१) क्या भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने SHW Partners को अमेरिका में लॉबिंग के लिए हायर किया है?
भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के तहत भारतीय दूतावास ने SHW Partners LLC नामक अमेरिकी लॉबिंग फर्म को अप्रैल 2025 में अमेरिका में लॉबिंग के लिए हायर किया है। यह फर्म पूर्व ट्रंप एडवाइजर जेसन मिलर द्वारा लीड की जाती है।


२) यह किस प्रकार की लॉबिंग है और इस पर भारत की मोदी सरकार कितना खर्च कर रही है।
यह लॉबिंग मुख्य रूप से स्ट्रैटेजिक काउंसल, टैक्टिकल प्लानिंग, गवर्नमेंट रिलेशंस असिस्टेंस, पॉलिसी मैटर्स पर फोकस है, जिसमें व्हाइट हाउस, कैपिटल हिल, स्टेट डिपार्टमेंट और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के साथ मीटिंग्स अरेंज करना, ट्रेड डील नेगोशिएशंस, और हाई-लेवल विजिट्स का सपोर्ट शामिल है। यह ट्रेड टॉक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे इवेंट्स के लिए भी इस्तेमाल किया गया।

भारत सरकार इस पर सालाना $1.8 मिलियन (लगभग ₹15.7 करोड़) खर्च कर रही है, जो $150,000 (लगभग ₹1.3 करोड़) प्रति माह है। इसके अलावा, अगस्त 2025 में एक दूसरी फर्म Mercury Public Affairs को भी तीन महीनों के लिए हायर किया गया, जिस पर $75,000 (लगभग ₹65 लाख) प्रति माह खर्च है, जो फेडरल गवर्नमेंट रिलेशंस, मीडिया रिलेशंस और डिजिटल स्ट्रैटेजी पर फोकस करती है।

३) इस लॉबिंग का अभी तक भारत की सरकार को क्या लाभ मिला है, जबकि अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप भारत पर टैरिफ लगाने से लेकर बार-बार भारत की संप्रभुता पर हमला करते रहे हैं?
इस लॉबिंग का अभी तक भारत सरकार को स्पष्ट और ठोस लाभ नहीं दिखाई देता है। जेसन मिलर ने ट्रंप से मीटिंग्स कीं और फोटोज पोस्ट कीं, जिसमें उन्होंने “फैंटास्टिक वीक” बताया, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दिए (जिसमें 25% रशियन क्रूड ऑयल खरीद पर पेनल्टी शामिल है), भारत को “लॉस्ट टू चाइना” कहा, और भारत की रशियन ऑयल खरीद को “प्रॉफिटियरिंग स्कीम” और “क्रेमलिन का लॉन्ड्रोमैट” करार दिया। ट्रंप ने मोदी को “गुड फ्रेंड” कहा और यूएस-इंडिया रिलेशन को “स्पेशल” बताया, लेकिन एक्शंस में कोई राहत नहीं दी। पीटर नवरो जैसे यूएस एडवाइजर्स ने भारत की आलोचना जारी रखी, और टैरिफ्स से ट्रेड नेगोशिएशंस स्टॉल हो गए। पाकिस्तान को कम टैरिफ (19%) मिला, जबकि भारत पर हमले जारी रहे, जो लॉबिंग की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।
इस पूरे मामले में एक विस्तृत और आलोचनात्मक विश्लेषण ।
यह मामला भारत-अमेरिका संबंधों में एक जटिल गतिशीलता को दर्शाता है, जहां मोदी सरकार ने ट्रंप प्रशासन के साथ बढ़ते तनावों को संभालने के लिए लॉबिंग फर्म्स को हायर किया। SHW Partners की हायरिंग अप्रैल 2025 में हुई, जब ट्रंप ने फिर से सत्ता संभाली (2024 चुनाव के बाद), और भारत रशिया से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहा था—जो अब भारत की कुल जरूरत का 35% है।
यह लॉबिंग मुख्य रूप से ट्रेड डिस्प्यूट्स, टैरिफ्स और रशियन ऑयल इंपोर्ट्स पर फोकस्ड है, लेकिन Mercury जैसी दूसरी फर्म की हायरिंग (ट्रंप के करीबियों से जुड़ी) से पता चलता है कि भारत को एक से ज्यादा चैनल्स की जरूरत पड़ी, शायद SHW की परफॉर्मेंस से असंतुष्टि या ब्रॉडर स्ट्रैटेजी के तहत।
सकारात्मक पहलू: लॉबिंग ने कुछ मीटिंग्स अरेंज कीं, जैसे मिलर की ट्रंप से मुलाकात, और भारतीय अधिकारियों के लिए यूएस डिपार्टमेंट्स के साथ एक्सेस प्रदान किया। यह भारत की डिप्लोमैटिक स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, जो 1950s से यूएस में लॉबिंग करती आ रही है। मोदी और ट्रंप के बीच पर्सनल रिलेशनशिप (जैसे “गुड फ्रेंड” स्टेटमेंट्स) को मजबूत करने में मदद मिल सकती है, जो लॉन्ग-टर्म में ट्रेड डील्स या स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप्स को फायदा पहुंचा सकता है।
आलोचनात्मक पहलू: खर्च काफी ऊंचा है—$1.8 मिलियन सालाना SHW के लिए, प्लस Mercury पर अतिरिक्त—लेकिन रिजल्ट्स निराशाजनक लगते हैं। ट्रंप ने टैरिफ्स बढ़ाए (50%), भारत को चाइना के साथ जोड़ा, और नवरो ने “मोदीज वॉर” जैसे भड़काऊ शब्द इस्तेमाल किए। यह दर्शाता है कि लॉबिंग ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” पॉलिसी के आगे कमजोर साबित हुई, खासकर जब पाकिस्तान को बेहतर डील मिली। आलोचक कह सकते हैं कि यह पैसा बर्बाद है, क्योंकि भारत की संप्रभुता (रशियन ऑयल खरीद) पर हमले जारी हैं, और कोई टैरिफ रिलीफ नहीं मिली। इसके अलावा, ट्रंप के करीबियों (जैसे मिलर, विटर, लांजा) से जुड़ी फर्म्स हायर करना नैतिक सवाल उठाता है, क्योंकि Mercury ने पहले रशियन और चाइनीज इंटरेस्ट्स को लॉबी किया था। कुल मिलाकर, यह भारत की डिपेंडेंसी पर यूएस दबाव को हाइलाइट करता है, लेकिन लॉबिंग की सफलता शॉर्ट-टर्म में कम लगती है—शायद लॉन्ग-टर्म डिप्लोमैसी में फायदा हो, लेकिन अभी तक टेंशन्स बढ़े ही हैं। यह एक ट्रूथ-सीकिंग पर्सपेक्टिव से देखें तो, भारत को अपनी इंडिपेंडेंट फॉरेन पॉलिसी (जैसे रशिया से रिलेशंस) बनाए रखने की कीमत चुकानी पड़ रही है, जबकि यूएस हाइपोक्रिसी (खुद रशियन यूरेनियम इंपोर्ट) दिखा रहा है।
लॉबिंग के लॉन्ग-टर्म प्रभाव
लॉबिंग के लॉन्ग-टर्म प्रभावों का विश्लेषण करना अभी प्रारंभिक चरण में है, क्योंकि SHW Partners और Mercury Public Affairs जैसी फर्म्स को हायर करने का निर्णय अप्रैल-अगस्त 2025 में हुआ था, और वर्तमान तिथि जनवरी 2026 है। इसलिए, ये प्रभाव ज्यादातर अनुमानित और संभावित हैं, जो वर्तमान ट्रेंड्स, विशेषज्ञ विश्लेषणों और राजनीतिक गतिशीलता पर आधारित हैं। मैं इस विश्लेषण को सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ पहलुओं में विभाजित करूंगा, जो विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। ध्यान दें कि लॉबिंग की सफलता ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति, वैश्विक भू-राजनीति (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति से प्रभावित होती है।
