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India Speak Daily > Blog > Blog > व्यक्तित्व विकास > मनोविश्लेषण > ओशो ने संभोग से समाधि तक जाने की एक कला प्रदान की, जो समझने वाली बात है!
मनोविश्लेषण

ओशो ने संभोग से समाधि तक जाने की एक कला प्रदान की, जो समझने वाली बात है!

Courtesy Desk
Last updated: 2018/02/26 at 8:40 AM
By Courtesy Desk 2.9k Views 8 Min Read
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8 Min Read
India Speaks Daily - ISD News
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ओशो का नाम सुनते ही मस्तिष्क मे एक ही शब्द उभरता है, सेक्स या शायद ओपन सेक्स!

बुद्धत्व, अध्यात्म, प्रेम, ध्यान, ग्यान, वगैरह वगैरह तो सेक्स के बाद गति पकड़ते है। फेसबुक या व्हाट्सअप पर ओशो की ज्यादातर सेक्स से जुड़ी पोस्ट की भरमार रहती है! पता नही क्यों? क्या ये विषय इतना रोचक है? या हम इस विषय से मुक्त होना ही नही चाहतें?

जिसे देखो सेक्स और प्रेम की चर्चा मे भाग लेने को आतुर है। कि मै एक्सपर्ट! मुद्दे की बात ये है कि बहुत लोगो के दिमाग में ये मानसिकता घर कर गई है कि कोई भी महिला ओशो से जुड़ी हूई है! तो वो महिला सेक्सी, लस्टी या चालू है! सेक्स की भूखी है तभी ओशो से जूड़ी है! तुम तो नही जूड़े हो ओशो से! फिर भी तुम भूखे क्यों हो? तुम क्यों सेक्स जैसे विषय के प्रश्न पूछते फिरते हो? और क्या केवल ओशो के लोग ही सेक्स के विषय पे बात करना जानते हैं?

आम आदमी जो ओशो को नही जानता, वो क्यों सेक्स जैसे विषय को आंख उठाकर देखता फिरता है? कोई सेक्सी तस्वीर देखी नहीं कि अंदर का सेक्स जाग उठा और लगे ओशो संयासियों को गालियां देने! ओशो ने तो मात्र एक किताब “संभोग से समाधि की ओर” लिखकर तुम्हारे मन में तहलका मचा दिया, लेकिन तुम क्या कर रहे हो? निंदा भी करते हो तो सेक्स की? जहां से तुम खुद जन्मे! अस्तित्व में आये! जरा ओशो की किताबे उठाकर पढ लो! सेक्स के बारे में वो नही बोला ओशो ने जो तुम्हारे सस्ते से सेक्स साहित्य में लिखा होता है। ओशो ने संभोग से समाधि तक जाने की एक कला प्रदान की, जो समझने वाली बात है।

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ओशो ने कही भी अश्लील शब्दो का इस्तेमाल नहीं किया! ओशो संयासिनी उतनी ही मन और आत्मा से पवित्र हैं, जितना की एक नारी-अस्मिता को होना चाहिये! ये कैसा स्व-निर्णय? कि महिला ओशो से जुड़ते ही चालू और सेक्सुअल हो जाती है! उन्हे अलग अलग पुरूषो की तलाश रहती है! क्या तुम्हे या किसी सामाजिक व्यक्ति को नहीं रहती तलाश किसी स्त्री की? क्यो ओशो संन्यासिन को समाज सम्मान की दृष्टी से नहीं देख पाता है? क्योकि उसके स्वतंत्र विचार होते हैं? इसलिये? क्या ओशो संन्यासिन के जीवन की परिणिती सेक्स ही रह गई है? कितनी सारी संन्यासिन इन बाक्स के स्क्रिनशाट शेयर करती है कि क्या हो गया है लोगो को?

पुरूष क्यो स्त्री को सिर्फ सेक्स की दृष्टी से ही देख पाता है? क्या स्त्री का जीवन यही रह गया है? इन बाक्स में सीधे ऐसे पहुंचते है! जैसे तवायफ के कोठे पर! डू यू लव सेक्स? और कुछ अश्लील चित्र सलंग्न! अरे भाई तुम्हे क्या करना है कि उसे क्या पंसद है और क्या नही! अगर है भी तो वो कोई जंगल में नही है, उसके इर्दगिर्द उसे सब उपलब्ध है। तुम्हारी कहीं कोई जरूरत तो नही है उसे!

