राकेश शर्मा। मेरी रेल-यात्रा : पटरियों पर चलता जीवन
भूमिका : पटरियों से जुड़ा एक जीवन-दर्शन
मेरा नाम राकेश कुमार शर्मा है। भारतीय रेल के साथ मेरा संबंध केवल कर्मचारी और संगठन तक सीमित नहीं रहा; यह मेरे जीवन का मार्गदर्शन, मेरी पहचान और मेरी साधना का हिस्सा रहा है। अप्रैल 1990 का वह दिन आज भी मेरी स्मृतियों में उतना ही जीवंत है, जब मैंने उत्तर रेलवे के फिरोजपुर मंडल के अंतर्गत अपनी पहली सेवा प्रारंभ की। उस दिन यह केवल एक नियुक्ति नहीं थी, बल्कि जीवन भर चलने वाली सेवा की यात्रा का आरंभ था।
रेलवे मेरे लिए केवल आजीविका का साधन नहीं रही; यह मेरी पहचान, मेरी निष्ठा और मेरा आत्मसम्मान रही है। सच कहूँ तो रेलवे मेरे रक्त में बहती रही है। मेरे पिता, ताया जी और मेरे कई अन्य रिश्तेदार भी भारतीय रेल सेवा में कार्यरत रहे। मेरा बचपन रेलवे कॉलोनी में बीता, जहाँ ट्रेनों की सीटी, शंटिंग करती गाड़ियों की आवाज़, वर्दीधारी कर्मचारियों का अनुशासित जीवन और रेल समुदाय का सहयोग मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। मेरे कई मित्रों के पिता भी रेलवे में थे। इसलिए मेरा सामाजिक परिवेश ही रेल संस्कृति से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही समयपालन, अनुशासन और संगठनात्मक जीवन मेरे व्यक्तित्व का स्वाभाविक अंग बनते गए।
मेरे 35 वर्ष 9 माह 27 दिन का सेवाकाल केवल समय की गणना नहीं, बल्कि अनुभवों, चुनौतियों, उपलब्धियों और मानवीय संवेदनाओं की सतत यात्रा रही। भारतीय रेल केवल पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों का जाल नहीं है; यह देश की धड़कन है। यह प्रतिदिन करोड़ों लोगों को जोड़ती है—उनके सपनों, संघर्षों और परिवारों से। ऐसे संगठन का हिस्सा होना अपने आप में गौरव का विषय है।
सेवा का आरंभ : मानावाला रेलवे स्टेशन (1990)
अप्रैल 1990 में मेरी पहली नियुक्ति सहायक स्टेशन मास्टर (ASM) के रूप में मानावाला रेलवे स्टेशन पर हुई। यह एक छोटे स्टेशन पर कार्य करने का अनुभव नवप्रवेशी कर्मचारियों के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षण साबित होता है। संसाधन सीमित होते हैं, पर जिम्मेदारियाँ असीमित।
प्रारंभिक तीन महीनों में मैंने गाड़ियों की क्रॉसिंग, सिग्नलिंग प्रक्रिया, लाइन क्लियर व्यवस्था, समय-सारिणी पालन, कंट्रोल से समन्वय, टिकटिंग व्यवस्था, यात्रियों से प्रत्यक्ष संवाद जैसे कार्यों को निकट से समझा। छोटे स्टेशन पर प्रत्येक कर्मचारी को बहु-भूमिका निभानी पड़ती है। इससे मेरे भीतर त्वरित निर्णय क्षमता, अनुशासन और टीमवर्क की भावना विकसित हुई।
यहीं मैंने पहली बार समझा कि स्टेशन मास्टर केवल ट्रेन पास कराने वाला अधिकारी नहीं होता; वह स्टेशन की पूरी व्यवस्था का केंद्र होता है। सुरक्षा, Sanrakhsha, समय-पालन, व्यवस्था और यात्री विश्वास—सब कुछ उसी के नेतृत्व पर निर्भर करता है।
अमृतसर : सीमावर्ती क्षेत्रों में सेवा
मानावाला के पश्चात मेरी नियुक्ति अमृतसर रेलवे स्टेशन में LR ASM के रूप में हुई। अमृतसर धार्मिक, ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्टेशन है। यहाँ कार्य करते हुए मुझे अमृतसर–अटारी, अमृतसर–खेमकरण, अमृतसर–डेरा बाबा नानक और अमृतसर–Pathankot सेक्शनों के अंतर्गत विभिन्न स्टेशनों पर कार्य करने का अवसर मिला।
