संदीप देव। भारतीय राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल जनभावनाओं को उद्वेलित करने और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए किस कदर किया जाता है, इसका सबसे ज्वलंत और प्रामाणिक उदाहरण ‘गो-वंश’ (गाय) को लेकर संघ और भाजपा की बदलती विचार-यात्रा है। विपक्ष में रहते हुए संघ-भाजपा गाय को ‘राष्ट्रीय धरोहर’, ‘राष्ट्रीय पशु’ और ‘राष्ट्र माता’ के सर्वोच्च आसन पर विराजमान कराना चाहती है, लेकिन सत्ता प्राप्त करते ही इन्हीं मांगों को उठाने वाले शंकराचार्य हों या मुस्लिम समाज, दोनों पर न केवल टूट पड़ती है, बल्कि झूठा नरेशन गढ़ कर हिंदुओं को भी गुमराह करती है!
आज जब मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा स्वयं आगे बढ़कर गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ बनाने की मांग कर रहा है, तब भाजपा और संघ के शीर्ष नेताओं के सुर पूरी तरह बदल चुके हैं और वह कह रहे हैं कि हम गाय को पशु नहीं ‘माता’ मानते हैं, जबकि सच तो यह है कि वर्ष 2009 में विपक्ष में रहते हुए इसी भाजपा और संघ का यही नेतृत्व गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा देने के लिए यात्राएं निकाल रहा था और गांव-गांव घूम कर समर्थन के लिए हस्ताक्षर अभियान चला रहा था! आज जब ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज गाय को ‘राष्ट्र माता’ का दर्जा देने के लिए यात्राएं निकाल रहे हैं तो भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह देते हैं कि “मां (गाय)- बेटे के संबंध में कुछ घोषित करने की जरूरत नहीं है”, जबकि सच तो यह है कि वर्ष 2017 में होने वाले उप्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वर्ष 2016 में यही योगी आदित्यनाथ गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित कराने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे! मेरा यह लेख गाय पर भाजपा-संघ के राजनीतिक पाखंड, यू-टर्न और वैचारिक दोगलेपन की सिलसिलेवार, तथ्यात्मक और आलोचनात्मक चीरफाड़ करता है।
2009-10 का ‘विश्व मंगल गउ ग्राम यात्रा‘ आंदोलन: संघ का वह पाखंड जिसे नयी पीढ़ी को जानना जरूरी है!
आज की युवा पीढ़ी, जिसने 2014 के बाद की राजनीति देखी है, उसे शायद अंदाजा भी नहीं होगा कि संघ ने गाय के नाम पर समय-समय पर हिंदुओं को भड़कने के लिए देश में कितना बड़ा और सुनियोजित पाखंड फैलाया है! वर्ष 1966 के गो-रक्षा आंदोलन को पटरी से उतारने वाले तत्कालीन संघ प्रमुख गोलवलकर ने अपने जनसंघ के सपोर्ट से बनने वाली मोरारजी देसाई की सरकार में बनी ‘उच्च स्तरीय गो रक्षा समिति’ ही भंग करवा दी थी और पुरी के तत्कालीन शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ जी महाराज एवं करपात्री जी महाराज के आंदोलन को पंक्चर कर दिया था। इस विषय पर इसी वेब पोर्टल पर शोध परक एक पूरा लेख हमने लिखा है, जिसे पाठक पढ़ सकते हैं।
दूसरी बार केंद्र में मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार को घेरने और बहुसंख्यक हिंदू समाज में ‘धर्म खतरे में है’ का नैरेटिव सेट करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने 30 अक्टूबर 2009 से 12 फरवरी 2010 तक 108 दिनों की ‘विश्व मंगल गउ ग्राम यात्रा’ निकाली थी। यह यात्रा धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से शुरू होकर आरएसएस के मुख्यालय नागपुर (महाराष्ट्र) में समाप्त हुई। इसने देश के सभी राज्यों को छूते हुए 26,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की। इस यात्रा के मुख्य नीति-नियंता संघ के शीर्षतम प्रचारक थे। मार्च 2009 में सरसंघचालक बने मोहन भागवत का यह पहला बड़ा राष्ट्रव्यापी ‘शक्ति