और 2001 में 85 वां संविधान संशोधन के जरिए वाजपेई सरकार ने पदोन्नति में वरिष्ठता की जगह आरक्षण को पैमाना बनाया और इसे लागू कर दिया!
वाजपेई जी के बाद संघ की चौथी सरकार बनी और उसने अमेरिकी ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ का जहर कानून बना-बना कर हिन्दू समाज में ऐसा बोया कि आज हिंदू समाज की एक जाति दूसरे के विरुद्ध तलवार लेकर खड़ी है! इस सरकार ने ‘आंबेडकर’ को एक तरह से नया ‘गॉड’ ही बना डाला है!
मोदी ने आते ही 2015 में SC/ST act को मजबूत किया। हां, याद दिला दूं कि SC/ST act भी भाजपा के सहयोग वाली वी.पी.सिंह की सरकार ने लागू किया था। संघियों के दबाव में राजीव गांधी सरकार ने दोनों सदन से इसे पारित तो करा लिया था, लेकिन इसे लागू नहीं किया था। लागू वी.पी.सिंह और आडवाणी की सरकार ने किया। इसका श्रेय भी इसी मोदी सरकार में चिल्ला-चिल्लाकर राज्यसभा में भाजपा के नेता सुशील मोदी ले चुके हैं!
आगे बढ़ते हैं! मोदी सरकार ने अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015 लाकर इसमें और कठोर प्रावधान सुनिश्चित किया और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दे-दे कर इसका ढिंढोरा पीटा और स्वयं को इसका श्रेय दिया। फिर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जब SC/ST act में बिना जांच गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया तो संसद में 2018 में SC/ST संशोधन अधिनियम (Amendment Act) लाकर मोदी सरकार ने उसे पलट दिया।
इसी साल 2018 में 102वें संशोधन के जरिए संविधान में अनुच्छेद 338बी को शामिल कर पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। और इसी वर्ष 2018 में एक बिल लाकर 1976 से पोलिटिकल गतिविधियों में जो विदेशी फंड आया है, उसकी जांच नहीं होगी, यह सुनिश्चित किया!
याद कीजिए 1976 अर्थात् आपातकाल ( देश में 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक आपातकाल लगा था) और जे.पी.आंदोलन का समय! जेपी आंदोलन में CIA की फंडिंग का आरोप इंदिरा गांधी भी लगा चुकी थी, उसी काल के विदेशी फंडिंग को कानूनी प्रोटक्शन मोदी सरकार ने प्रदान किया? आखिर क्यों? इसका जवाब आप स्वयं से पूछिए?
फिर आंबेडकर को गॉड बनाते हुए ‘पंच-तीर्थ’ की स्थापना, ‘हिसाब चुकता’ की घोषणा आदि मोदी सरकार में तेज होती हुई UGC कानून में सामान्य जातियों के बच्चों को स्वाभाविक अपराधी मानते हुए विश्वविद्यालयों के कैंपस तक में जातिवाद का जहर घोल दिया गया।
जाते-जाते यह बता दूं कि जब भारत में मोरारी देसाई की सरकार ने ‘मंडल कमीशन’ बनाया था, उसी 1970 के दौर में शीत युद्ध में दुनिया के देशों को विखंडित कर अपने हिस्से में करने के लिए CIA से जुड़े विद्वानों ने ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ को जन्म दिया था। अमेरिका में इसके लिए रंग-नश्ल को आधार बनाया गया और भारत में जाति को। अमेरिका अपने यहां अपना ‘समाजवादी’ चेहरा बनाने के लिए इस ‘थ्योरी’ को बढ़ावा दे रहा था तो अन्य देशों में आंतरिक विखंडन को बढ़ाने के लिए अपने एजेंटों द्वारा इसे हवा दे रहा था!
अमेरिकी क्रिटिकल रेस थ्योरी (CRT) एक कानूनी और अकादमिक ढांचा है जो यह जांचता है कि कैसे नस्ल और नस्लवाद अमेरिकी समाज और उसकी संस्थाओं (शिक्षा, न्याय, स्वास्थ्य) में गहराई से समाए हुए हैं, और कैसे ये व्यवस्थागत असमानताओं को जन्म देते हैं। भारत में इसका बीज जाति को आधार बनाकर ‘मंडल कमीशन’ के जरिए संघियों ने बो दिया और 2026 के UGC कानून के जरिए विश्वविद्यालयों तक पहुंचा दिया।
संघी-जनसंघी-भाजपा नेता अमेरिकी ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ के एजेंडे को पूरा करने के लिए 1970 के दशक से आज तक अनवरत जुटे हुए हैं! संघ-भाजपा के लोग ही अमेरिकी सरकार फंडेड #ACYPL में प्रशिक्षित होते हैं, संघ-भाजपा के नेताओं का नाम ही अमेरिकी #EpsteinFiles में आता है, इनके नाम ही #USAID फंड में आता है, यही गर्व से बराक, ट्रंप, बिल गेट्स को खुलेआम अपना यार बताते हैं! बस हिंदू समाज ही इसे न समझने की जिद पाले अपनी लाश के लिए स्वयं ही अपनी चिता सजाने में जुटा हुआ है! धन्यवाद।
