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India Speak Daily > वैचारिकी > संपादकीय > राजस्थान निकाय चुनाव: सवर्णों की ‘टैक्टिकल स्ट्राइक’, दिग्गजों के ध्वस्त किले और तुष्टिकरण के प्रयोग की करारी पराजय!
संपादकीय

राजस्थान निकाय चुनाव: सवर्णों की ‘टैक्टिकल स्ट्राइक’, दिग्गजों के ध्वस्त किले और तुष्टिकरण के प्रयोग की करारी पराजय!

ISD News Network
By ISD News Network 7 Min Read
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इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। राजस्थान निकाय चुनाव के परिणामों ने सूबे की सियासत को पारंपरिक दो-दलीय सांचे से बाहर खींचकर एक अभूतपूर्व और विचारोत्तेजक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। 10,244 वार्डों में से भाजपा को 4,179 और कांग्रेस को 3,613 सीटें मिली हैं, लेकिन इस पूरे जनादेश का सबसे मारक सच 2,270 से अधिक सीटों पर निर्दलीयों का परचम लहराना है। 22% से अधिक सीटों पर निर्दलीयों की यह जीत केवल स्थानीय असंतोष नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार, वैचारिक भटकाव और पारंपरिक कोर वोटर के सुनियोजित प्रतिशोध की एक गहरी राजनीतिक दास्तान है।

यूजीसी विवाद की तपिश और सवर्णों का मौन ‘टैक्टिकल वोटिंग’

केंद्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए प्रस्तावित नए यूजीसी समता व भेदभाव-रोधी विनियमों (UGC Regulations) को लेकर राजस्थान के सवर्ण समाज (राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य) के भीतर पिछले कुछ महीनों से गहरा आक्रोश सुलग रहा था।

*असुरक्षा और उपेक्षा की भावना: आंदोलनकारियों का सीधा तर्क था कि इन नियमों के जरिए सामान्य वर्ग के बच्चों को जन्मजात अपराधी बना दिया गया है। जयपुर में करणी सेना की ‘सवर्ण न्याय पैदल यात्रा’ और विभिन्न सामाजिक संगठनों के विरोध प्रदर्शनों ने चेताया था कि सामान्य वर्ग को ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड’ समझने की भूल भारी पड़ेगी।

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*रणनीतिक चोट (Tactical Voting): निकाय चुनाव में सवर्ण और शहरी मध्यम वर्ग के मतदाताओं ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया। यह गुस्सा भाजपा से था, लेकिन यह वोटर कांग्रेस की ओर भी नहीं गया। राहुल गांधी की आक्रामक जातिगत जनगणना और आरक्षण विस्तार की राजनीति के चलते सवर्ण मतदाता कांग्रेस को अपना प्राकृतिक विकल्प नहीं मान सका। मतदाताओं ने अपने बीच के मजबूत, स्थानीय और निर्दलीय चेहरों को चुनकर भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशियों को धूल चटा दी।

अपने ही गढ़ों में ढहे सत्ता के दिग्गज

यह चुनाव सिर्फ वार्ड पार्षदों की हार-जीत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सूबे के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत साख को भी ध्वस्त कर दिया:

*भरतपुर (सीएम भजनलाल शर्मा का गृह जिला): नगर निगम के कुल 65 वार्डों में से निर्दलीयों ने 36 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत का करिश्मा कर दिखाया। सत्ताधारी भाजपा महज 20 और कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट कर रह गई।

*पाली (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह क्षेत्र): 65 वार्डों में कांग्रेस 29 सीटें जीतकर शीर्ष पर रही, जबकि भाजपा 21 पर पिछड़ गई और 15 पर निर्दलीय काबिज हुए।

*झालावाड़ (वसुंधरा राजे का चार दशक पुराना दुर्ग): 40 वर्षों के अभेद्य वर्चस्व के बाद झालावाड़ नगर परिषद भाजपा के हाथ से फिसल गई। कांग्रेस ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि भाजपा 13 पर सिमट गई। पड़ोस के बारां में आम आदमी पार्टी ने 31 सीटें जीतकर पारंपरिक दलों को स्तब्ध कर दिया।

*अजमेर और बीकानेर: अजमेर में साढ़े तीन दशक बाद भाजपा का तिलिस्म टूटा और कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं बीकानेर में भी कांग्रेस ने 42 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।

तुष्टिकरण के आरोप बनाम ‘प्रयोग की दुर्गति’