एक स्त्री की तरफ से समस्त स्त्री की भावना इससे बेहतर क्या हो सकती है! हां मै एक स्त्री हूं! और जीवन के हर विषय की तरह एक सेक्स जैसे विषय पर भी बात करना कोई चरित्रहीनता नहीं! मुझे एक मर्द चाहिए! यह एक शाश्वत सत्य है। मैं एक औरत हूं तो निश्चित तौर पर मुझे एक मर्द चाहिए। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है। मेरे अंदर जो भावनाएं हैं उन्हें संपूर्ण एक पुरुष ही कर सकता है। मैं जानती हूं कि मेरे इन चंद शब्द से ही कितने लोगों को परेशानी हो रही होगी! कुछ लोग मुझे चरित्रहीन का सर्टिफिकेट भी दे चुके होंगे! जी जरूर दीजिए! किसी के प्रमाणपत्र दे देने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यह एक सच्चाई है कि हर औरत को एक मर्द चाहिए होता है। लेकिन हमारे समाज की परिकल्पना कुछ इस तरह से की गयी है कि औरते संकोच वश कुछ कहती नहीं और उसके इस संकोच को पुरुषवादी समाज अपने तरीके से लेता है। और खुद को औरत का भाग्य विधाता मान बैठता है। औरतों को इस बात का हक ही नहीं है कि वे अपने बारे में कोई निर्णय लें।

प्रकृति ने स्त्री-पुरूष दोनों को गढ़ा! उसे एक दूसरे का पूरक बनाया! उनमें कई ऐसी भावनाएं दी जिसकी पूर्ति दोनों संग-संग करते हैं! विज्ञान भी इस बात को मानता है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है! जब पुरुष और स्त्री एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं तो दोनों में सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन स्राव होता है। जब संबंध थोड़े मजबूत और दीर्घकालीन होते हैं तो ऑक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन जैसे हार्मोंन उन्हें और भी नजदीक लाते हैं। और दोनों एक दूसरे के साथ खुश रहते हैं। यह बताने का आशय सिर्फ यह है कि भावना की प्रतिक्रिया दोनों में एक जैसी ही होती है। ऐसे में यह कैसे सही माना जायेगा कि पुरुष अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति खुल्लम खुल्ला करे और औरत बेचारी सहमी-दबी भावनाओं को नियंत्रित करे और कुंठित हो जाये? अरे भाई! जो आग एक पुरुष को जलाती है वह औरत को भी जलाती है!

फिर यह भेदभाव क्यों? जब प्रकृति ने भावनाएं देने में कजूंसी नहीं की तो समाज क्यों कर रहा है! लड़के अगर किसी लड़की को ‘मस्त’ कह दें, तो यह उनका अधिकार, सुनने वाले मुस्कुरा देंगे! लेकिन लड़कियां सलमान खान को भी ‘सेक्सी’ कह दें तो छिछोरी हो जाती हैं! चालू हो जाती है।

मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि जीने का हक सबको है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष! तो औरत को भी जीने दीजिए! वह जिसके साथ जीना चाहती है! कम से कम उसके शरीर के बारे में तो निर्णय एक पुरुष ना करे! वह खुद समर्थ है! वह जानती है कि उसे किसके साथ अपना शरीर शेयर करना है और किसके साथ नहीं! जबरदस्ती उसे पसंद नहीं! चाहे वह कोई भी करे! बलात्कार एक महिला के साथ जघन्य अपराध है जिसकी माफी नहीं! यह समाज समझे कि औरत पुरुषों से नफरत नहीं करती उसके लिए जीती है! उससे प्रेम करती है।

लेकिन वह पुरुष कौन होगा? जिससे वह प्रेम करेगी यह हक तो एक औरत का ही है! कोई दूसरा यह निर्णय क्यों कर करेगा? तो पुरूषो! कुछ तो मानसिकता को स्वच्छ रखो, यूं किसी पर चालू होने का तमगा ना लगाओ! सम्मान करना सीखो!

ओशो से जूड़ी महिला हो या सामान्य सामाजिक महिला! वो फ्रेंक हो सकती है! ब्रॉड मांइड हो सकती है। हर विषय पर खुलकर बात कर सकती है। दकियानूसी सोच से मुक्त होती हैं! समय के साथ चलने वाली होती हैं। चालू तुम हो सकते हो क्योंकि तुम अपने नजरिये से सबको चालू करार कर देते हो!

एक ओशो प्रेमी महिला की पोस्ट।

साभार: सचित अवस्थी के फेसबुक वाल से|

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TAGGED: Osho, Osho Talks, Osho World
Courtesy Desk February 26, 2018
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2 Comments 2 Comments
  • Avatar Ghanshyam Satyarthy says:
    September 23, 2020 at 6:55 am

    मुझे यह पोस्ट या लेख बहुत अच्छा लगा। महिला भी एक मानव है। उसे भीजीवन जीने की स्वतंत्रता चाहिए। अपने जीवन के बारे में खुद निर्णय करने की आजादी महिलाओं को भी मिलनी चाहिए।
    महिला -पुरुष दोनो को अपनी ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन ध्यान के माध्यम से करके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य पूरा अबश्य करना चाहिए।

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    Reply
  • Avatar R K Rajawat says:
    January 15, 2021 at 9:10 pm

    बहुत ही सही लिखा आपने. समाज में भी बदलाव आ रहा है लेकिन बहुत धीरे है. महिला को भी अपने विचार दबा के रखने की आज के समय में बिल्कुल जरूरत नहीं. तभी, बदलाव संभव है.
    आधुनिक मीडिया इसमें बहुत कुछ कर सकने में संभव हो सकता हे ओर उसका पूरा उपयोग करना चाहिए!
    धन्यवाद!

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