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India Speak Daily > मीडिया > फिफ्थ कॉलम > मदर टेरेसा एक धार्मिक रुढ़िवादी, राजनीतिक गुप्तचर, कट्टर उपदेशक और दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष ताक़तों की साथी थीं!
फिफ्थ कॉलम

मदर टेरेसा एक धार्मिक रुढ़िवादी, राजनीतिक गुप्तचर, कट्टर उपदेशक और दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष ताक़तों की साथी थीं!

Courtesy Desk
By Courtesy Desk 7 Min Read
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India Speaks Daily - ISD News
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सौतिक बिस्वास, बीबीसी संवाददाता. कोलकाता में ग़रीबों के लिए काम करने वाली रोमन कैथोलिक नन मदर टेरेसा को रविवार को संत घोषित किया जा रहा है. इसके साथ ही उनके आलोचक इस बात पर तकरार करेंगे कि यह विज्ञान और तर्क पर आस्था की जीत है. नोबेल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा का निधन 87 साल की उम्र में 1997 में हुआ था. उन्होंने 1950 में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की थी. इस संगठन से दुनिया भर में तीन हज़ार से ज़्यादा नन जुड़ी हुई हैं. मदर टेरेसा ने कई आश्रम, ग़रीबों लिए किचन, स्कूल, कुष्ठ रोगियों की बस्तियां और अनाथ बच्चों के लिए घर बनवाए.
शहर की गंदी बस्तियों में काम करने की वजह से उन्हें ‘गटर की संत’ (सेंट ऑफ़ गटर्स) भी कहा जाता था.लेकिन इन सब के बावज़ूद भी उनके कई आलोचक भी रहे हैं.

ब्रिटेन में जन्मे और स्वतंत्र विचारों के लेखक क्रिस्टोफर हिचेंस उन्हें कुछ इस तरह से बयां करते हैं, “वो एक धार्मिक रुढ़िवादी, एक राजनीतिक गुप्तचर, एक कट्टर उपदेशक और दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष ताक़तों की साथी थीं.”

मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी के प्रचार पुस्तिका पर बात करते हुए नन की आलोचना में हिचेंस इसे ‘दु:ख का संप्रदाय’ कहते हैं. वो आरोप लगाते हैं कि मदर टेरेसा ने गोद लिए हुए अपने शहर को नरक की तरह पेश किया और अधिनायकों से दोस्ती की. हिचेंस ने मदर टेरेसा को संदेह में खड़ा करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री ‘हेल्स एंजेल’ भी बनाई है.

कई साल बाद 2003 में लंदन के स्थित डॉक्टर अरूप चटर्जी ने, मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी से जुड़े 100 लोगों का इंटरव्यू करने के बाद, मदर टेरेसा की तीखी आलोचना करते हुए एक लेख प्रकाशित किया.

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उनके मुताबिक़, उनके बनवाए घरों में बाक़ी चीज़ों के अलावा स्वच्छता के बदतर हालात, सीरिंज में एक ही सूई का बार-बार इस्तेमाल और देखभाल की घटिया व्यवस्था होती है.

मदर टेरेसा की आलोचना करने वाले कुछ और भी लोग हैं. मियामी के हेमली गोंदालेथ ने साल 2008 में कोलकाता में ग़रीबों के लिए बनवाए गए टेरेसा के एक घर में दो महीने तक काम किया था.

उनके मुताबिक़, “मुझे यह देखकर हैरत हुई कि चैरिटी किस भयानक लापरवारी के साथ काम करता है. यह लोगों के मन में चैरिटी के काम को लेकर जो विचार था, उसके ठीक विपरीत था”.

गोंदालेथ ने मुझे बताया, “लोगों की देखभाल की ठोस योजना, उपकरणों को आधुनिक बनाना और मदद के लिए हज़ारों चीज़ों से कोसों दूर, मदर टेरेसा ग़रीबों की दोस्त नहीं, बल्कि ग़रीबी को बढ़ावा देने वाली थीं”.