प्रदर्शन’ था। उनके साथ संघ के वरिष्ठ प्रचारक मदन दास देवी, राष्ट्रीय संयोजक के रूप में विश्व हिंदू परिषद के दिनेश चंद्र, अखिल भारतीय गो-सेवा प्रमुख शंकर लाल, और सबसे महत्वपूर्ण—अल्पसंख्यकों के बीच संघ की पैठ बनाने वाले इंद्रेश कुमार शामिल थे। इंद्रेश कुमार ने इस यात्रा में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ (MRM) का इस्तेमाल किया। जगह-जगह मुस्लिम मौलवियों से गाय की आरती उतरवाई गई, उन्हें गो-ग्रास सौंपते हुए तस्वीरें खिंचवाई गईं ताकि यह दिखाया जा सके कि संघ मुसलमानों को भी गो-भक्त बना रहा है। इसका मकसद केवल और केवल सामाजिक ध्रुवीकरण तैयार करना था ताकि सत्ता पर काबिज हुआ जा सके।
संघ ने दावा किया कि इस यात्रा के दौरान देश के 4.32 लाख गांवों से संपर्क कर 8.36 करोड़ से अधिक नागरिकों के हस्ताक्षर जुटाए गए। फरवरी 2010 में इन हस्ताक्षरों के विशाल पुलिंदों के साथ संघ का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मिला और मांग की कि (क) रॉयल बंगाल टाइगर को हटाकर गाय को भारत का ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित किया जाए। बता दूं कि भारत के संविधान में सीधे तौर पर किसी भी राष्ट्रीय पशु का उल्लेख नहीं है लेकिन भारत सरकार ने रॉयल बंगाल टाइगर यानी बाघ को साल 1972 में राष्ट्रीय पशु घोषित किया था। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, उसी साल तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत की थी जिसका मक़सद दुर्लभ बाघों को विलुप्त होने से बचाना था। इसके अलावा इस यात्रा में मांग की गई कि (ख) देश में गो-हत्या पर पूर्ण केंद्रीय प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बने।
इस पूरी यात्रा का नेतृत्व पूरी तरह आरएसएस (RSS) के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा संभाला जा रहा था, जबकि अग्रिम पंक्ति में संघ समर्थित सतों-यथा योग गुरु बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर (आर्ट ऑफ लिविंग), माता अमृतानंदमयी को प्रमुखता से रखा गया था ताकि हिंदू जनता इस यात्रा से जुड़ सके। बंगाल टाइगर की जगह गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने वाली इस यात्रा की व्यापकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें संघ के शीर्ष नेतृत्व और संघ समर्थित संतों के साथ-साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (गुजरात), शिवराज सिंह चौहान (मध्य प्रदेश), डॉ. रमन सिंह (छत्तीसगढ़), और बी. एस. येदियुरप्पा (कर्नाटक)। भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी और नितिन गडकरी भी अलग-अलग पड़ावों पर इसमें शामिल हुए थे।
संघ जानता था कि चारों पीठों के शंकराचार्य गाय को माता मानते हैं, अतः वे चारों गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा देने की मांग वाली इस यात्रा में सम्मिलित नहीं होंगे, इसलिए संघ ने हिंदुओं को गुमराह करने के लिए एक नकली शंकराचार्य को इस अभियान का मुखौटा बनाकर पेश किया। इस यात्रा के मुख्य मार्गदर्शक और अध्यक्ष कर्नाटक के होसानगर स्थित रामचंद्रपुर मठ के तत्कालीन प्रमुख श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी को बनाया गया और मीडिया में उनका परिचय शंकराचार्य के रूप में दिया गया। वह इस पूरी यात्रा का मुख्य धार्मिक चेहरा बनाए गये थे।

इस यात्रा के दौरान और उसके बाद भी ‘संघी शंकराचार्य’ राघवेश्वर भारती को लेकर तीव्र धार्मिक और कानूनी विवाद खड़े हुए थे। सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित केवल चार मुख्य पीठ (पुरी, द्वारका, शृंगेरी और जोशीमठ) ही प्रामाणिक मानी जाती हैं। राघवेश्वर भारती ‘रामचंद्रपुर मठ’ के पीठाधीश्वर थे, जो मुख्य चार पीठों में नहीं आता है। यात्रा के दौरान और स्थानीय स्तर पर संघियों द्वारा उन्हें ‘जगद्गुरु’ या ‘शंकराचार्य’ जैसी उपाधियों से संबोधित किए जाने पर पारंपरिक शांकर पीठों ने कड़ी आपत्ति जताई थी।
