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India Speak Daily > समाचार > मुद्दा > राहुल गाँधी के नाम खुला पत्र
मुद्दा

राहुल गाँधी के नाम खुला पत्र

Courtesy Desk
By Courtesy Desk 7 Min Read
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7 Min Read
India Speaks Daily - ISD News
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प्रिय राहुल अधिकांश भारतीय टटोटरियल आर्मी के पूर्व सिपाही रामकृष्ण ग्रेवाल की ख़ुदकुशी के कारण आहत और छुब्ध है पर मेरा मानना यह है कि आप अपना सारा ध्यान पूर्व सैनिक के परिजनों से राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मिलने में लगाए हुए थे, जहाँ आपका लाव-लश्कर राहुल गाँधी का जय-घोष कर रहा था। हालाँकि मैं बहुत विनम्रता के साथ आपको यह बताना चाहता हूँ कि अस्पताल में जाकर पूर्व सैनिकों के प्रति सहानभूति दिखाना कोई उपर्युक्त स्थान नहीं है, क्योंकि वहां मरीजों के परिजन अपने लोगों के प्रति चिंतित अवस्था में रहते हैं। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आपके और आपके द्वारा शासित सप्रंग सरकार ने वन रैंक वन पेंशन को लेकर जनसमुदाय के सामने जो विचार रखे उन्हें दोहराया जाना जरूरी है।

आपको याद दिल दूं कि जब 2006 में मैं पहली बार संसद आया था, उस समय सप्रंग-1 या सप्रंग-2 के कार्यकाल में मैंने कई बार इस सम्बन्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री,रक्षा मंत्री, सप्रंग अध्यक्ष सभी से मिलकर लंबित पड़े ओआरओपी के क्रियान्वयन को लेकर गुहार लगाई लेकिन इन सभी लोगों ने ‘कुछ नहीं कर सकते’ कह कर असमर्थता जताई या फिर एक लंबी चुप्पी ओढ़े रखी। मैंने 2011 में सर्वप्रथम आपको ओआरओपी मुद्दे व अन्य मुद्दे जैसे सशत्र सेना के मुद्दे पर लिखा था पर नहीं आपने उनका कोई जवाब दिया न इस मुद्दे पर कोई बात की। इस सम्बन्ध में आपको सुधि लेते हुए काफी समय लग गया और 2014 के लोक सभा चुनाव के ठीक पूर्व आप इसे चुनावी हतकंडे की तरह इस्तेमाल करने लगे। इसके बाद मैंने फ़रवरी 2014 में इस सम्बन्ध में आपकी दिलचस्पी की सराहना करते हुए आपको पत्र लिखे।

चुनाव के पहले ही जल्दबाजी में ओआरओपी की घोषणा हुई थो आपके वित्तमंत्री ने इस मुद्दे पर महज 500 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा कर जले पर नमक छिडकने का काम किया, जो अपने आप में पूर्व सैनिको की बढ़ी हुई पेंशन का 10 फीसद भी नहीं था। जबकि मौजूद सरकार ने वित्त मंत्रालय की गंभीर आपत्ति के बावजूद चार दसक पुराणी इस गलती को ठीक करने का जिम्मा उठाते हुए सैनिकों के हक़ में सिर्फ ओ आरओपी की घोषणा की, बल्कि उसे लागू भी किया, जिसकी लगत प्रतिवर्ष करीब 6300 करोड़ रूपए व एक बार लागत 20,000 करोड़ रूपये से अधिक होगी। 1972-73 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के तुरंत बाद ओआरओपी को समाप्त कर दिया था। हालाँकि वर्ष 2002 में कांग्रेस सोनिया गाँधी ने एक राजनैतिक सभा में ओआरओपी में अपनी सहमति जताकर इसकी वकालत की और 2014 से पूर्व इस सम्बन्ध में अपनी राय रखती रहीं, पर इसे किर्यान्वित नहीं किया।

