शंकर शरण । संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका में कहा: “यदि कोई हिन्दू सोचे, कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं रहना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है। यदि आप अपने को हिन्दू कहना चाहते हैं, तो आप को विश्वास होना चाहिए कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।” पूछना चाहिए: यदि वे इतना अभेद मानते हैं, तो उन के शिष्य ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का नारा किसलिए दिया? भाजपा और कांग्रेस दोनों का तो लक्ष्य ही नहीं, रास्ता, देश, समाज सब कुछ एक है।
आरएसएस नेता ने अमेरिका में कहा: “यदि कोई हिन्दू सोचे, कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं रहना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है। यदि आप अपने को हिन्दू कहना चाहते हैं, तो आप को विश्वास होना चाहिए कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।”
पूछना चाहिए: यदि वे इतना अभेद मानते हैं, तो उनके शिष्य ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा किसलिए दिया? भाजपा और कांग्रेस दोनों का तो लक्ष्य ही नहीं, रास्ता, देश, समाज सब कुछ एक है।
जब आप इस्लाम व हिन्दू धर्म का लक्ष्य एक मानते हैं; तब आरएसएस एवं कांग्रेस तो सहोदर जैसे हैं — एक ही हिन्दू समाज के जाए! तब इस से इतना द्वेष क्यों? एक ओर, विजातीय, नृशंस, साम्राज्यवादी मतवाद को सनातन धर्म के समान उद्देश्यधारी बता रहे! जबकि घर में ऐसी घृणा कि एक राष्ट्रीय दल को मिटा देने की घोषणा। यह दोहरी मति क्या दर्शाती है?
यह भी पूछें: जब आप ने “हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा” — तब क्या मुसलमानों का ठेका ले लिया, जो उन्हें अतिरिक्त बल पहुँचा कर हिन्दुओं पर चोट करते रहते हैं? इस्लामियों की पैरोकारी करते हैं जिन्हें ताकत, समझ, और नजर की कमी नहीं!
पर सब से ऊपर यह प्रश्न: किस हिन्दू ने कहा कि ‘भारत में मुसलमान नहीं रहना चाहिए’? यदि उत्तर न मिले, तो यह अनुचित आरोप था। उस से हिन्दुओं की घोर बदनामी हुई। पूरी दुनिया में हुई!
आखिर संघ नेता के मुँह से — जो खुद हिन्दू हैं और इतने महत्वपूर्ण जिन के पैर भारत का प्रधानमंत्री छूता है — यह आरोप कि हिन्दू सोचते हैं कि भारत में मुसलमान न रहे, हिन्दुओं को फासिस्ट, असहिष्णु, साबित करने के सिवा और क्या था? अखिल विश्व को संदेश गया कि भारत में मुसलमान पीड़ित, वंचित हैं! क्या यही सच है?
सच तो उलटा है। यहाँ मुस्लिम नेता ही सदैव धमकी देते और दंगे करते रहे हैं। यह पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर ने भी कहा था कि दंगे करना मुस्लिम राजनीति का औजार है। जिस पर तब जिन्ना से लेकर आज के ओवैसी जूनियर तक घमंड भी दिखाते रहे हैं। पश्चिमी पंजाब, सिंध, और कश्मीर से हिन्दुओं को मुस्लिमों ने मार भगाया। शेष भारत के लिए भी वही मकसद है, जिस की झलक असम, बंगाल में मिलती रहती है।
पर संघ नेता ने उलटा ही संदेश दुनिया को दिया! उन का बयान हिन्दुओं पर एक क्रूर चोट है। यहाँ हजार साल से हिन्दू ही इस्लामियों से पीड़ित होता रहा है। तब उसी को उत्पीड़क कहना? आज यदि भारत में न्याय होता तो संघ नेता को कठघरे में खड़ा कर हिसाब लेता। पर अफसोस! अंग्रेजों के जाते ही यहाँ सामुदायिक न्याय उठ गया।
फलत: आज भी भारत के अनेक इलाकों में हिन्दू ही असुरक्षित जीवन झेलते हैं। उस जिहाद से सशंकित जिस का घोषित मकसद दुनिया को गैर-मुस्लिमों (काफिरों) से खाली कराना है। इस क्रम में गत आठ दशकों में ही एक तिहाई से अधिक भारत हिन्दुओं से खाली करा चुका है!