इसका सबसे अधिक विरोध तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज और उनके दंडी संन्यासी और वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने किया। उन्होंने साफ तौर पर नकली शंकराचार्य और गाय को राष्ट्रीय पशु की संज्ञा का विरोध करते हुए कहा कि काशी में इस यात्रा को घुसने नहीं दिया जाएगा, जिसके बाद संघ का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला और यह वचन दिया कि वह नकली शंकराचार्य से दूरी बनाएंगे और गाय को राष्ट्रीय पशु नहीं कहेंगे, परन्तु संघी अपने वचन से पलट गये और राष्ट्रपति जी को जो ज्ञापन दिया उसमें ही गाय को निर्जीव वस्तुओं की तरह राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने और राष्ट्रीय पशु शब्द का खुलकर प्रयोग किया गया। इसे बेशर्मी से संघ ने अपने मुखपत्र आर्गेनाइजर मे़ भी छापा।

आलोचकों का आरोप था कि संघ ने अपनी यात्रा को सर्वोच्च धार्मिक स्वीकार्यता देने के लिए नकली शंकराचार्य को प्रस्तुत कर दिया है। पूर्व में पूरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थजी महाराज जी और धर्म सम्राट करपात्रीजी महाराज को गो आंदोलन में संघ के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर द्वारा धोखा दिए जाने के बाद से चारों शांकर पीठ गो-रक्षा के मामले में संघ पर विश्वास नहीं करते, इसलिए संघ-भाजपा ने उनकी भरपाई एक नकली शंकराचार्य को खड़ा करके किया था।
उधर यात्रा संपन्न होने के कुछ वर्षों बाद (2014-15 के दौरान), राघवेश्वर भारती पर उनके ही मठ की एक गायिका और उनकी बेटी द्वारा गंभीर यौन शोषण के आरोप लगाए गए। हालांकि, 2016 में बेंगलुरु की एक कोर्ट ने उन्हें इन आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया था, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने संघ द्वारा संतों के चयन और उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर वैचारिक व सामाजिक सवाल खड़े किए थे।
अब सवाल उठता है कि जो संघ 2009 में साढ़े आठ करोड़ लोगों की भावनाओं को लेकर राष्ट्रपति भवन गया था, वह संघ पिछले 12 वर्षों से पूर्ण बहुमत की अपनी ही मोदी सरकार के रहते नागपुर में मौन क्यों साधे बैठा है? क्या वे साढ़े आठ करोड़ हस्ताक्षर केवल डस्टबिन में फेंकने के लिए या चुनाव जीतने का प्रोपेगैंडा तैयार करने के लिए जुटाए गए थे?
दूसरा सवाल यह उठता है कि जब संघ-भाजपा स्वयं ही गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने के लिए अभियान चला रहे थे, यात्रा निकाल रहे थे, इंद्रेश कुमार के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए गाय के प्रति मुस्लिमों का उदार चेहरा प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे थे तो आज जब मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा देने की मांग उठा रहा है तो फिर भाजपा के नेता, “हम गाय को माता नहीं, पशु मानते हैं” का भाषण देते हुए उन मुस्लिमों को ‘पशु बुद्धि’ (योगी आदित्यनाथ का बयान) कह रहे हैं तो फिर क्यों न माना जाए कि 2009 में गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा देने की मांग करने वाले सारे संघी-भाजपाई नेता पशु बुद्धि वाले थे? या फिर यह क्यों न माना जाए कि संघी-भाजपाई नेताओं का सरोकार कभी गो-रक्षा से था ही नहीं, वह इसके जरिए देश में केवल हिंदू-मुस्लिम की भावना भड़का कर अपनी सत्ता की सीढ़ियां बनाते और उस पर चढ़ते चले गये हैं!