2004 के चुनावों में अपने घोषणा पत्र में भी कांग्रेस ने ओआरओपी को रखा था.आपको यह बात भी याद दिलानी पड़ेगी कि वर्ष 2008 में रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने बताया कि सप्रंग सरकार को ओआरओपी सम्बंधित मांग सही नहीं लगाती लिहाज़ा सप्रंग सरकार ने ओआरओपी संबंधी मांग ख़ारिज कर दी है। उन्होने तब बताया था कि इसके कारण करीब 3500 करोड़ की वित्तीय हानि होगी। मैं जब 2008 में पूर्व सैनिकों के साथ जंतर-मंतर पर बारी-बारी से उपवास पर बैठा या जब पूर्व सैनिकों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया या वर्ष 2009 में जब उन्होंने ओआरओपी लागू न होने से अपने मैडल राष्ट्रपति को वापस कर दिए तब तो न आपने और न अन्य कांग्रेसी नेता ने उनके समर्थन में कुछ भी कहा।

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आपको इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि कांग्रेस शासित सप्रंग सरकार द्वारा ओआरओपी को लागू करने के सम्बन्ध में मनाही के कारण मैंने पूर्व सैनिकों के साथ मिलकर 2011 में कोश्यारी समिति के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत की। जिस पर सप्रंग सरकार ने यह प्रतिक्रिया व्यक्त की कि ओआरओपी के कारण प्रशासनिक, वित्तीय और कानूनी उलझनें आ सकती हैं। अतः इसे लागू करना संभव नहीं,संप्रग-1 एवम संप्रग-2 के कार्यकाल के दौरान मैंने सरकार को इस मुद्दे पर अनगिनत पत्र लिखे, पर मुझे ऐसा कभी भी याद नहीं कि आपने पूर्व सैनिकों के पक्ष में कभी भी एक जुटतात दिखाई हो। यहाँ तक कि अगस्त 2010में मैंने सांसदों को मिलने वाले बढे वेतन को तब तक लेने से इनकार कर दिया जबतक ओआरओपी मुद्दे का निपटारा न हो जाए। सशत्र सेना और पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जो सैनिक कल्याण सहित सशत्र सेना के वोट के अधिकार में कमी को दूर करना, सेवा में लगी सेना एवम उनके परिवार के लोगों के लिए आवासीय कल्याण योजना को बढ़ाना आदि।

राहुल में ऐसा मनाता हूँ की आपको इन बातों का ज्ञान काफी बाद में होता है या उस सम्बन्ध में आपकी करुणा बाद में जागृत होती है। राजनीतिक पार्टियों के पिछले किये को भुला दिया जाता है। और देश को भी यह बात याद नहीं की वह हमारे पूर्व सैनिकों के मामले में चालीस सालों की तुलना में पिछले दो सालों में कितना आगे जा चुका है। ओआरओपी के भीतर अभी भी कुछ जटिल मूलभूत मुद्दे हैं। इस सम्बन्ध में एक सदस्यीय समिति का गठन किया गया है,जिसका काम इन विसंगतियों को दूर करना है। इस समिति ने कुछ ही दिन पूर्व अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है हमें यह रिपोर्ट भी देखनी है। सूबेदार ग्रेवाल की मौत उस भारत पर कलंक के सामान है जो अपनी सशत्र सेनाओं, उनकी सेवाओं, उनके बलिदानों पर नाज करता है। इस बात पर कोई विवाद नहीं कि पिछले कई दशकों से रक्षा मंत्रालय व नौकरशाहों ने पूर्व सैनिकों, सैनिकों की विधवाओं, जवानों व उनके परिवारों द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं के प्रति उदासीन और बेपरवाह रवैय्या अपनाया। इसमें कोई संदेह नहीं की इसमें बदलाव की जरूरत है। जहाँ जायज रानीतिक आक्रोश है, उस पर जरूर धयान दिया जाना चाहिए। राजनीतिक अवसरवादिता और दिखावे की राजनीति तेजी से फीकी होती है और ढोंग और पाखंड तो और तेजी से फीका पड़ता है।

राजीव चंद्रशेखर (राज्यसभा सांसद)
साभार: दैनिक जागरण

Courtesy Desk November 16, 2016
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TAGGED: Congress, Indian Armed Forces, OROP, Rahul Gandhi

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