चुनावी मंचों से कांग्रेस पर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का तीखा प्रहार करने वाली भाजपा ने इस चुनाव में अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में खुद मुस्लिम चेहरे उतारने का दांव चला। साथ ही राज्य सरकार द्वारा अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर लगभग 3400 करोड़ रुपये के पैकेज की चर्चाएं भी जमीन पर तैरती रहीं। लेकिन इस सियासी प्रयोग का जयपुर नगर निगम में जो हश्र हुआ, वह चौंकाने वाला है:

वार्ड संख्याभाजपा प्रत्याशीपरिणाम एवं विजेता
वार्ड 19शाहनवाज अंसारीपराजित (मो. फारूख, कांग्रेस जीते)
वार्ड 109जाकिर खान कायमखानीपराजित (मो. रईस खान, निर्दलीय जीते)
वार्ड 113फरीदुद्दीन ‘जैकी’पराजित (गजनफर अली, कांग्रेस जीते)
वार्ड 117शबाब जहांपराजित (संजीदा बेगम, कांग्रेस जीतीं)
वार्ड 128माजिद खान / माजिद पठानपराजित (मो. इशहाक, निर्दलीय जीते)
वार्ड 136मिजाना मिर्जापराजित (जमीला बेगम, निर्दलीय जीतीं)
वार्ड 137रहीस मंसूरीपराजित (सलमान मंसूरी, कांग्रेस जीते)
वार्ड 146अफसानापराजित (कांग्रेस प्रत्याशी जीतीं)

अल्पसंख्यक मतदाताओं ने भाजपा के सिंबल को सिरे से खारिज करते हुए कांग्रेस या मजबूत निर्दलीय मुस्लिम प्रत्याशियों को तरजीह दी।

इस प्रयोग ने भाजपा को दोहरा नुकसान पहुंचाया—एक तरफ वह अल्पसंख्यक भरोसा जीतने में पूरी तरह नाकाम रही, दूसरी तरफ उसके वैचारिक काडर और संघ समर्थकों के भीतर यह सवाल गहरा गया कि क्या पार्टी सत्ता के फेर में अपने बुनियादी सिद्धांतों से भटक चुकी है।

संगठनात्मक अंतर्कलह और ‘बाड़ाबंदी’ की आहट

निर्दलीयों की इस ऐतिहासिक बाढ़ के पीछे भाजपा संगठन का अंदरूनी सिंडिकेट और मनमाना टिकट वितरण भी रहा। जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर जब मंत्रियों और नेताओं के चहेतों को टिकट बांटे गए, तो बगावत का ज्वालामुखी फूट पड़ा। जीते हुए 2,270 से अधिक निर्दलीयों में साठ फीसदी से ज्यादा वे बागी हैं, जो कल तक भाजपा का झंडा थामे खड़े थे।

अब नतीजे आने के बाद लोकतंत्र का सबसे कुरूप चेहरा सामने आ रहा है। जोधपुर (जहां भाजपा और कांग्रेस 44-44 पर बराबर हैं), अजमेर, भरतपुर और अलवर जैसे महत्वपूर्ण निकायों में बोर्ड बनाने के लिए ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ (खरीद-फरोख्त) का खुला बाजार सज चुका है। दोनों दल अपने पार्षदों और निर्दलीयों को अज्ञात रिसॉर्ट्स में बाड़ाबंदी के लिए भेज रहे हैं।

संपादकीय टिप्पणी:-

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा राजस्थान की 25 में से 11 सीटें हार चुकी थी। यह निकाय चुनाव उस नाराजगी का दूसरा चरण है। यह साफ दिखाता है कि केंद्र और राज्य में ‘डबल इंजन’ होने के बावजूद सामान्य वर्ग (सवर्ण), किसान और छोटे व्यापारी सरकार के कामकाज और नौकरशाही केंद्रित कार्यशैली से दूर होते जा रहे हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में 11 सीटें गंवाने के बाद, 2026 के ये निकाय चुनाव परिणाम भाजपा के लिए खतरे का बड़ा सायरन हैं। जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर सत्ता वैचारिक निष्ठा खोएगी और पारंपरिक समर्थकों की संवेदनाओं को कुचलेगी, तो मतदाता किसी भी दल का बंधक बनने के बजाय ‘तीसरे रास्ते’ से सत्ता का अहंकार तोड़ना बखूबी जानता है। भले ही बाद में पैसे की ताकत से निर्दलीयों को खरीदकर बोर्ड बना लिए जाएं, लेकिन लोकतांत्रिक जमीन खिसक चुकी है।

ISD News Network September 15, 2026
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