सकारात्मक लॉन्ग-टर्म प्रभाव:
- बेहतर डिप्लोमैटिक एक्सेस और रिलेशनशिप बिल्डिंग: SHW Partners (जेसन मिलर के नेतृत्व में) और Mercury जैसी फर्म्स ट्रंप के करीबी सर्कल से जुड़ी हैं, जो भारत को व्हाइट हाउस, कांग्रेस और अन्य संस्थाओं तक सीधी पहुंच प्रदान कर सकती हैं। लॉन्ग-टर्म में, यह भारत-अमेरिका स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को मजबूत कर सकता है, खासकर सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में। उदाहरण के लिए, लॉबिंग ने पहले ही कुछ मीटिंग्स (जैसे ट्रंप के साथ) और ट्रेड नेगोशिएशंस को सुविधाजनक बनाया है, जो भविष्य में टैरिफ रिडक्शन या नई डील्स का आधार बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत की ग्लोबल इकोनॉमिक डिप्लोमैसी को बढ़ावा देगा, जिससे निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में लाभ हो सकता है।
- ट्रेड डील्स और इकोनॉमिक स्टेबिलिटी: यदि लॉबिंग प्रभावी साबित होती है, तो लॉन्ग-टर्म में भारत-अमेरिका ट्रेड डील संभव हो सकती है, जो वर्तमान 50% टैरिफ्स को कम कर सकती है। यह भारत की एक्सपोर्ट्स (जैसे आईटी, फार्मा) को बूस्ट देगा और रेमिटेंस फ्लो ($100 बिलियन+) को सुरक्षित रखेगा। कुछ स्रोतों के अनुसार, यह सप्लाई चेन ऑपर्च्युनिटीज अनलॉक कर सकता है, खासकर चाइना से शिफ्ट हो रहे इंडस्ट्रीज में। इसके अलावा, मोदी-ट्रंप की पर्सनल केमिस्ट्री (जैसे “गुड फ्रेंड” स्टेटमेंट्स) को मजबूत करने से लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक एलाइंस बन सकता है, जो इंडो-पैसिफिक रीजन में चाइना के खिलाफ फायदेमंद होगा
- इमिग्रेशन और वीजा पॉलिसीज पर प्रभाव: कुछ विश्लेषणों में कहा गया है कि लॉबिंग H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड होल्डर्स के लिए फायदेमंद हो सकती है, जिससे अधिक भारतीयों को अमेरिका में अवसर मिल सकते हैं। यह भारत की रेमिटेंस इकोनॉमी को सपोर्ट करेगा
भारत-रूस तेल व्यापार
भारत-रूस तेल व्यापार का वर्तमान परिदृश्य काफी जटिल और भू-राजनीतिक दबावों से प्रभावित है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत ने रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई, जिससे रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ्स के कारण यह व्यापार अब चुनौतियों का सामना कर रहा है। नीचे मैं इस विषय पर विस्तृत जानकारी देता हूं, जिसमें ऐतिहासिक संदर्भ, वर्तमान आंकड़े, प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं शामिल हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ
- 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, जिससे रूसी तेल की कीमतें गिर गईं। भारत ने इस अवसर का फायदा उठाया और रूस से तेल आयात बढ़ाया, जो पहले 2% से कम था, अब 35-40% तक पहुंच गया। इससे भारत को अरबों डॉलर की बचत हुई, क्योंकि रूसी तेल छूट पर उपलब्ध था (लगभग $2-3 प्रति बैरल की छूट)।
- 2023 से भारत ने रूस से तेल आयात में चीन को पीछे छोड़ दिया, और रूस भारत की कुल तेल जरूरत का 40% पूरा करने लगा। हालांकि, यह व्यापार भारत-रूस व्यापार घाटे को बढ़ा रहा है, जो लगभग $59 बिलियन तक पहुंच गया है।
वर्तमान आंकड़े (2025-2026)
2024 में कुल आयात: भारत ने रूस से $52.73 बिलियन का कच्चा तेल आयात किया।
2025 में हिस्सेदारी: रूस ने भारत के कुल तेल आयात का 35% प्रदान किया, जो लगभग 1.5-2 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) था। नवंबर 2025 में आयात 7.7 मिलियन टन (लगभग 1.77 मिलियन bpd) पहुंच गया, जो 6 महीने का उच्चतम स्तर था और कुल आयात का 35.1% था। मूल्य के हिसाब से यह $3.7 बिलियन था।
दिसंबर 2025 में गिरावट: आयात घटकर 1.1 मिलियन bpd हो गया, जो 2022 के बाद सबसे निचला स्तर है। यह अमेरिकी प्रतिबंधों (Rosneft और Lukoil पर) और टैरिफ्स के कारण हुआ। कुछ रिफाइनरियों (जैसे Mangalore Refinery) ने रूसी तेल खरीद बंद कर दी।
जनवरी 2026 की स्थिति: आयात में सुधार की उम्मीद है, क्योंकि Reliance Industries जैसी कंपनियां गैर-प्रतिबंधित रूसी सप्लायर्स से खरीद फिर शुरू कर रही हैं। Nayara Energy (Rosneft समर्थित) भी रिफाइनरी रखरखाव स्थगित कर अधिक आयात कर सकती है। हालांकि, भारत सरकार रिफाइनरियों से साप्ताहिक डेटा मांग रही है ताकि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता कर सके, और आयात 1 मिलियन bpd से नीचे रह सकता है।
प्रभाव और चुनौतियां
- भारत के लिए लाभ: सस्ता रूसी तेल आयात से भारत का तेल आयात बिल कम हुआ (लगभग $9-11 बिलियन की अतिरिक्त लागत से बचत की संभावना FY 2026 में)। यह ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है और मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखता है। भारत ने रूसी तेल से बने रिफाइंड ईंधन को ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को निर्यात भी किया।
- अमेरिकी दबाव: ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% टैरिफ लगाए (अगस्त 2025 में 25% से बढ़ाकर), क्योंकि भारत रूसी तेल खरीदकर “प्रॉफिटियरिंग” कर रहा है और रूस के युद्ध को फंड कर रहा है। इससे भारतीय निर्यात 20.7% गिरा (मई-नवंबर 2025)। भारत अब अमेरिकी तेल आयात बढ़ा रहा है (नवंबर 2025 में 12.6% हिस्सा, 2.8 मिलियन टन)।
- रूस के लिए प्रभाव: प्रतिबंधों से रूसी तेल निर्यात राजस्व 39% घट सकता है (यदि प्राइस कैप $30/बैरल हो)। भारत और चीन की छूट मांग से रूस को नुकसान।
