जब धरती पर अन्याय बढ़ता है, जब मूल्य शून्य होते हैं और जब समाज अपने सांस्कृतिक मार्ग से भटकने लगता है—तब किसी संत की वाणी भविष्य की दिशा तय करती है। ऐसी ही दिशा लेकर प्रकट हुए हैं ब्रह्मलीन जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी, जिनकी “गौ मतदाता संकल्प यात्रा” आज न केवल बिहार, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की आत्मा को झकझोर रही है।
गौ: केवल पशु नहीं, संस्कृति की श्वास है
आज की दौड़ती-भागती दुनिया में जब जीवन ‘डिजिटल’ हो चला है, तब भी एक ‘गौ’ है जो हमारी ‘आत्मा ’ से जुड़ी है। गौ की प्रसन्न्ता से धरती का धैर्य है, हमारे अन्न का पहला आश्रय है, और हमारी संस्कृति का पहला संस्कार है।
यह यात्रा इस मौन सत्य को शब्द देती है कि गौ का सम्मान केवल आस्था नहीं, अस्तित्व की आवश्यकता है।
“गौ-रक्षा संकल्प”, केवल बिहार नहीं, भारत की पुकार
यह कोई सामान्य यात्रा नहीं है। यह किसी संगठन का एजेंडा नहीं, बल्कि एक जीवित राष्ट्र की आत्मा का आंदोलन है।
12 सितम्बर 2025, को वाराणसी से पटना की ओर प्रारम्भ होकर यह यात्रा बिहार के प्रत्येक कोने में पहुँचेगी सितामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर, गया, औरंगाबाद, रोहतास, भोजपुर, सारण, सीवान, गोपालगंज, चम्पारण, दरभंगा, मुज़फ्फरपुर,खगड़िया, मुंगेर, नालन्दा इत्यादि लगभग सभी प्रमुख जिलों को यह यात्रा छूते हुए आगे बढ़ेगी।
“हर पड़ाव पर नारा नहीं, विचार बोया जाएगा। भाषण नहीं, भावना गूंजेगी। प्रचार नहीं, संस्कार जागेंगे।”
विधर्म नहीं, विवेक की राजनीति चाहिए
आज की राजनीति, वादों और वोटों में सिमट गई है। पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का संदेश साफ है — “मत मतलब का नहीं, मत धर्मनिष्ठा का होना चाहिए ”।
जिस समाज का वोट ‘विकास’ के नाम पर ‘विनाश’ को चुनता है, वहाँ गौ माता की रक्षा केवल नारा बनकर रह जाती है।
यह यात्रा इस चेतना को जगा रही है कि —
“जो गौ को भूलेगा, वो कल को भूल जाएगा।”
“जिसे गौ की चिंता नहीं, उसे जन का प्रतिनिधि कहने का हक नहीं।”
गौ, धर्म और धरा की त्रयी: नव-राष्ट्र की नींव
जहाँ पहले “भ्रष्टाचार, अधर्म और अन्याय” का मंत्र गूंजता था, आज वहां एक नया त्रिकोण खड़ा हो रहा है:
गौ — जीवन का पोषण।
धर्म — जीवन का उद्देश्य।
धरा — जीवन का आधार।
यह यात्रा इसी त्रिकोण को जोड़ती है, एक ऐसी राष्ट्र-नीति की ओर, जो न तो धर्मविहीन है, न ही संस्कार-विहीन।
गौ-वोटर: केवल एक मतदाता नहीं, एक प्रहरी
“गौ मतदाता” — यह केवल एक नया शब्द नहीं, बल्कि एक नया नागरिक निर्माण है।
एक ऐसा मतदाता, जो केवल नीतियों को नहीं देखता, नीतियों के पीछे की नीयत को परखता है।
जो पूछता है —
“क्या तुम्हारे घोषणापत्र में गौ माता का नाम है?”
“क्या तुम्हारे विकास में संस्कृति का स्थान है?”
“क्या तुम्हारी राजनीति केवल कुर्सी के लिए है, या चरित्र के लिए भी?”
अंतिम संदेश
“गौ मतदाता संकल्प यात्रा” एक यात्रा नहीं, एक यज्ञ है जिसमें आहुति है मत की, और प्राप्ति है संस्कृति की।
यह उस भविष्य की नींव है जिसमें गायें सड़कों पर नहीं, संविधान की आत्मा में सुरक्षित होंगी।
अब समय आ गया है — एक “गौ-वोटर” बनने का, एक “संस्कृति-सैनिक” बनने का।
क्योंकि अब केवल राष्ट्र की नहीं, राष्ट्रमाता की पुकार है।
— मोहित हजारे
