संदीप देव। आज हनुमान जयंती के पावन अवसर पर नमित मल्होत्रा और निर्देशक नितेश तिवारी ने अपनी महात्वाकांक्षी फिल्म ‘रामायण’ (Rama) का जो टीज़र जारी किया है, वह केवल एक फिल्म की झलक नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ‘सांस्कृतिक सुधार’ का शंखनाद है। वर्षों की प्रतीक्षा और ‘आदिपुरुष’ जैसी विफलता के बाद उपजे संशय के बाद, यह टीज़र एक ठंडी फुहार की तरह आया है, जो आंखों को भव्यता और हृदय को शुचिता का अनुभव कराता है।
विजुअल एस्थेटिक्स: शास्त्रों की ‘भव्यता’ का पुनर्जन्म!
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में जिस अयोध्या और लंका का वर्णन किया है, वह ‘ऐश्वर्य’ और ‘प्रकाश’ से ओत-प्रोत थी। टीज़र में DNEG की तकनीक ने उस ‘दिव्य आभा’ को पकड़ने का सफल प्रयास किया है। यहाँ अयोध्या के प्रासाद केवल पत्थर के ढाँचे नहीं, बल्कि सूर्यवंश की आभा से दीप्त स्वर्णमयी रचनाएँ प्रतीत होती हैं।
सबसे प्रभावशाली क्षण वह है जब पुष्पक विमान की झलक मिलती है। वाल्मीकि रामायण के ‘सुन्दरकाण्ड’ में वर्णित वह विमान, जिसे देखकर स्वयं श्री हनुमान भी ठिठक गए थे, यहाँ अपनी पूरी शास्त्रीय गरिमा में लौटता दिख रहा है। यह कोई डरावना वाहन नहीं, बल्कि स्थापत्य कला का वह शिखर है जो मन की गति से चलता था। नितेश तिवारी ने यहाँ तकनीक को ‘तमाशा’ बनाने के बजाय उसे ‘मर्यादा’ का सेवक बनाया है।
पात्रों का चयन: मर्यादा और संवेदना का संतुलन!
रणबीर कपूर के लुक में वह ‘सौम्यता’ और ‘शांत बल’ दिखाई देता है जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम की पहचान है। वहीं साईं पल्लवी की सादगी माता सीता के उस ‘तपस्वी रूप’ को जीवंत करती है जिसे हम वर्षों से अपनी स्मृतियों में संजोए हुए हैं। यश का ‘रावण’ के रूप में जो ‘सिलुएट’ दिखाया गया है, वह भय से अधिक एक ‘प्रतापी और विद्वान राजा’ के अधिकार का बोध कराता है। अरुण गोविल को राजा दशरथ के रूप में देखना दर्शकों के लिए एक भावनात्मक सेतु (Emotional Bridge) की तरह है, जो हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है।
आदिपुरुष बनाम रामायण: ‘छिछोरेपन’ से ‘पवित्रता’ तक का सफर!
आज के टीज़र की तुलना यदि हम पूर्व में आई ‘आदिपुरुष’ से करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण जैसे विषय को डील करने के लिए केवल ‘बजट’ नहीं, बल्कि ‘विवेक’ और ‘गहन अध्ययन’ की आवश्यकता होती है।
चमगादड़ बनाम दिव्य विमान!
‘आदिपुरुष’ ने पुष्पक विमान को एक डरावने चमगादड़ में बदलकर भारतीय सौंदर्यशास्त्र का अपमान किया था, जबकि नमित मल्होत्रा ने उसे वाल्मीकि जी के वर्णनों के अनुरूप ‘स्वर्णमयी और दिव्य’ रखा है।
डार्क फैंटेसी बनाम सात्विक वैभव!
‘आदिपुरुष’ की लंका किसी कोयले की खदान जैसी ‘गोथिक’ और डरावनी थी, जो भारतीय संस्कृति के विपरीत थी। वर्तमान ‘रामायण’ में लंका का वैभव उसकी ‘स्वर्ण नगरी’ होने की पुष्टि करता है।
संवाद और भाषा!
जहाँ ‘आदिपुरुष’ में मनोज मुंतशिर के ‘छिछोरे’ और ‘टपोरीनुमा’ संवादों ने करोड़ों हिंदुओं की आस्था को चोट पहुँचाई थी, वहीं नितेश तिवारी का विजन भाषा की शास्त्रीय गरिमा और पात्रों के ‘ठहराव’ पर टिका है।
कलाकारों का अवमूल्यन!
‘आदिपुरुष’ ने प्रभास और सैफ अली खान जैसे बड़े सितारों को गलत लुक और घटिया तकनीक के पीछे छिपाकर बर्बाद कर दिया था। इसके विपरीत, नमित मल्होत्रा की फिल्म में तकनीक सितारों के व्यक्तित्व को उभारने का काम कर रही है।
आखिर में…नमित मल्होत्रा की ‘रामायण’ का यह टीज़र उम्मीद जगाता है कि अब हमारी प्राचीन गाथाओं को उन आधुनिक लेखकों और फिल्मकारों के ‘मनमानेपन’ से मुक्ति मिलेगी, जो बिना शास्त्रों को पढ़े उन पर ‘विकृत प्रयोग’ करते हैं। यह फिल्म तकनीक के माध्यम से आस्था को अपमानित करने का नहीं, बल्कि उसे वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करने का एक ईमानदार प्रयास जान पड़ती है।