- अन्य चुनौतियां: कुछ भारतीय रिफाइनर (जैसे Indian Oil Corporation) ने रूसी तेल खरीद रोकी, लेकिन राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियां जारी रख रही हैं। भारत पश्चिमी पाखंड का हवाला देता है, क्योंकि अमेरिका और यूरोप खुद रूसी सामान खरीदते हैं।
भविष्य की संभावनाएं और विश्लेषण
भारत रूसी तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ऊर्जा जरूरतों के कारण पूरी तरह बंद नहीं करेगा। 2026 में आयात $9-11 बिलियन बढ़ सकता है, जो ईंधन कीमतें और मुद्रास्फीति बढ़ा सकता है। ट्रंप के दबाव से भारत अमेरिकी तेल, OPEC, Guyana या Brazil की ओर मुड़ सकता है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण: यह व्यापार भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, लेकिन अमेरिकी टैरिफ्स से आर्थिक नुकसान हो रहा है। BRICS जैसे मंचों पर भारत-रूस संबंध मजबूत हो सकते हैं, लेकिन अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की जरूरत है। कुल मिलाकर, यह ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक बचत और भू-राजनीतिक संतुलन का मिश्रण है, लेकिन लंबे समय में विविधीकरण जरूरी है।
इससे पूर्व RSS द्वारा भी अमेरिका में लॉबिंग के लिए एक विदेशी फार्म हायर करने की बात सामने आई थी।
इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा अमेरिका में लॉबिंग के लिए एक विदेशी फर्म को हायर करने की खबरें सामने आई हैं। अमेरिकी सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, आरएसएस ने वाशिंगटन-आधारित लॉबिंग फर्म Squire Patton Boggs (SPB) को अप्रत्यक्ष रूप से हायर किया, जो एक अन्य फर्म State Street Strategies के माध्यम से हुआ। यह खुलासा नवंबर 2025 में Prism Reports नामक मीडिया आउटलेट द्वारा किया गया, जिसमें अमेरिकी सीनेट में दाखिल लॉबिंग डिस्क्लोजर्स का हवाला दिया गया। आरएसएस ने इस आरोप का खंडन किया है, जिसमें कहा गया कि वह भारत में काम करता है और अमेरिका में कोई लॉबिंग फर्म नहीं हायर की गई।
यह बात भी सामने आई थी कि RSS ने जिस फार्म को हायर किया है वह पाकिस्तान के लिए भी लॉबिंग कर चुकी है।
यह बात भी सामने आई है कि आरएसएस द्वारा हायर की गई फर्म Squire Patton Boggs ने पाकिस्तान के लिए भी लॉबिंग की है। SPB पाकिस्तान सरकार के लिए काम करती है और पाकिस्तान से जुड़े क्लाइंट्स का प्रतिनिधित्व करती है। यह खुलासा अमेरिकी लॉबिंग डिस्क्लोजर्स से हुआ, जिसने राजनीतिक विवाद पैदा किया है। कांग्रेस पार्टी ने इसे “राष्ट्रीय हितों के साथ विश्वासघात” बताया है। SPB एक प्रमुख अमेरिकी लॉ फर्म है जो विभिन्न देशों और संगठनों के लिए लॉबिंग करती है, और पाकिस्तान इसके क्लाइंट्स में शामिल है।
इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट:
पृष्ठभूमि और खुलासा नवंबर 2025 में, अमेरिकी मीडिया आउटलेट Prism Reports ने एक जांच रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में दाखिल लॉबिंग डिस्क्लोजर्स का हवाला दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, आरएसएस ने Squire Patton Boggs (SPB) नामक वाशिंगटन-आधारित लॉ फर्म को लॉबिंग के लिए हायर किया। यह हायरिंग सीधे नहीं बल्कि State Street Strategies नामक एक अन्य पब्लिक अफेयर्स फर्म के माध्यम से हुई, जिसने 3 मार्च 2025 को SPB को आरएसएस की ओर से लॉबिंग के लिए नियुक्त किया। 025 की पहली तीन तिमाहियों में SPB को $330,000 (लगभग ₹2.92 करोड़) का भुगतान किया गया। लॉबिंग का उद्देश्य अमेरिकी कांग्रेस में आरएसएस की छवि सुधारना, सांसदों को प्रभावित करना और हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को बढ़ावा देना था।
आरएसएस, जो भारत में एक सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन के रूप में जाना जाता है, भारत में किसी भी कानूनी रूप से पंजीकृत नहीं है (न तो कंपनी एक्ट के तहत, न ही सोसायटी एक्ट या अन्य वैधानिक निकाय के तहत)। फिर भी, यह अमेरिका में लॉबिंग के लिए बड़ी रकम खर्च कर रहा है, जो पारदर्शिता और वैधानिकता के सवाल उठाता है।
पाकिस्तान से जुड़ाव SPB एक अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्म है जो विभिन्न क्लाइंट्स के लिए काम करती है, जिसमें पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तान से जुड़े हित शामिल हैं। अमेरिकी डिस्क्लोजर्स से पता चलता है कि SPB पाकिस्तान के लिए लॉबिंग कर रही है, जो आरएसएस के लिए काम करने के साथ-साथ चल रहा है।
यह जुड़ाव राजनीतिक विवाद का मुख्य कारण बना, क्योंकि आरएसएस खुद को भारत का राष्ट्रवादी संगठन बताता है, जबकि पाकिस्तान भारत का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी है। कांग्रेस ने इसे “पाकिस्तान के आधिकारिक लॉबिंग आर्म” से जुड़ाव बताया और राष्ट्रीय हितों के साथ धोखा करार दिया।
आरएसएस का खंडन आरएसएस के प्रवक्ता सुनील अंबेकर ने इन आरोपों का खंडन किया, जिसमें कहा गया कि “आरएसएस भारत में काम करता है और अमेरिका में कोई लॉबिंग फर्म नहीं हायर की गई।” उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस भारत में पंजीकृत नहीं है, इसलिए अमेरिकी डिस्क्लोजर्स में इसका नाम गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया हो सकता है। हालांकि, डिस्क्लोजर्स में स्पष्ट रूप से आरएसएस का नाम और पता (नागपुर, भारत) उल्लिखित है, जो खंडन पर सवाल उठाता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
- कांग्रेस की आलोचना: कांग्रेस ने आरएसएस पर हमला बोला, जिसमें कहा गया कि यह “राष्ट्रीय हितों का विश्वासघात” है। जयराम रमेश जैसे नेताओं ने X पर पोस्ट कर कहा कि SPB पाकिस्तान के लिए काम करती है, और आरएसएस का यह कदम हास्यास्पद है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर विपक्षी दल ऐसा करता तो बड़ा हंगामा होता।
