आज़ादी के बाद भारत भयंकर खाद्य संकट से जूझ रहा था। दो लगातार मानसून की विफलता ने देश को भूख के कगार पर ला दिया था। विदेशी मुद्रा के अभाव में अनाज खरीदना असंभव था। ऐसे में 1954 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर द्वारा हस्ताक्षरित पब्लिक लॉ 480 (पीएल-480), जिसे ‘फूड फॉर पीस’ कार्यक्रम के नाम से जाना गया, भारत के लिए जीवनरेखा बन गया
अगस्त 1956 में भारत के साथ पहला पीएल-480 समझौता हुआ। इस कार्यक्रम के तहत भारत अमेरिकी अनाज डॉलर की जगह रुपये में खरीद सकता था। स्कूली बच्चों को मुफ्त में मिलने लगे दूध का पाउडर, सूजी, गेहूं और डालडा। पूरे देश के स्कूलों में अमेरिका से आए पाउडर दूध से बनी गर्म दूध की प्यालियां बच्चों तक पहुंचने लगीं
1961 में जब जॉन एफ. कैनेडी अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तो भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया अध्याय शुरू हुआ। कैनेडी ने भारत को सालाना लगभग एक अरब डॉलर की सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई, जिससे भारत उस समय अमेरिकी सहायता का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बन गया। खाद्य सहायता के अलावा, कैनेडी प्रशासन ने तारापुर परमाणु संयंत्र और आईआईटी कानपुर जैसी कई बड़ी परियोजनाओं का समर्थन किया
कैनेडी ने नेहरू का स्वागत करने के लिए केवल हवाई अड्डे तक ही नहीं, बल्कि विमान के गेट तक गए थे। नेहरू ने भी कैनेडी को पत्र में लिखा: “हमारा कार्य, चाहे कितना भी बड़ा हो, संयुक्त राज्य अमेरिका से मिली सद्भावना और उदार सहायता से हल्का हो गया है।”
20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर हमला कर दिया। माओ त्से तुंग का उद्देश्य नेहरू को, जो तीसरी दुनिया के नेता के रूप में उभर रहे थे, अपमानित करना था। जब भारतीय सेना के पैर उखड़ने लगे और जवान बड़ी संख्या में हताहत होने लगे, तो नेहरू ने नवंबर 1962 में कैनेडी को पत्र लिखा
पहले पत्र में नेहरू ने लिखा कि भारत को चीनी आक्रमण की लहर को रोकने के लिए परिवहन और लड़ाकू विमानों की जरूरत है। लेकिन इसके तुरंत बाद, घबराहट भरी हालत में, नेहरू ने दूसरा पत्र लिखा जिसे भारत के राजदूत बी.के. नेहरू ने 19 नवंबर को खुद कैनेडी तक पहुंचाया
दूसरे पत्र में नेहरू ने कैनेडी से चीन के खिलाफ हवाई युद्ध में भागीदारी करने का अनुरोध किया। नेहरू ने अमेरिकी वायुसेना के 12 स्क्वाड्रन की मांग की, जिन्हें अमेरिकी कर्मियों द्वारा संचालित किया जाना था क्योंकि भारत के पास आधुनिक रडार कवर नहीं था। इसके अलावा, तिब्बत पर हमला करने के लिए बी-47 बमवर्षक विमानों के दो स्क्वाड्रन की भी मांग की गई
नेहरू ने पत्र में लिखा: “केवल भारत का अस्तित्व ही दांव पर नहीं है, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप या एशिया में स्वतंत्र सरकारों का अस्तित्व भी दांव पर है।” उन्होंने कैनेडी को आश्वस्त भी किया कि इन बमवर्षकों का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं, बल्कि केवल चीन को रोकने के लिए होगा
सीआईए के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडेल ने अपनी किताब ‘जेएफके’ज़ फॉरगॉटन क्राइसिस’ में लिखा है कि कैनेडी ने अपने प्रशासन को युद्ध की तैयारी करने का निर्देश दिया था। कैनेडी मदद के लिए पूरी तरह तैयार थे, हालांकि उन पर पाकिस्तान का दबाव था
लेकिन इससे पहले कि अमेरिका कोई कदम उठाता, चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी। कोलकाता तक पहुंचने की मजबूत स्थिति में आने के बावजूद, चीन को यह डर सताने लगा था कि ब्रिटेन और अमेरिका युद्ध में भारत को सैन्य सहायता देने की तैयारी कर रहे हैं। रीडेल ने लिखा कि अगर युद्ध जारी रहता, तो अमेरिका, भारत और संभवतः ब्रिटेन चीन के खिलाफ एक साथ युद्ध में होते
भारत की पीएल-480 पर निर्भरता को अपमानजनक रूप से “शिप-टु-माउथ” अर्थव्यवस्था कहा जाता था, जहां देश हताशा से अमेरिकी अनाज के जहाजों का इंतजार करता था। यह कार्यक्रम 1960 के दशक में जारी रहा जब तक कि हरित क्रांति ने भारत को खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल नहीं करवा दी
कैनेडी ने भारत के लिए 50 करोड़ डॉलर का सैन्य सहायता पैकेज भी तैयार किया था, जिसमें छह नए पर्वतीय डिवीजनों और वायु रक्षा प्रणालियों के लिए उपकरण शामिल थे। लेकिन नवंबर 1963 में कैनेडी की हत्या के कारण यह पैकेज पूरी तरह से लागू नहीं हो सका!