सीमावर्ती क्षेत्रों में कार्य करते हुए Attari Railway Station, International Interchange point की सुरक्षा व्यवस्था, सतर्कता और विभागीय समन्वय का महत्व और अधिक स्पष्ट हुआ। यहाँ हर गतिविधि सजगता की मांग करती थी। इस अवधि ने मुझे सिखाया कि रेलवे सेवा केवल परिचालन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी है।
तुगलकाबाद : विशाल यार्ड और नियंत्रण की परीक्षा (1992)
वर्ष 1992 में मेरा स्थानांतरण दिल्ली मंडल के तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन में हुआ। तुगलकाबाद यार्ड भारतीय रेल के प्रमुख माल यार्डों में से एक है। विशाल ट्रैक संरचना, निरंतर आती-जाती मालगाड़ियाँ, इंजन शेड, कंट्रोल टॉवर और जटिल सिग्नलिंग प्रणाली—यह सब किसी भी अधिकारी की परीक्षा लेने के लिए पर्याप्त है।
यहाँ मैंने स्टेशन ड्यूटी के साथ-साथ रेलवे टॉवर में ट्रैफिक कंट्रोलर के रूप में भी कार्य किया। ट्रैफिक कंट्रोलर के रूप में मेरी जिम्मेदारी थी—यार्ड का संतुलन बनाए रखना। एक छोटी सी चूक से अनेक ट्रेनों का परिचालन प्रभावित हो सकता था। निरंतर सतर्कता, सूक्ष्म निरीक्षण और टीम समन्वय के बल पर एक अवसर ऐसा आया, जब मैंने तुगलकाबाद रेलवे यार्ड का बैलेंस ‘शून्य’ कर दिया। इतने विशाल यार्ड में यह उपलब्धि आसान नहीं थी। इस पर प्रशासन ने मुझे DRM Award से सम्मानित किया।
इस अवधि ने मुझे यह सिखाया कि रेलवे एक जीवंत प्रणाली है, जहाँ हर सेकंड जिम्मेदारी का महत्व है।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन : अनुभवों की पराकाष्ठा (1998–2026)
वर्ष 1998 में मेरा स्थानांतरण नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में हुआ। यह केवल एक स्टेशन नहीं, बल्कि भारतीय रेल का हृदय है। प्रतिदिन लाखों यात्रियों की आवाजाही, वीआईपी मूवमेंट, त्योहारों का दबाव, मीडिया समन्वय, आपात स्थितियाँ और सभी मंत्रालयों के साथ समन्वय—यह सब यहाँ की दिनचर्या का हिस्सा है।
नई दिल्ली स्टेशन पर कार्य करते हुए मैंने भीड़ प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, उच्च स्तरीय निरीक्षणों की तैयारी, अंतरराष्ट्रीय यात्रियों से संवाद, तथा विभागीय समन्वय का व्यापक अनुभव प्राप्त किया। समय के साथ विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए अंततः 31 जनवरी 2026 में मैं स्टेशन अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुआ।
मेरे लिए यह विशेष गर्व का विषय रहा कि जिस वर्ष मैंने सेवानिवृत्ति ली, उसी वर्ष नई दिल्ली रेलवे स्टेशन ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण किए। यह संयोग मेरे सेवाकाल की स्मृतियों को और अधिक अर्थपूर्ण बना गया।
मानवीय सेवा : मोबाइल युग से पूर्व की चुनौतियाँ
मेरे सेवाकाल का एक अत्यंत भावनात्मक पक्ष वह समय रहा, जब मोबाइल फोन आम नहीं थे। यदि कोई यात्री रास्ता भटक जाता, सामान खो जाता या चोरी हो जाती, तो वह पूर्णतः असहाय हो जाता था। ऐसे समय में रेलवे कर्मचारी ही उसका एकमात्र सहारा होता था।
मैंने अनेक अवसरों पर अपनी जेब से टिकट दिलवाए, भोजन और पानी की व्यवस्था की, तथा जरूरतमंद यात्रियों को सुरक्षित उनके घर तक पहुँचाने की व्यवस्था कराई। यह सब किसी रिकॉर्ड या प्रचार के लिए नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य के रूप में किया। ऐसे सैकड़ों अनुभव मेरे सेवाकाल की सबसे बड़ी पूँजी हैं।