- बीजेपी और मीडिया की चुप्पी: कई स्रोतों में उल्लेख है कि इस मुद्दे पर बीजेपी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, और मुख्यधारा मीडिया में इसे ज्यादा कवरेज नहीं मिला। अगर कोई अन्य संगठन (जैसे मुस्लिम या विपक्षी) ऐसा करता तो बड़ा विवाद होता।
- अन्य प्रतिक्रियाएं: सोशल मीडिया पर #RSSExposed और #BanRSS जैसे हैशटैग ट्रेंड हुए, जहां लोग आरएसएस की राष्ट्रवाद की छवि पर सवाल उठा रहे हैं।
आलोचनात्मक विश्लेषण
यह मामला आरएसएस की गतिविधियों में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है। आरएसएस भारत में आयकर नहीं देता और पंजीकृत नहीं है, फिर भी विदेश में लाखों डॉलर खर्च कर रहा है, जो विदेशी मुद्रा नियमों और एफसीआरए (FCRA) के उल्लंघन के सवाल उठाता है। पाकिस्तान से जुड़ाव आरएसएस की राष्ट्रवादी छवि के विपरीत है, जो हिंदुत्व और भारत-पाकिस्तान तनाव पर आधारित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश है, लेकिन इससे आरएसएस की वफादारी और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। कुछ स्रोतों में इसे “सोरोसियन इकोसिस्टम” से जुड़ा बताया गया, जो राजनीतिक पूर्वाग्रह दर्शाता है, लेकिन डिस्क्लोजर्स सार्वजनिक हैं। कुल मिलाकर, यह आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को दिखाता है, लेकिन भारत में जांच की मांग बढ़ा रहा है।
क्या भारत की मोदी सरकार से पूर्व की भारत सरकारों ने भी अमेरिका में लॉबिंग के लिए विदेशी फार्म को हायर किया था? सभी सरकारों के समय हुई लॉबिंग और लॉबिंग करने वाली एजेंसी के साथ उस समय भारत को क्या लाभ या हानि हुई थी?
भारत की मोदी सरकार (2014 से) से पूर्व की सरकारों ने भी अमेरिका में लॉबिंग के लिए विदेशी फर्मों को हायर किया था। हालांकि, उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, यह मुख्य रूप से मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार (2004-2014) के दौरान हुआ, जब भारत ने अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील को आगे बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर लॉबिंग की। वाजपेयी सरकार (1998-2004) या उससे पहले की सरकारों (जैसे 1990 के दशक में) के दौरान सरकारी स्तर पर सीधे लॉबिंग फर्मों को हायर करने के स्पष्ट प्रमाण कम मिलते हैं—उस समय लॉबिंग मुख्य रूप से भारतीय-अमेरिकी समुदाय द्वारा की जाती थी, न कि सरकार द्वारा सीधे। भारतीय लॉबिंग की इतिहास अपेक्षाकृत हाल का है, जो 2000 के दशक में तेजी से बढ़ा। नीचे सभी उपलब्ध मामलों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है, जिसमें सरकार, लॉबिंग फर्म, उद्देश्य, खर्च और लाभ/हानि शामिल हैं। यह जानकारी अमेरिकी लॉबिंग डिस्क्लोजर्स (जैसे FARA) और रिपोर्ट्स पर आधारित है।
१. मनमोहन सिंह सरकार (यूपीए, 2004-2014) यह अवधि भारत की अमेरिकी लॉबिंग की सबसे सक्रिय रही, खासकर 2005 से 2010 तक। मुख्य फोकस इंडो-यूएस सिविल न्यूक्लियर डील था, जो भारत की “न्यूक्लियर अलगाव” को समाप्त करने और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने के लिए था। भारत सरकार ने भारतीय दूतावास के माध्यम से फर्मों को हायर किया।
लॉबिंग फर्म्स, खर्च और उद्देश्य:
- Barbour Griffith & Rogers (BGR):
- समय: 2005 से 2010 तक (और उसके बाद भी जारी)।
- खर्च: कुल $2.23 मिलियन (लगभग ₹18 करोड़) 2005 से 2009 तक; 2007 में $630,000 (₹5.2 करोड़), 2008 में $640,000 (₹5.3 करोड़), 2010 में $420,000 (₹3.5 करोड़)। सालाना औसत ₹3.4 करोड़।
- उद्देश्य: न्यूक्लियर डील को अमेरिकी कांग्रेस से पास करवाना, विदेश नीति मुद्दों पर समर्थन जुटाना, मनमोहन सिंह के अमेरिकी दौरे के लिए मीडिया इंटरव्यू और कांग्रेस रेजोल्यूशंस अरेंज करना, मुंबई हमलों (2008) पर अमेरिकी समर्थन हासिल करना, और भारत-पाकिस्तान को “री-हाइफेनेट” (एक साथ जोड़कर देखना) रोकना।
- Venable LLP:
- समय: 2007-2008।
- खर्च: $60,000 प्रति माह (कुल अज्ञात, लेकिन हिस्सा $5 मिलियन 2008 कुल खर्च में)।
- उद्देश्य: डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रभाव वाले कांग्रेस में भारत के हितों की रक्षा, न्यूक्लियर डील का समर्थन, वीजा और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों पर लॉबिंग। 2008 में फायर कर दिया गया।
- Patton Boggs:
- समय: 2008 से।
- खर्च: $350,000 (₹2.9 करोड़) छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट के लिए; $60,000 प्रति माह।
- उद्देश्य: डेमोक्रेटिक प्रभाव वाली कांग्रेस में न्यूक्लियर डील को पुश करना, सुरक्षा सहयोग, वीजा, क्लाइमेट चेंज और ट्रेड बैरियर्स पर लॉबिंग।
कुल खर्च: 2005-2010 तक $10 मिलियन से अधिक (सरकार और प्राइवेट एंटिटीज मिलाकर), जिसमें सरकार का हिस्सा प्रमुख था।
लाभ और हानि:
- लाभ:
- न्यूक्लियर डील की सफलता (2006 में शुरू, 2008 में साइन)—भारत को न्यूक्लियर एनर्जी सहयोग मिला, जो ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत करने में मददगार साबित हुआ। यह भारत-अमेरिका संबंधों में “ट्रांसफॉर्मेशन” लाया।
- मुंबई हमलों (2008) पर अमेरिकी कांग्रेस से रेजोल्यूशन पास, जिसमें भारत की संयम की प्रशंसा और हमलों की निंदा हुई।
- भारत-पाकिस्तान “री-हाइफेनेशन” रोका गया, जिससे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति मजबूत हुई।
- ओबामा प्रशासन में रिचर्ड होलब्रुक के दक्षिण एशिया दूत की भूमिका से भारत को बाहर रखा गया।
- कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका संबंध गर्म हुए, ट्रेड और निवेश बढ़ा, और भारतीय-अमेरिकी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी।
- हानि:
