शंकराचार्यों के साथ धर्म है
चाणक्य की तरह शिखा खोल लो, पापी-साम्राज्य मिटाना है ;
करो – मरो की बेला आई , अपना – धर्म बचाना है ।
राक्षसराज्य – म्लेच्छशासन है , इससे मुक्ति पाना है ;
भेड़ की खाल में छिपे भेड़िये , इनको मार भगाना है ।
अभी नहीं तो कभी नहीं , वरना हमको मिट जाना है ;
अब्बासी – हिंदू के खूनी – पंजे , इससे देश बचाना है ।
अब तक की सबसे बुरी ये स्थिति , घर के अंदर गद्दार हैं ;
छद्मनाम हिंदू का रखे हैं , पर बहुत बड़े मक्कार हैं ।
कठिन लड़ाई बहुत बड़ी है , पूरी ताकत से लड़नी होगी ;
“यतो धर्मस्ततो जय:” ये उक्ति सत्य साबित होगी ।
शंकराचार्यों के साथ धर्म है , साक्षात धर्म की मूर्ति हैं ;
अब्बासी – हिंदू शैतान हैं पूरे , पापों की प्रतिमूर्ति हैं ।
किसको हृदय-सम्राट बनाया ? हिंदू की भूल भयंकर है ;
इसका प्रायश्चित करना होगा , ये काल तेरा प्रलयंकर है ।
हिंदू ! तेरे काल ये दोनों , अब्बासी – हिंदू व भ्रष्टाचार ;
दोनों को ही मिटाना होगा , तभी मिटेगा अत्याचार ।
देश का शासन अत्याचारी , हिंदू पर करता अत्याचार ;
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू ! चुपचाप सह रहा अनाचार ।
अब चुप रहने का समय नहीं है , वीरोचित हुंकार भरो ;
सारे हिंदू सड़कों पर उतरो , धर्म की जय-जयकार करो ।
सर्वश्रेष्ठ है धर्म – सनातन , सारे हिंदू इसमें आ जाओ ;
पाखंडी-बाबा , नेता व अफसर , ये सारे-पापी दूर हटाओ ।
कालनेमि सम राक्षस हैं ये , रूप बदल हिंदू को ठगते ;
तिलक-त्रिपुंड नाटक-नौटंकी , ये रावण सीता को हरते ।
भारत की हर-एक सीता को , इन रावणों से बचाना होगा ;
“अवतार-कल्कि” के हाथों से ही, इनका बध निश्चित होगा ।
सत्य हो रही भविष्यवाणी , “भविष्य-मालिका” में वर्णित है ;
घड़ा पाप का फूटने वाला , भरा हुआ जिसमें लोहित है ।
एक भी पापी नहीं बचेगा , सौ-करोड़ तक मिट जायेंगे ;
तेंतीस-करोड़ जो धर्मनिष्ठ हैं , वे हिंदू ही बच पायेंगे ।
अब कुछ भी नहीं अपने हाथों में , है सब ईश्वर की इच्छा ;
सबका निर्णय होने वाला है, कितना भी बुरा हो या अच्छा ।
अब्बासी-हिंदू भारत के नेता , बहुत ही बुरा होगा अंत ;
तिल-तिल कर ये मरेंगे सारे , “राम-राज्य” पायेंगे संत ।
“राम-राज्य” हमको पाना है , सारे हिंदू ! आगे आओ ;
शंकराचार्यों के पीछे चलकर , धर्मनिष्ठ – सरकार बनाओ ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
