संदीप देव। 1967 का वह चुनाव भारत के इतिहास में पहला ऐसा मोड़ था जब कांग्रेस का एकछत्र साम्राज्य पहली बार हिला था और 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनी थीं। इसी राजनीतिक अस्थिरता के दौर में ‘ग्लोबल सिंडिकेट’ (सीआईए) ने भारतीय राजनीति में सीधे वित्तीय निवेश (Electoral Funding) के जरिए अपनी पैठ मजबूत करने का बड़ा दांव खेला था। आइए, इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ में आई सीआईए की फंडिंग पर किस्त-5 पढ़ें
RSS and the Syndicate Files (किस्त-5): 1967 का वह चुनाव: जब भारतीय राजनीति को नियंत्रित करने के लिए सीआईए ने बहाया था पानी की तरह पैसा!
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Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
3 Comments

जब अपने ही गद्दारी पर उतर आए तो परायों को कोसने से क्या फायदा….पराए तो चाहते ही थे इस विशाल देश जिसकी पाँच हजार सालों से अधिक प्राचीन सभ्यता हैं उस पर अपना नियंत्रण स्थापित करना.
संघ एक ऐसी विकृती हैं जिसको फ़र्जी राष्ट्रवाद का मुखौटा लगाकर अंग्रेजों ने यहाँ की असली राष्ट्रवाद की लड़ाई को कमज़ोर करने के लिए तैय्यार किया था.
आज़ादी के लड़ाई में जिनका शून्य योगदान हैं उनसे आप और हम ओर क्या ही अपेक्षा कर सकते हैं ?
Bharat ke loktantar ko political parties ko fund karke CIA jaisie videshi guptchar sanstha control kar rahi hai. Sadharan log kaise political party bana sakte hain, jab ki foreign agencies ka control hai. BJP Sangh to ab puri tarah se America Israel ke ishare par nach rahe hain, desh barbaad kar diya hai.
1950 में संघ कार्यालय में एजेंट बैठाकर, 1967 में पैसा देकर शुरू हुआ CIA का भारत पर अघोषित कब्जा करने का षड्यंत्र आखिर में 2014 में सफल हो ही गया। 1971 के बाद धन के अलावा CIA ने आंदोलनों से भी देश को अस्थिर करने की कोशिश की। ये सब खुलासे देखकर लगता है इमरजेंसी देशहित में थी।