- ऊंचा खर्च ($5 मिलियन केवल 2008 में), जो अमेरिकी राजनेताओं के लिए “कैश काउ” जैसा था और पारदर्शिता के सवाल उठाए।
- भारतीय-अमेरिकी समुदाय में आंतरिक विभाजन (व्यक्तिगत संघर्ष, प्रतिस्पर्धी ग्रुप्स), जिससे प्रयास जटिल हुए।
- अमेरिकी कांग्रेस में न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन पर विरोध, जो भारत की घरेलू राजनीति में विवाद का कारण बना (हालांकि ओवरकम हुआ)।
- कुल मिलाकर, हानि कम थी—लाभ ज्यादा, लेकिन यह विदेशी प्रभाव पर निर्भरता दिखाता है।
२. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (एनडीए, 1998-2004)इस अवधि में सरकारी स्तर पर सीधे अमेरिकी लॉबिंग फर्मों को हायर करने के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। हालांकि, भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने 1990 के दशक से लॉबिंग शुरू की थी, जैसे कश्मीर मुद्दे या पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट (1998) के बाद लगे प्रतिबंधों पर। वाजपेयी सरकार ने अमेरिका के साथ संबंध सुधारने पर फोकस किया (जैसे क्लिंटन-वाजपेयी मीटिंग्स), लेकिन यह डिप्लोमैसी से था, न कि पेड लॉबिंग से। यूएस-इंडिया पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (USINPAC) 2002 में बनी, लेकिन यह समुदाय-आधारित थी, सरकार द्वारा हायर नहीं। कोई स्पष्ट फर्म, खर्च या सरकारी कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिला, इसलिए कोई प्रत्यक्ष लाभ/हानि नहीं।
३. इससे पहले की सरकारें (1990 के दशक से पहले, जैसे नरसिम्हा राव या अन्य) भारतीय लॉबिंग का इतिहास हाल का है—1980 के दशक में केवल 5% अमेरिकी विधायकों को भारत के बारे में पता था। कोई सरकारी हायरिंग के प्रमाण नहीं; मुख्य रूप से भारतीय-अमेरिकी समुदाय द्वारा अनौपचारिक लॉबिंग (जैसे 1990s में कांग्रेस को प्रभावित करना)। कोई फर्म या खर्च का ब्यौरा उपलब्ध नहीं, इसलिए लाभ/हानि लागू नहीं।कुल मिलाकर, लॉबिंग मुख्य रूप से यूपीए के दौरान थी, जिसने न्यूक्लियर डील जैसे बड़े लाभ दिए, लेकिन ऊंचे खर्च की कीमत पर। यह भारत की डिप्लोमैटिक स्ट्रैटेजी का हिस्सा था, जो मोदी सरकार में भी जारी है।
न्यूक्लियर डील का विस्तार
इंडो-यूएस न्यूक्लियर डील: इतिहास, महत्व और विस्तार इंडो-यूएस सिविल न्यूक्लियर डील (जिसे 123 एग्रीमेंट के नाम से भी जाना जाता है) भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह डील मुख्य रूप से भारत को सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रदान करने के लिए थी, जिसने भारत की “न्यूक्लियर अलगाव” की स्थिति को समाप्त किया। नीचे मैं इस डील के इतिहास, महत्व, कार्यान्वयन और हाल के विस्तार (एक्सपैंशन) पर विस्तृत जानकारी देता हूं, जिसमें 2025-2026 के अपडेट्स शामिल हैं। यह जानकारी अमेरिकी और भारतीय सरकारी दस्तावेजों, रिपोर्ट्स और हालिया विकास पर आधारित है।
१. डील का इतिहास और पृष्ठभूमि
- शुरुआत: डील की नींव 18 जुलाई 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बीच रखी गई। यह भारत की न्यूक्लियर एनर्जी जरूरतों को पूरा करने और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने का हिस्सा था। भारत 1974 के पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा था, जो न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) द्वारा लगाए गए थे।
- समझौता: 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने हेनरी हाइड एक्ट पास किया, जिसने भारत को न्यूक्लियर फ्यूल और टेक्नोलॉजी प्रदान करने की अनुमति दी। 2008 में NSG ने भारत को छूट दी, और 2 अक्टूबर 2008 को डील पर हस्ताक्षर हुए।
- मुख्य प्रावधान:
- अमेरिकी कंपनियां भारत में न्यूक्लियर रिएक्टर बना सकती हैं और सिविल न्यूक्लियर फ्यूल प्रदान कर सकती हैं।
- भारत ने अपने सिविल और मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम को अलग करने का वादा किया, जिसमें 14 रिएक्टरों को IAEA निगरानी के तहत रखा गया।
- यह डील भारत को न्यूक्लियर टेस्ट करने की अनुमति नहीं देती, लेकिन अगर भारत टेस्ट करता है तो सहयोग समाप्त हो सकता है।
२. डील का महत्व और प्रारंभिक प्रभाव
- भारत के लिए लाभ:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग (विशेषकर क्लीन एनर्जी) को पूरा करने में मदद। 2008 से पहले भारत की न्यूक्लियर क्षमता 4 GW थी, जो अब 8 GW से अधिक है, और लक्ष्य 2047 तक 100 GW का है।
- अंतरराष्ट्रीय मान्यता: भारत को न्यूक्लियर क्लब में शामिल किया गया, बिना NPT (न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) पर हस्ताक्षर किए।
- आर्थिक विकास: विदेशी निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से न्यूक्लियर इंडस्ट्री का विकास। उदाहरण के लिए, वेस्टिंगहाउस (अमेरिकी कंपनी) ने गुजरात में रिएक्टर बनाने का समझौता किया।
- हानि या चुनौतियां:
- घरेलू विरोध: भारत में वामपंथी दलों ने इसे “अमेरिकी साम्राज्यवाद” बताया, जिससे 2008 में सरकार पर संकट आया।
- देरी: रिएक्टर निर्माण में देरी हुई, जैसे जापान और फ्रांस के साथ समझौते में रुकावटें।
- लागत: न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स महंगे हैं, और सेफ्टी कंसर्न्स (जैसे फुकुशिमा 2011 के बाद) ने प्रगति धीमी की।
३. डील का विस्तार और कार्यान्वयन (2008 से अब तक) डील का “विस्तार” मुख्य रूप से इसके कार्यान्वयन, अतिरिक्त समझौतों और हालिया सुधारों में देखा जा सकता है। यह डील स्थिर नहीं रही बल्कि समय के साथ विकसित हुई है:
- 2010 रीप्रोसेसिंग एग्रीमेंट: भारत को इस्तेमाल किए गए फ्यूल को रीप्रोसेस करने की अनुमति मिली, जो डील का एक महत्वपूर्ण विस्तार था। इससे भारत की न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल स्वतंत्र हुई।
- मोदी सरकार के तहत प्रगति (2014 से):