फ़िलहाल गोंदालेथ मदर टेरेसा की आलोचना करते हुए एक फ़ेसबुक पेज चलाते हैं और दान दाताओं को, जिन्हें ज़्यादा पता नहीं होता है, उन्हें इस संगठन की जानकारी देते हैं. हाल के वर्षों में सनल एदमारुकु जैसे भारतीय रेशनलिस्टों ने उन चमत्कारों पर सवाल उठाए हैं, जिनके लिए मदर टेरेसा को संत की उपाधि दी गई.

उनके मुताबिक़, “वेटिकन की नज़र में एक संत बनने के लिए, किसी चमत्कार को, किसी की मौत के बाद उनके लिए की जाने वाली प्रार्थना से जोड़ दें. असल में किसी घटना को चमत्कार मानने से पहले, सबूतों के साथ उन घटनाओं की जांच की जानी चाहिए. अक्सर यह सब बीमारियों के ठीक होने की ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनकी कोई चिकित्सीय व्याख्या नहीं की जा सकती”.

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मदर टेरेसा की मौत के पांच साल बाद पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उनके एक चमत्कार को स्वीकार किया था. एक बंगाली आदिवासी महिला मोनिका बेसरा को पेट का अल्सर था, जो ठीक हो गया. कहा गया कि यह मदर टेरेसा के अलौकिक ताक़त की वजह से हुआ. इसी घटना की वजह से टेरेसा को 2003 में ‘धन्य’ (बिटिफ़िकेशन) घोषित किया गया. उसके बाद पोप फ़्रांसिस ने 2015 में उनके दूसरे चमत्कार को अपनी स्वीकृति दी, जब साल 2008 में ब्राज़ील के एक आदमी का ब्रेन ट्यूमर ठीक हो गया. सनल एदमारुकु टेरेसा के पहले चमत्कार पर कहते हैं कि किसी महिला के पेट पर किसी नन की तस्वीर रख देने से वो ठीक कैसे हो सकती है, जबकि सबूत यह दिखा रहे थे कि उनका इलाज दवाओं से हुआ है.

वो कहते हैं, “ज़्यादातर लोग मदर टेरेसा का विरोध नहीं करना चाहते, क्योंकि उनकी छवि ग़रीबों के लिए काम करने वालों की है. अगर आप मदर टेरेसा पर सवाल उठाते हैं, तो आपको ग़रीब विरोधी माना जाएगा. मेरे मन में उनके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं है, लेकिन किसी चमत्कार को बेचना अवैज्ञानिक सोच है.” इस मुद्दे पर अरूप चटर्जी उत्तेजित होकर कहते हैं, “ये कथित चमत्कार बहुत बेकार और बचकानी बात है और इसे तो चुनौती भी दी जा सकती है.”

इस मसले पर ताज़ा चुनौती जागरूक लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक ग्रुप ने पेश की है. इन लोगों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से वेटिकन में रविवार को होने वाले मदर टेरेसा के उपाधि समारोह में शामिल होने के फ़ैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया है.
इस याचिका में कहा गया है, “जिस देश का संविधान अपने नागरिकों से वैज्ञानिक सोच रखने को कहता है, उसकी विदेश मंत्री का चमत्कारों के आधार पर मिली किसी उपाधि समारोह में जाना, उनकी बुद्धि पर संदेह पैदा करता है.” लेकिन अंत में समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन कहते हैं, “सबूत और आस्था अलग अलग चीज़ें हैं.”

वो कहते हैं, “कई तरह के सवाल अब भी मौजूद हैं. हम में से कई लोगों में विज्ञान के इतिहास और इसके दर्शन की समझ नहीं होती है. ईसाइयत का भी विज्ञान के साथ लंबी लड़ाई का इतिहास है. तर्कवादी भी कभी-कभी अति कर देते हैं और हर समय सबूत मांगने लगते हैं”.
साफ़ है कि जूरी अब भी ‘गटर की इस संत’ पर ख़ामोश है, इसलिए हमारे पास कोई जवाब नहीं है.

Main Link With Courtesy: http://www.bbc.com/hindi/india/2016/09/160902_mother_teresa_saint_critics_cj?ocid=wshindi.chat-apps.in-app-msg.whatsapp.trial.link1_.auin

Courtesy Desk September 4, 2016
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TAGGED: Mother Teresa, Mother Teresa exposed, मदर टेरेसा

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