संघ नेता यह सब जानते हैं। क्या उन्होंने कभी कश्मीर में संघ की रैली की है? क्या आज भी कर सकते हैं? जबकि मुसलमान भारत के किसी भी शहर में रैली कर सकते हैं। सो, जिस ने कश्मीर को हिन्दुओं से खाली करा लिया उस पर कुछ कहने के बजाए उन्होंने आक्रामक को ही पीड़ित बता दिया!
वह भी, जब इस्लामी नेता, संगठन अपनी टेक दुहराते रहते हैं। जो उन के संस्थापक की बुनियादी टेक थी। यह मुहम्मद के शब्द थे: ‘‘तुम सुरक्षित रहोगे, अगर इस्लाम कबूल कर लो। यह पूरी दुनिया अल्लाह की और मेरी है।’’ (सहीह बुखारी, 4:53:392)। उसी टेक पर तब से इस्लाम का अभियान बढ़ता गया है।
आज भी मुस्लिम नेता मुहम्मद की बातों को अपना कानून मानते व लागू करते हैं। जो लाहौर, ढाका, श्रीनगर, पहलगाम, आदि में लागू किया। आज संघ-भाजपा राज में भी देश में अनेक गाँव, मुहल्ले हिन्दुओं से खाली हो रहे हैं। संघ के अपने अखबार में भी उस की रिपोर्टें, फोटो समेत छपती रही हैं।
वही इस्लाम का लक्ष्य है। उसी पर बढ़ते, लड़ते उस के लड़ाके जान लेते और देते हैं। उसी टेक पर कि मूर्तिपूजकों, क्रिश्चियनों, नास्तिकों, आदि को सब को इस्लाम कबूल करना होगा। सीधे-सीधे नहीं, तो ‘जेरे खंजर’ (अल्लामा इकबाल)।
क्या हिन्दू धर्म का भी वही लक्ष्य है, जो संघ नेता ने कहा?
तमाम मुहम्मदी दस्तों, खलीफाओं, मौलानाओं, सुल्तानों, लीडरों ने जब जहाँ जितना जोर चला, गैर-मुस्लिमों को यही विकल्प दिया था: इस्लाम या मौत! यह दुनिया भर की तारीख में दर्ज है। वह जगह-जगह अभी भी हो रहा है — जिस समय संघ के नेता उलटे बयान देकर हिन्दुओं को बदनाम कर रहे हैं।
यह कितना बड़ा धर्म-द्रोह, सत्य-द्रोह, देश-द्रोह है — इसे ठंडे दिमाग से परखना चाहिए। जिस समय जम्मू-कश्मीर, मुर्शिदाबाद, मराड, कैराना, उदयपुर, पहलगाम, आदि अनेक जगहों में हिन्दू भगाए और कत्ल किए जा रहे हैं, और जिस पर संघ-भाजपा चुप रहते हैं — उसी समय ये मुस्लिमों को भारत में उत्पीड़ित जैसे होने का सर्टिफिकेट दे रहे हैं!
इस का लाभ उठाते हुए स्थानीय जिहादी जहाँ-तहाँ हिन्दू बस्तियाँ खाली करा लेंगे। जिस का पहले तो समाचार दबाया जाएगा। यदि किसी ने छाप भी दिया, तब कहा जाएगा: ‘आखिर मुसलमान कितना बर्दाश्त करेंगे, प्रतिक्रिया होगी ही’! यानी, भारत में मुसलमानों की हिंसा ‘उत्पीड़ित का प्रतिरोध’ है।
इस झूठी दलील को बल पहुँचाना वह धर्म-द्रोह है जो भारत के हिन्दू नेता अपने ही समाज के विरुद्ध करते रहे हैं। गाँधी, नेहरू से लेकर वाजपेई, भागवत तक ने अपने-अपने तरीके यह किया है — उत्पीड़क जिहाद को ढाल दे देना, और उत्पीड़ित हिन्दू की ही भर्त्सना।
यही करके हिन्दू नेता अपनी मतिहीनता, अज्ञान, और अटपटापन छिपाते रहे हैं। ताकि उन की आरामपसंद राजनीति चलती रहे। ऊपर से महात्मा, उदार, मानवतावादी, चमत्कारी होने का सेहरा भी मिले।
यदि इस अन्याय को कोई कठघरे में खड़ा नहीं करता, तो यह लुप्त नहीं हो जाता! अनेक देसी-विदेशी इतिहासकार इसे दर्ज करते रहे हैं। जिस का कभी खंडन नहीं हुआ, क्योंकि किया ही नहीं जा सकता। केवल मौन के षड्यंत्र से उसे दबाने की कोशिश रही है।
केवल 1947 से अब तक हुई हिंसा में मुसलमानों की तुलना में नौ गुना हिन्दू मारे गए हैं। सामूहिक विस्थापन के आँकड़े भी वही कहते हैं। पाकिस्तान -बंगलादेश से उत्पीड़न के मारे हिन्दू लाखों में भारत आते रहे, जबकि उसी कारण भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिम कोई न थे!