- 2015 में ओबामा-मोदी मीटिंग में न्यूक्लियर लायबिलिटी इश्यू सॉल्व हुआ, जिससे अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करने को तैयार हुईं।
- 2016 में भारत NSG में शामिल होने की कोशिश की, लेकिन चीन के विरोध से असफल रही।
- 2019 में वेस्टिंगहाउस ने कोवाड़ा (आंध्र प्रदेश) में 6 रिएक्टर बनाने का समझौता किया, जो 7,000 MW क्षमता जोड़ेगा।
- 2020 में भारत-अमेरिका ने न्यूक्लियर एनर्जी पार्टनरशिप पर जोर दिया, जिसमें क्लीन एनर्जी रिसर्च शामिल है।
हालिया विस्तार (2025-2026):
- SHANTI बिल 2025: दिसंबर 2025 में भारतीय संसद ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) बिल पास किया, जो न्यूक्लियर सेक्टर को प्राइवेट और विदेशी कंपनियों के लिए खोलता है।
- यह बिल 2008 डील का प्रत्यक्ष विस्तार है, क्योंकि यह अमेरिकी और अन्य विदेशी कंपनियों को भारत में न्यूक्लियर पावर प्लांट्स में भागीदारी की अनुमति देता है।
- सरकारी एकाधिकार समाप्त: अब प्राइवेट कंपनियां (जैसे टाटा, रिलायंस) और विदेशी फर्म्स (अमेरिकी, फ्रेंच) न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स में निवेश कर सकती हैं।
- लक्ष्य: 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर एनर्जी, जो वर्तमान 8 GW से 10 गुना अधिक है।
- ऊर्जा सुरक्षा: यह बिल भारत की लॉन्ग-टर्म एनर्जी जरूरतों को संबोधित करता है, खासकर क्लाइमेट चेंज और रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्यों के साथ।
- विवाद और बैकलैश: बिल पर पर्यावरणविदों और विपक्ष ने आलोचना की, क्योंकि इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण जोखिम बढ़ सकते हैं। एटॉमिक एनर्जी बिल 2025 को “खतरनाक” बताया गया।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भूमिका
भारतीय-अमेरिकी समुदाय (Indian-American Community) अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों का एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली समूह है, जिसकी संख्या लगभग 4.5 मिलियन है। यह समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था, राजनीति, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और संस्कृति में प्रमुख भूमिका निभाता है। उनकी औसत घरेलू आय $119,000 है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है, और वे सबसे शिक्षित और कानून का पालन करने वाले जातीय समूहों में से एक हैं। नीचे मैं इस समुदाय की प्रमुख भूमिकाओं का विस्तृत विवरण देता हूं, विशेष रूप से भारत-अमेरिका संबंधों, लॉबिंग और राजनीतिक भागीदारी के संदर्भ में।
१. भारत-अमेरिका संबंधों में पुल की भूमिका भारतीय-अमेरिकी समुदाय भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनयिक पुल का काम करता है। वे दोनों देशों के बीच व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और कूटनीति को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए:
- वे भारत की सॉफ्ट पावर (जैसे बॉलीवुड, योग और भारतीय व्यंजन) को अमेरिका में लोकप्रिय बनाते हैं, जो दोनों देशों के लोगों के बीच समझ बढ़ाती है।
- आर्थिक रूप से, वे अमेरिकी कंपनियों में उच्च पदों पर हैं (जैसे Google के CEO सुंदर पिचाई या Microsoft के CEO सत्य नडेला), जो भारत में निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को प्रोत्साहित करते हैं।
- सामाजिक संबंधों को मजबूत करने में अग्रणी भूमिका निभाते हैं, जैसे रेमिटेंस (प्रवास से भेजा गया धन) के माध्यम से भारत की अर्थव्यवस्था को समर्थन।
- यह समुदाय भारत-अमेरिका संबंधों को “ट्रांसफॉर्मेशनल” बनाने में मदद करता है, विशेष रूप से 21वीं सदी में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चाइना के खिलाफ रणनीतिक साझेदारी में।
२. लॉबिंग और नीति प्रभाव भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका में लॉबिंग के माध्यम से भारत के हितों को आगे बढ़ाने में सक्रिय है। वे अमेरिकी कांग्रेस, व्हाइट हाउस और अन्य संस्थाओं को प्रभावित करते हैं:
- प्रेरणा: उन्होंने अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमिटी (AIPAC) से प्रेरणा ली, जो इजरायल के हितों के लिए प्रभावी लॉबिंग करती है। इसी तरह, भारतीय-अमेरिकी ग्रुप्स ने US-India Political Action Committee (USINPAC) और Indian American Impact Fund जैसे संगठन बनाए।
- ऐतिहासिक उदाहरण: 2000 के दशक में, उन्होंने इंडो-यूएस सिविल न्यूक्लियर डील (2008) को पास करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कांग्रेस सदस्यों को प्रभावित किया, जिससे भारत की न्यूक्लियर अलगाव समाप्त हुई।
- वर्तमान प्रयास: वे H-1B वीजा, ग्रीन कार्ड और भारत-अमेरिका ट्रेड डील्स पर लॉबिंग करते हैं। पाकिस्तान के साथ “री-हाइफेनेशन” (भारत-पाक को एक साथ जोड़कर देखना) रोकने में भी सक्रिय। हालांकि, पाकिस्तान सरकार की लॉबिंग से प्रतिस्पर्धा रहती है।
कुल मिलाकर, उनकी लॉबिंग भारत की विदेश नीति को अमेरिका में समर्थन दिलाती है, लेकिन कभी-कभी आंतरिक विभाजन (जैसे हिंदू राष्ट्रवाद vs. सेकुलर विचार) से प्रभावित होती है।
३. राजनीतिक भागीदारी और चुनावी प्रभाव भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिकी राजनीति में तेजी से उभर रहा है, जो अब अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा आप्रवासी समूह है:
चुनावी योगदान: वे राजनीतिक अभियानों में बड़े पैमाने पर दान देते हैं। 2024 चुनाव में, उन्होंने डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों को योगदान दिया, लेकिन ज्यादातर डेमोक्रेट्स को (लगभग 70%)।
- प्रतिनिधित्व: 5 भारतीय-अमेरिकी कांग्रेस सदस्य हैं (जैसे प्रमिला जयपाल, रो खन्ना), और कई राज्य स्तर पर। वे भारत के मुद्दों (जैसे कश्मीर, CAA) पर आवाज उठाते हैं।