शाहनवाज और योगी का नया पाखंड: “गाय माता है, पशु नहीं!”
आज जब मुस्लिम समुदाय के कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने संघ को उसी के पुराने जाल में घेरते हुए मांग कर दी कि “ठीक है, हम भी तैयार हैं, गाय को ‘राष्ट्रीय पशु‘ घोषित कर दो,” तो संघ और भाजपा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इस मांग को कुंद करने के लिए भाजपा ने अपने दो प्रमुख मोहरों—शाहनवाज हुसैन और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ—को आगे कर दिया है। दोनों के बयानों में छुपा पाखंड देखिए:
*शाहनवाज हुसैन का बयान:“”कुछ चालाक मुस्लिम गाय को पशु घोषित करने की बात कर रहे हैं, जिसे हिंदू माता मानते हैं उसे पशु कैसे घोषित किया जा सकता है?”
*योगी आदित्यनाथ का बयान:“मैं इस समय एक चलन देख रहा हूं। तमाम मौलवी और मौलाना यह बयान दे रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करो। हमने कहा कि गो हमारी माता है और जन्म-जन्मांतर का हमारा नाता है।…क्या मां और पुत्र के बीच कुछ घोषित करने की ज़रूरत पड़ती है? यह हमारे संस्कार हैं। अपनी मां के बारे में जो सम्मान का भाव रखते हैं, वही भाव हमारा भी है, हमने गाय को माता माना है।… गाय हमारे लिए माता है, पशु तो तुम्हारी बुद्धि है। तुम्हारी सोच पशुवत है, जो गाय माता को पशु बोल रहे हो। जैसे हमारी माता के बारे में किसी को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती, वैसे ही गो माता के बारे में भी किसी घोषणा की आवश्यकता नहीं है।”
*केंद्रीय क़ानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल का स्पष्टीकरण: “केंद्र सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। अभी तक कैबिनेट के पास ऐसा कोई मामला विचाराधीन नहीं है। अगर कोई प्रस्ताव ऐसे स्तर पर पहुंचता है जहां सरकार या कैबिनेट के दख़ल की ज़रूरत होती है, तो हम आपको बता देंगे।” (PTI को दिए बयान में) देखिए भाजपा का पाखंड कि केंद्रीय कानून मंत्री कह रहे हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव ( गाय को राष्ट्रीय पशु या राष्ट्र माता) पर विचार नहीं कर रही है, तो फिर विपक्ष मे़ थे तो संघ-भाजपा इसके लिए आंदोलन क्यों कर रही थी? योगी आदित्यनाथ ने कहा कि “गो माता तो स्वघोषित राष्ट्रमाता है और उसे राष्ट्रमाता घोषित करने की आवश्यकता नहीं है”, तो सवाल उठता है कि योगी महाराज विपक्ष में रहते हुए 2016 में गाय को राष्ट्र माता बनाने के लिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन क्यों कर रहे थे?
वाह रे राजनीतिक ढोंग! जब 2009 में मोहन भागवत और संघ के प्रचारक गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ बनाने के लिए सड़कों पर यात्रा निकाल रहे थे, तब गाय का ‘अपमान’ नहीं हो रहा था? तब गाय ‘पशु’ की श्रेणी में आने योग्य थी? आज जब मुस्लिम समुदाय वही मांग कर रहा है, तो अचानक से गाय को राष्ट्रीय पशु कहना उसका अपमान हो गया? यह रुख साफ दिखाता है कि भाजपा कभी नहीं चाहती कि गो-वंश का मुद्दा सुलझे। अगर मुद्दा सुलझ गया, तो समाज में नफरत, वैमनस्यता और चुनावी ध्रुवीकरण की संघी-भाजपाई दुकान कैसे चलेगी?
