संदीप देव। कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की भावुक अपील की। तर्क दिया गया कि इससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और आयात बिल कम होगा। किंतु, जब राष्ट्र का नेतृत्व जनता से ‘त्याग’ की अपेक्षा करता है, तो नैतिकता का तकाजा है कि वह स्वयं को ‘मितव्ययिता’ के पैमाने पर सिद्ध करे। आज भारतीय राजनीति में जिस तरह का ‘राजसी तामझाम’ हावी हो गया है, वह जनता की उम्मीदों और सुझावों के विपरीत एक खतरनाक खाई पैदा कर रहा है।
एयर शो से रोड शो तक: फिजूलखर्ची का उत्सव!
एक तरफ मध्यम वर्ग से निवेश और खपत पर लगाम लगाने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार, अंतहीन रोड शो और आज सोमनाथ में होने वाले ‘एयर शो’ जैसे आयोजनों पर पानी की तरह पैसा और ईंधन बहाया जा रहा है। एक रोड शो में सुरक्षा, बैरिकेडिंग और इवेंट मैनेजमेंट पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यह संसाधनों का अपव्यय है।
जब सोमनाथ की पवित्र भूमि पर आसमान में लड़ाकू विमान करतब दिखाते हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह भक्ति है? भगवान शिव का एयर शो से क्या लेना-देना? शक्ति के इस प्रदर्शन का बोझ अंततः उसी करदाता पर नहीं पड़ता, जिसे सोना न खरीदने की सलाह दी जा रही है? क्या एयर शो वाले विमान ईंधन की जगह पानी से चलते हैं?
विशेष विमान बनाम सामान्य उड़ान: विश्वास का संकट!
यदि नेतृत्व विशेष विमानों और मीलों लंबे काफिले के बजाय सामान्य उड़ानों या सीमित सुरक्षा घेरे में दिखे, तो वह ‘त्याग’ का वास्तविक संदेश होगा। लाल बत्ती भले ही हट गई हो, लेकिन ‘VIP संस्कृति’ अब पहले से कहीं अधिक भव्य और अभेद्य हो चुकी है। मंत्रिमंडल के सदस्यों और सांसदों की जीवनशैली में सादगी का अभाव यह दर्शाता है कि वे जनता के सेवक कम और ‘आधुनिक रियासतों’ के अधिपति अधिक नजर आते हैं।
भत्तों की कटौती और नैतिकता का प्रश्न!
प्रधानमंत्री का रिपोर्ट कार्ड मांगने की बात करना एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। किंतु क्या हमारे सांसद और मंत्री, जो आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं, स्वेच्छा से अपने भत्तों या सुविधाओं का त्याग करेंगे?
जब सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई केवल ‘दिखने वाली’ न होकर ‘चुनने वाली’ (Selective) महसूस होने लगे, तो जनता का भरोसा डगमगाता है। ऊपर से नीचे तक कठोर कार्रवाई का अभाव ही वह कारण है कि सरकारी खजाने पर मंत्रियों की फिजूलखर्ची एक अधिकार मान ली गई है।
जनता का त्याग बनाम सत्ता का राग।
इतिहास गवाह है कि भारतीय जनता ने हमेशा नेतृत्व के एक आह्वान पर अपना सब कुछ न्योछावर किया है—चाहे वह लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर सप्ताह में एक वक्त का उपवास हो या सुभाषचंद्र बोस और इंदिरा गांधी के कहने पर सोने क दान हो या खुद नरेंद्र मोदी के कहने पर गैस सब्सिडी छोड़ना हो। लेकिन आज स्थिति भिन्न है। जनता देख रही है कि उससे बचत की उम्मीद की जा रही है, जबकि सत्ता चुनाव प्रचार, एक प्रदेश में अपनी सरकार बनने पर अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को वहां बुलाकर शक्ति प्रदर्शन करने में व्यस्त है। क्या बंगाल चुनाव के समय और उसके बाद मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के समय जो ईंधन फूंका गया , प्रधानमंत्री उसकी जवाबदेही लेंगे? जनता से त्याग मांगा जा रहा है, जबकि नेता चकाचौंध और भव्य आयोजनों में रमे हैं।
संपादकीय टिप्पणी:-
नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं, आचरण से स्थापित होता है। यदि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश उनकी अपील पर सोना खरीदना बंद कर दे, गाड़ी से चलना बंद कर दे, खाद्य तेल खाना बंद कर दे तो पहले सरकार को ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘चुनावी भव्यता’ पर होने वाले सरकारी धन के अपव्यय को रोकना होगा। जब तक सत्ता अपने भत्तों और हवाई प्रदर्शनों में कटौती नहीं करती, तब तक आम नागरिक को दी गई कोई भी सलाह केवल एक ‘राजनीतिक जुमला’ बनकर रह जाएगी।
नेतृत्व जब स्वयं ‘त्याग’ के मार्ग पर चलता है, तभी वह जनता को साथ चलने का साहस दे पाता है। अन्यथा, यह केवल एक ‘ एकतरफा संवाद’ है जिसमें जनता का श्रम और पसीना सत्ता के वैभव की भेंट चढ़ रहा है।
सत्य को दबने न दें!
सोशल मीडिया हमारी पहुँच को सीमित कर रहा है, लेकिन वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता के प्रति आपकी निष्ठा इस लड़ाई में जीत दिला सकती है। India Speak Daily के विशेष लेख और ऑडियो सीधे प्राप्त करने के लिए हमें सब्सक्राइव करें।
https://indiaspeakdaily.in/category/subscribers-exclusive/
