Courtesy Desk. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में RSS और हिंदू महासभा की भूमिका ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद रही है। दस्तावेज़ और इतिहासकारों के अनुसार, दोनों संगठनों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले मुख्य आंदोलन से दूरी बनाए रखी और कई मौकों पर अंग्रेज़ों के साथ सहयोग किया।
RSS ने स्थापना (1925) के बाद से नागरिक अवज्ञा आंदोलन (1930–34) और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन (1942) जैसे बड़े जन आंदोलनों में भाग नहीं लिया। वहीं, हिंदू महासभा ने भी 1942 में ‘भारत छोड़ो’ का खुलकर विरोध किया। इसके प्रमुख नेता वी.डी. सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और गोलवलकर ने आंदोलन को समर्थन देने से इनकार कर दिया।

हिंदू महासभा ने जवाबदेह सहयोग की नीति अपनाते हुए अंग्रेज़ों के साथ सहयोग करने पर जोर दिया। RSS के सदस्यों को अंग्रेजों के लिए ‘नागरिक रक्षक’ के रूप में काम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया। यह भी एक दस्तावेजी सच्चाई है कि हिंदू महासभा के स्वयंसेवकों ने अंग्रेजों को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन को कुचलने में मदद की।
1942 में, हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सिंध और बंगाल में सरकार बनाई। सावरकर ने खुद कानपुर अधिवेशन में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाने का गर्व से जिक्र किया और भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।
RSS की मुखपत्र ‘द ऑर्गनाइज़र’ ने 14 अगस्त 1947 के अंक में तिरंगे को ‘अशुभ और संकट का कारण’ बताया। 15 अगस्त 1947 को RSS मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया गया। संघ ने अपने मुख्यालय पर पहली बार 2002 में तिरंगा फहराया। अंग्रेजों के खिलाफ़ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सबसे बड़े जन आन्दोलनों में RSS और हिंदू महासभा के किसी सदस्य के बलिदान का कोई प्रमाण नहीं है।
इतिहासकारों के अनुसार, वी.डी. सावरकर मुस्लिम लीग और जिन्ना की ही तरह द्विराष्ट्र सिद्धांत को बढ़ावा देने वालों में से एक थे, जिन्होंने देश के विभाजन की नींव रखने में योगदान दिया।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ और तथ्य बताते हैं कि RSS और हिंदू महासभा ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व वाले मुख्यधारा के आंदोलनों का सक्रिय रूप से समर्थन नहीं किया। उनका स्वरूप और कार्यप्रणाली मुख्य रूप से सामाजिक संगठन और राष्ट्रवाद की अपनी परिभाषा पर केंद्रित थी, जिसने उन्हें कई ऐतिहासिक घटनाओं में एक अलग पक्ष लेने पर मजबूर किया।