इसी सेवा-भावना के कारण वर्ष 2006 में मुझे जनरल मैनेजर (GM) अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान मेरे लिए व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक सेवा-दृष्टि की मान्यता था।
Lost & Found : सेवा से नवाचार तक (2016)
वर्ष 2016 में मैंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से गुम और लावारिस सामान को उसके वास्तविक मालिक तक पहुँचाने का विचार प्रारंभ किया। 06 अप्रैल 2016 से PNR और मोबाइल नंबर के माध्यम से यात्रियों से संपर्क कर सामान लौटाने की प्रक्रिया शुरू की गई। धीरे-धीरे यह पहल व्यापक अभियान बन गई।
1963 से अधिक मामलों में यात्रियों को उनका सामान सुरक्षित लौटाया गया, जिनमें 42 अंतरराष्ट्रीय यात्री भी शामिल थे। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में इस पहल की सराहना हुई। इससे रेलवे कर्मचारियों में उत्साह और प्रेरणा का संचार हुआ, और अधिकतर कर्मचारी स्वयं यात्रियों का सामान लौटाने में सक्रिय हो गए।
मैं मानता हूँ कि Lost & Found के लिए एक समर्पित मोबाइल ऐप विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें रेलवे कर्मचारी मिले हुए सामान का विवरण दर्ज कर सकें और यात्री कहीं से भी अपनी स्थिति देख सकें। इससे पारदर्शिता और विश्वास दोनों बढ़ेंगे।
सम्मान और उपलब्धियाँ
मेरे सेवाकाल में सेवा-भावना, नवाचार, अनुशासन और यात्री-सहायता के लिए मुझे समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर सम्मानित किया गया।
वर्ष 2006 : महाप्रबंधक (GM) अवॉर्ड
अनेक अवसरों पर डिविजनल रेलवे मैनेजर (DRM) अवॉर्ड
एक बार अतिरिक्त महाप्रबंधक (AGM) अवॉर्ड
मुख्य परिचालन प्रबंधक (COM) अवॉर्ड
Member Traffic Cash Award
Member Staff Cash Award
माननीय रेल राज्य मंत्री (MoSR) द्वारा Cash Award
वर्ष 2023 : माननीय रेल मंत्री द्वारा “अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार”
EXIM द्वारा Passenger Facilitators in Train Operation सम्मान
KKMC द्वारा समाज रतन पुरस्कार
NBT द्वारा प्रेरणा दीप पुरस्कार
AKP द्वारा राष्ट्रीय गौरव सम्मान
Kurukshetra Gurukulam Foundation द्वारा “मार्तंड सम्मान (Martand Award)”

एनडीटीवी ने 2022 में ‘आज का सितारा’ कार्यक्रम में मुझे ₹1,00,000 की सम्मान राशि प्रदान की तथा ‘संकटमोचक’ और ‘रेलवे मसीहा’ की उपाधियों से अलंकृत किया।
इन सभी सम्मानों को मैं व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि टीमवर्क, निष्ठा और सेवा-संस्कृति की स्वीकृति के रूप में देखता हूँ।
तकनीकी परिवर्तन : भाप इंजन से ‘कवच’ तक
मेरे सेवाकाल के दौरान भारतीय रेल ने अद्भुत तकनीकी परिवर्तन देखे। भाप इंजन से डीज़ल और इलेक्ट्रिक इंजन, फिर वंदे भारत जैसी अर्ध-उच्च गति ट्रेनों तक की यात्रा मैंने स्वयं देखी।
एलईडी colour light सिग्नल, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, केंद्रीकृत ट्रैफिक कंट्रोल, ऑटोमैटिक सिग्नलिंग, E TSR, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और स्वदेशी ‘कवच’ प्रणाली ने सुरक्षा को नई ऊँचाई दी। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि कार्य-संस्कृति का परिवर्तन भी था।
आज लगभग 1367 स्टेशनों का पुनर्विकास हो रहा है, जो यात्री सुविधा और गरिमा को नई पहचान दे रहा है।
यात्रियों की शिकायतें और उनका अनुभव