- 2024 चुनाव में भूमिका: वे एक महत्वपूर्ण वोट बैंक बने, खासकर स्विंग स्टेट्स में। सर्वे से पता चला कि वे घरेलू मुद्दों (अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य) पर फोकस करते हैं, लेकिन भारत की छवि सुधारने में भी सक्रिय।
४. भारत को लाभ और चुनौतियां
- लाभ: इस समुदाय ने भारत को आर्थिक सहायता ($100 बिलियन+ रेमिटेंस सालाना), टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और राजनीतिक समर्थन प्रदान किया। उन्होंने COVID-19 महामारी में भारत को वैक्सीन और मेडिकल सहायता जुटाने में मदद की।
- चुनौतियां: कभी-कभी वे भारत की आलोचना करते हैं (जैसे मानवाधिकार मुद्दों पर), जो तनाव पैदा करता है। इसके अलावा, अमेरिकी राजनीति में उनकी बढ़ती भूमिका भारत की संप्रभुता पर बहस को प्रभावित कर सकती है।
कुल मिलाकर, भारतीय-अमेरिकी समुदाय भारत की ग्लोबल इमेज और अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने में एक शक्तिशाली ताकत है, लेकिन उनकी भूमिका बहुआयामी और कभी-कभी विवादास्पद होती है।
लॉबिंग संगठनों का विस्तार
लॉबिंग संगठन (Lobbying Organizations) मुख्य रूप से अमेरिका में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने, नीतियों को प्रभावित करने और सरकारी संबंधों को मजबूत करने के लिए काम करते हैं। भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में, ये संगठन भारतीय सरकार, आरएसएस जैसे संगठनों और भारतीय-अमेरिकी समुदाय द्वारा हायर किए जाते हैं। नीचे मैं प्रमुख लॉबिंग फर्मों का विस्तृत विवरण देता हूं, जिसमें उनकी स्थापना, सेवाएं, प्रमुख क्लाइंट्स, विस्तार (expansion) और भारत से जुड़े कार्य शामिल हैं। यह जानकारी अमेरिकी लॉबिंग डिस्क्लोजर्स (जैसे FARA और OpenSecrets) और हालिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। ध्यान दें कि ये फर्में अक्सर राजनीतिक पार्टियों के करीबियों द्वारा चलाई जाती हैं, और उनका विस्तार वैश्विक स्तर पर हुआ है।
१. SHW Partners LLC
- स्थापना और इतिहास: SHW Partners LLC की स्थापना 2021 में जेसन मिलर (Jason Miller) द्वारा की गई, जो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार रह चुके हैं। मिलर ट्रंप के 2016 और 2020 चुनाव अभियानों में शामिल थे। फर्म का मुख्यालय वाशिंगटन डीसी में है, और यह ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” नीति से जुड़े लोगों की टीम से बनी है।


- सेवाएं: फर्म स्ट्रैटेजिक काउंसल, गवर्नमेंट रिलेशंस, मीडिया मैनेजमेंट, पॉलिसी एडवोकेसी और हाई-लेवल मीटिंग्स अरेंज करने पर फोकस करती है। यह विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन के साथ संबंधों को मजबूत करने में माहिर है।
- प्रमुख क्लाइंट्स: भारत के अलावा, फर्म ट्रंप से जुड़े कारोबारियों, विदेशी सरकारों (जैसे सऊदी अरब) और कॉरपोरेट क्लाइंट्स के लिए काम करती है। 2025 में भारत इसका सबसे बड़ा क्लाइंट बना।
- विस्तार (Expansion): फर्म का तेजी से विस्तार हुआ है—2021 में शुरू होने के बाद, 2025 तक इसकी टीम में पूर्व ट्रंप अधिकारी शामिल हो गए, और यह अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट्स पर फोकस कर रही है। इसका वार्षिक राजस्व $10 मिलियन से अधिक हो गया है, मुख्य रूप से ट्रंप के 2024 चुनाव जीत के बाद। भारत के साथ कॉन्ट्रैक्ट ने इसके एशियाई बाजार में विस्तार को बढ़ावा दिया।
भारत से जुड़ाव: अप्रैल 2025 में भारतीय दूतावास ने इसे $1.8 मिलियन ($150,000 प्रति माह) के सालाना कॉन्ट्रैक्ट पर हायर किया। यह ट्रंप के टैरिफ्स (50% तक) के खिलाफ लॉबिंग कर रही है, लेकिन अभी तक स्पष्ट सफलता नहीं मिली।
२. Mercury Public Affairs LLC
- स्थापना और इतिहास: Mercury की स्थापना 1999 में हुई, और यह अमेरिका की प्रमुख लॉबिंग फर्मों में से एक है। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क में है, लेकिन वाशिंगटन डीसी में मजबूत मौजूदगी है। फर्म पूर्व सीनेटर डेविड विटर (David Vitter) और ट्रंप के करीबी डैनिएल अल्वारेज (Danielle Alvarez) जैसे लोगों द्वारा लीड की जाती है।
- सेवाएं: फर्म फेडरल गवर्नमेंट रिलेशंस, मीडिया रिलेशंस, डिजिटल स्ट्रैटेजी, क्राइसिस मैनेजमेंट और पॉलिसी एडवोकेसी प्रदान करती है। यह ट्रंप के 2024 अभियान से जुड़ी है।
- प्रमुख क्लाइंट्स: भारत के अलावा, पाकिस्तान, रूस, चीन और अमेरिकी कंपनियां (जैसे Uber, Pfizer) इसके क्लाइंट्स हैं। 2025 में इसका कुल लॉबिंग राजस्व $50 मिलियन से अधिक रहा।
- विस्तार (Expansion): Mercury का वैश्विक विस्तार तेज हुआ है—2020 से यह यूरोप, एशिया और मिडिल ईस्ट में ऑफिस खोल चुकी है। ट्रंप की वापसी के बाद, इसका स्टाफ 20% बढ़ा, और यह एशियाई बाजार (भारत, पाकिस्तान) पर फोकस कर रही है। 2025 में नए कॉन्ट्रैक्ट्स से इसका राजस्व 30% बढ़ा।
चीन-अमेरिका संबंधों में भूमिका
भारतीय-अमेरिकी समुदाय की चीन-अमेरिका संबंधों में भूमिका काफी महत्वपूर्ण और बहुआयामी है। यह समुदाय, जो अमेरिका में लगभग 4.5 मिलियन लोगों का है, अमेरिकी राजनीति, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को प्रभावित करता है, खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ। नीचे मैं इस भूमिका का विस्तृत विश्लेषण देता हूं, जो विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। मुख्य रूप से, भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका-भारत संबंधों को मजबूत करके अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में भारत को एक काउंटरवेट के रूप में पेश करता है।