सो, मुस्लिम राजनीति की स्थाई विशेषता रही है: आरोप लगाना, शिकायत करना, माँगें रखना, कोसना, और दंगे करना। हिन्दू राजनीति की स्थाई विशेषता: मान लेना, छूट देना, खुशामद करना, भीरुता, आत्म-निन्दा, और आत्म-समर्पण। इसी क्रम में भारत तोड़ एक अलग इस्लामी ‘पाक’ देश भी बन गया।
उन्हीं विशेषताओं का लाभ उठाकर मुस्लिम नेता बची ‘नापाक’ जमीन भी पाक बनाने की योजना में लगे हुए हैं। क्योंकि बचे भारत में भी किसी शासक ने आज तक हिन्दुओं से नहीं पूछाः कि ‘‘क्या हमारे राज में तुम सुरक्षित महसूस करते हो?’’
यह विगत अस्सी सालों से भारत का सब से उपेक्षित सवाल है। इसीलिए यहाँ नन्दीमर्ग, मराड, गोधरा, कैराना, शाहीन बाग जैसी घटनाएं अनवरत दुहराती हुई हैं। हिन्दुओं पर उत्पीड़न से किसी राजनीतिक हानि का भय नहीं। उन्हें हिन्दू नेता भी बेधड़क चोट पहुँचाते हैं।
इस प्रकार, हिन्दू समाज दरअसल नेतृत्वविहीन है! उस के कथित नेता भ्रामक या निजी स्वार्थ की दुनिया में रहते हैं। इस्लामियों की सेवा, उन से शाबासी पाने, अपने को महात्मा और दैवी बताने की झक पालते हैं। हिन्दुओं से ही वोट, धन और शक्ति हासिल करते हैं, फिर उन्हीं पर चोट करते हैं। यह कितनी मूढ़ता, और कितना विश्वासघात है — इस का हिसाब इतिहास करेगा।
जब वोट लेना हो तब संघ परिवार हिन्दुओं पर एकाधिकार जताता है। यह प्रचार कि दूसरे दलों को वोट देने वाला हिन्दू ‘प्रॉब्लम’ है। वैसे हिन्दू को सोशल मीडिया पर गालियाँ दी जाती हैं। जिसे उन का आईटी सेल प्रेरित करता है। किन्तु जब हिन्दुओं पर संकट आए, तब ‘हमने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा’ कह कर पल्ला झाड़ लेना। यह विश्वासघात नहीं तो क्या है?
पर यही वर्तमान युग की हिन्दू राजनीति है। गाँधीजी से आज तक बार-बार देखी जाती: सज्जन पर चढ़ना और दुर्जन से बचना। अज्ञानी, अहंकारी, आरामपसंद राजनीति। जिसे ज्ञान, न्याय, या कर्तव्य से अधिक कुर्सी से लगाव है। जिस समुदाय में निरंतर ऐसे ही नेता रहें, उस का भविष्य भाग्य-भरोसे ही है।

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Sandeep Ji Ram Ram. Sandeep Ji Sankar Saran Ji ke article bahut hee satik aur gyan vardhak hote hain. Unka likha hua padhana aur Indiaspeakdaily par unke live ko dekhna ek jivant chalchitar ka anubhav krate hain chahe vishay koi bhi ho, lekin jab vo Sangh aur hamari varatman rajneeti par bolte hain tao samay ka pata bhi nahi lagta ki kab 1 ya 1:30 ghanta ho gaya.