मेरे अनुभवों के अनुसार, यात्री शिकायतों को समझना और उनका संवेदनशील समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। सामान्यतः शिकायतें तीन प्रकार की होती हैं:
आदतन शिकायत करने वाले यात्री : कुछ यात्री नियमित रूप से शिकायत करते हैं। यह उनकी आदत या यात्रा का समय पास करने का तरीका हो सकता है। ऐसे यात्री अक्सर मदद पाकर भी संतुष्ट नहीं होते।
प्रभाव या दबाव आधारित शिकायतें : कुछ यात्री अपने रुतबे या VIP ट्रीटमेंट के लिए अनावश्यक शिकायत करते हैं। इनका समाधान संयम और स्पष्ट संवाद से किया जाता है।
सच्चे परेशान यात्री : जो यात्री असुविधा, कर्मचारी की भूल या किसी दुर्घटना के कारण परेशान हैं। उनकी शिकायतों में प्राथमिकता मानवीय संवेदनशीलता को दी जानी चाहिए।
शिकायतों को बोझ नहीं, बल्कि सुधार का अवसर मानना चाहिए। यह संगठन को लगातार बेहतर बनाने का मार्ग है।
सुझाव और मार्गदर्शन
सेवा को दृष्टिकोण बनाएं : रेलवे केवल नौकरी नहीं, जनसेवा है।
संवाद कौशल : स्पष्ट, सरल और सम्मानजनक भाषा तनाव कम करती है।
पहला संपर्क बिंदु बनें : समस्या स्वयं हल न हो तो सही स्थान तक पहुँचाना भी सेवा है।
समय प्रबंधन और सजगता : लापरवाही ट्रेन परिचालन प्रभावित कर सकती है।
तकनीक का प्रयोग : ई-टिकटिंग, डिजिटल डिस्प्ले और ऐप्स का ज्ञान अनिवार्य।
स्वच्छता और सूचना प्रणाली : स्टेशन साफ़ और घोषणाएँ स्पष्ट हों।
बुज़ुर्ग, महिला और दिव्यांग यात्रियों के प्रति संवेदनशीलता : रैंप, व्हीलचेयर, प्राथमिकता सहायता।
कुलियों का प्रशिक्षण : विनम्र व्यवहार, ओवरचार्जिंग रोकना और नियमित प्रशिक्षण।
टीमवर्क और डिजिटल समन्वय : व्हाट्सऐप और डिजिटल प्लेटफॉर्म विभागीय समन्वय में मदद करते हैं।
निरंतर सीखने की भावना : तकनीक और अपेक्षाएँ बदल रही हैं, स्वयं को अपडेट रखें।
नेतृत्व की परिभाषा
नेतृत्व आदेश देने का नाम नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने का नाम है। एक अच्छा अधिकारी वही है, जो ज़मीनी स्तर पर कार्य का अनुभव रखता हो और अपने अधीनस्थों को प्रेरित करे। संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है। सामूहिक सफलता ही स्थायी होती है।
सेवानिवृत्ति : एक अध्याय का समापन, यात्रा का नहीं
31 जनवरी 2026 में सेवानिवृत्ति के साथ एक प्रशासनिक अध्याय समाप्त हुआ, पर रेल से जुड़ा जीवन-दर्शन आज भी मेरे भीतर जीवित है। जब भी किसी स्टेशन पर ट्रेन की सीटी सुनाई देती है, मन अनायास पटरियों की ओर लौट जाता है।
रेलवे मेरे लिए केवल नौकरी नहीं रही—वह मेरा जीवन, मेरी साधना, मेरा अनुभव और मेरी पहचान रही है। यदि मेरे अनुभवों से आने वाली पीढ़ी के रेलकर्मियों को प्रेरणा मिले और यात्रियों की यात्रा थोड़ी सहज हो सके, तो यही मेरे सेवाकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
उपसंहार : पटरियों पर चलता जीवन
मेरी रेल-यात्रा केवल अतीत का विवरण नहीं, बल्कि सेवा, अनुशासन और मानवता का संदेश है। पटरियाँ आगे बढ़ती रहती हैं—सीधी, मजबूत और निरंतर। मैंने भी अपने जीवन को उन्हीं पटरियों की तरह संतुलित, अनुशासित और लक्ष्य की ओर अग्रसर रखने का प्रयास किया।
यदि भारतीय रेल निरंतर तकनीकी उन्नति, मानवीय दृष्टिकोण और संगठनात्मक अनुशासन के साथ आगे बढ़ती रही, तो वह केवल विश्व की सबसे बड़ी रेल व्यवस्थाओं में से एक नहीं, बल्कि सबसे विश्वसनीय और संवेदनशील रेल सेवा के रूप में भी स्थापित होगी।
मेरी यह यात्रा उसी विश्वास का प्रमाण है।