१. राजनीतिक प्रभाव और लॉबिंग भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिकी कांग्रेस और व्हाइट हाउस पर प्रभाव डालकर अमेरिका-चीन नीतियों को आकार देता है। वे चीन के खिलाफ सख्त नीतियों का समर्थन करते हैं, जैसे ट्रेड प्रतिबंध, टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा और इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की भूमिका बढ़ाना।
- चीन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण: 2020 के एक सर्वे के अनुसार, लगभग 65% भारतीय-अमेरिकियों की चीन के प्रति नकारात्मक राय है (36% बहुत नकारात्मक, 29% कुछ हद तक नकारात्मक)। विदेश में जन्मे भारतीय-अमेरिकी (67% नकारात्मक) और रिपब्लिकन समर्थक (69% चीन के खिलाफ भारत की सैन्य मदद का समर्थन) अधिक हॉकिश हैं। यह दृष्टिकोण अमेरिकी नीति को चीन के खिलाफ मजबूत बनाने में मदद करता है, जैसे भारत को सैन्य सहायता प्रदान करना।
लॉबिंग संगठन: हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIIDS) जैसे संगठन कैपिटल हिल पर लॉबिंग करते हैं। उदाहरण के लिए, 2024 में टेक्नोलॉजी इमिग्रेशन समिट में उन्होंने H-1B वीजा और AI नीतियों पर प्रभाव डाला, जो चीन के साथ टेक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी हैं। ये प्रयास अमेरिका-भारत संबंधों को मजबूत करते हैं, जो चीन के प्रभाव को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व: प्रमिला जयपाल, रो खन्ना जैसे कांग्रेस सदस्य चीन के खिलाफ विधेयकों का समर्थन करते हैं। 2024 चुनाव में भारतीय-अमेरिकियों के 260,000 से अधिक मतदाताओं ने डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों को प्रभावित किया, खासकर स्विंग स्टेट्स में। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई भारतीय-अमेरिकियों को कैबिनेट पद मिले, जो चीन नीति पर प्रभाव डालते हैं।
२. आर्थिक और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में भूमिका
भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की टेक इंडस्ट्री में प्रमुख है, जो अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर का केंद्र है।
- टेक लीडरशिप: माइक्रोसॉफ्ट (सत्य नडेला), गूगल (सुंदर पिचाई), एप्पल, इंटेल और डेल जैसी कंपनियों के सीईओ भारतीय-अमेरिकी हैं। ये नेता अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करते हैं, जैसे चीनी कंपनियों (जैसे हुआवेई, टिकटॉक) पर प्रतिबंध। H-1B वीजा में 72% भारतीय पेशेवरों का हिस्सा (2023 में 386,000 वीजा) अमेरिका को टैलेंट प्रदान करता है, जो चीन के खिलाफ हेजिंग का हिस्सा है।
आर्थिक पुल: समुदाय की औसत आय $119,000 है, और वे भारत में निवेश को बढ़ावा देते हैं, जो अमेरिका-भारत ट्रेड को मजबूत करता है। यह चीन के खिलाफ सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन में मदद करता है, जैसे सेमीकंडक्टर और फार्मा में। हालांकि, ट्रंप के टैरिफ्स ने भारत को प्रभावित किया, जिससे समुदाय ने लॉबिंग की।
३. भू-राजनीतिक संदर्भ में भूमिका
- चीन के खतरे के खिलाफ गठबंधन: समुदाय अमेरिका-भारत संबंधों को चीन के आक्रामक रुख (जैसे बॉर्डर विवाद) के खिलाफ मजबूत करने में मदद करता है। वे इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की भूमिका को बढ़ावा देते हैं, जैसे क्वाड (US, India, Japan, Australia)। यह अमेरिका को चीन की हेगेमनी रोकने में सहायता करता है।
- पुल की भूमिका: समुदाय दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और राजनयिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है, जो चीन के खिलाफ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करता है। हालांकि, कुछ मामलों में अमेरिकी नीतियां (जैसे टैरिफ्स) भारत को चीन की ओर धकेल सकती हैं, जहां समुदाय संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
आलोचनात्मक विश्लेषण
भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भूमिका सकारात्मक है, क्योंकि यह अमेरिका को चीन के खिलाफ एक विश्वसनीय साझेदार (भारत) प्रदान करता है, लेकिन चुनौतियां भी हैं। कभी-कभी समुदाय के भीतर विभाजन (जैसे डेमोक्रेट्स vs. रिपब्लिकन्स) नीतियों को प्रभावित करता है। इसके अलावा, चीन के साथ तुलना में भारतीय-अमेरिकियों की “सफलता” (व्यापार और राजनीति में) अमेरिकी नीतियों को भारत के पक्ष में झुकाती है, लेकिन यह पारंपरिक चीनी प्रभाव को चुनौती देता है। कुल मिलाकर, यह समुदाय 21वीं सदी की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की बौद्धिक शक्ति को निर्यात करता है, जो अमेरिका-चीन संबंधों को पुनर्परिभाषित कर रहा है।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय की चीन-अमेरिका संबंधों में भूमिका: संक्षिप्त विश्लेषण
भारतीय-अमेरिकी समुदाय (लगभग 4.5 मिलियन) अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में भारत को काउंटरवेट के रूप में मजबूत करता है, मुख्य रूप से राजनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक स्तर पर।
- राजनीतिक प्रभाव: 65% समुदाय की चीन के प्रति नकारात्मक राय; लॉबिंग (HAF, FIIDS) से कांग्रेस में चीन विरोधी विधेयक (ट्रेड प्रतिबंध, सैन्य सहायता) का समर्थन। कांग्रेस सदस्य (जैसे रो खन्ना) और 2024 चुनाव में 260,000 मतदाताओं ने नीतियां प्रभावित कीं।
- आर्थिक/टेक भूमिका: टेक CEOs (नडेला, पिचाई) से H-1B वीजा (72% भारतीय) और सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन को बढ़ावा; चीन की कंपनियों (हुआवेई) पर प्रतिबंध में योगदान। रेमिटेंस ($119,000 औसत आय) से भारत-अमेरिका ट्रेड मजबूत।
- भू-राजनीतिक प्रभाव: इंडो-पैसिफिक में क्वाड और भारत-चीन बॉर्डर विवाद पर समर्थन; अमेरिका को चीन की हेगेमनी रोकने में सहायता।
आलोचना: आंतरिक विभाजन (डेमोक्रेट्स vs. रिपब्लिकन्स) और अमेरिकी टैरिफ्स से चुनौतियां; फिर भी, समुदाय भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करता है।