सरकारी फाइलों का नग्न सच: कानूनी अनुसूचियों में आज भी गाय ‘पशु‘ ही है!
भाजपा नेताओं का यह तर्क कि “गाय माता है, पशु नहीं”, उनकी अपनी सरकारों के कानूनी दस्तावेजों के सामने एक भद्दा मजाक बनकर रह जाता है! नयी पीढ़ी को कानून की यह हकीकत जाननी चाहिए कि केंद्र सरकार के ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960’ (Prevention of Cruelty to Animals Act) की धाराओं और राज्यों के गो-वध निवारण अधिनियमों की प्रशासनिक अनुसूचियों (Schedules) में हर जगह गाय को वैधानिक रूप से ‘Domestic Animal’ (पालतू पशु) या ‘Bovine Animal’ (गोवंशीय पशु) की श्रेणी में ही रखा गया है। यदि संघ और भाजपा वास्तव में गाय को ‘पशु’ की सूची में देखना अपमानजनक मानते हैं, तो पिछले 12 वर्षों से दिल्ली की सत्ता पर काबिज मोदी सरकार ने संसद में एक साधारण संशोधन विधेयक लाकर गाय को ‘पशु की वैधानिक अनुसूची’ से बाहर क्यों नहीं निकाला? सच्चाई यह है कि भाषणों के मंच पर गाय ‘माता’ बनाई जाती है ताकि वोट बटोरे जा सकें, और सरकारी फाइलों में उसे ‘पशु’ ही रहने दिया जाता है ताकि गो-मांस (बीफ) और चमड़े के अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समीकरणों पर कोई आंच न आए, जिसमें भारत दुनिया के शीर्ष देशों में शुमार है।
योगी आदित्यनाथ का महा यू–टर्न: 2016 के ‘राष्ट्र माता‘ आंदोलन की कड़वी सच्चाई!
योगी आदित्यनाथ का स्टैंड बदलना राजनीतिक अवसरवादिता की पराकाष्ठा है। वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद, उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए सांप्रदायिक जमीन तैयार की जा रही थी। इसी क्रम में वर्ष 2015-16 के दौरान तत्कालीन गोरखपुर सांसद योगी आदित्यनाथ ने गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित कराने के लिए एक देशव्यापी ऑनलाइन और ऑफलाइन अभियान शुरू किया था। 28 फरवरी 2016 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पूज्य गोपालमणि जी महाराज के सानिध्य में गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित करने के लिए एक विशाल आंदोलन आयोजित हुआ था।
इस मंच पर भाजपा सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ मुख्य वक्ता बनकर दहाड़ रहे थे। उस समय इस अभियान को देश भर के लगभग 6 लाख लोगों ने ऑनलाइन समर्थन दिया था। योगी जी ने मंच से और अपने आधिकारिक बयानों में इन 6 लाख लोगों का आभार व्यक्त करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह इस अभियान से जुड़े प्रत्येक समर्थक को व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद पत्र लिखेंगे और संसद के भीतर गाय को ‘राष्ट्र माता’ का दर्जा दिलाने के लिए निजी विधेयक (Private Member Bill) लाएंगे। इस बयान का वीडियो आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
आज जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं और भाजपा की डबल इंजन सरकार है, तब उनका दार्शनिक ज्ञान फूटता है: “मां और बेटे के संबंध को किसी सरकारी घोषणा की आवश्यकता नहीं होती।” तो बताइए योगी जी आप 2015-2016 में गाय को राष्ट्र माता घोषित कराने के लिए आंदोलन की ‘नाटक’ क्यों कर रहे थे? उस वक्त आपको मां-बेटे का संबंध समझ में नहीं आ रहा था?
2016 से 2026 के बीच न तो भारत बदला, न सनातन धर्म बदला और न ही गाय बदली। बदला तो सिर्फ योगी आदित्यनाथ का पद! 2016 में वह उप्र में एक ‘आंदोलनकारी विपक्ष’ थे, जिन्हें उत्तर प्रदेश की सत्ता की कुर्सी तक पहुँचना था। 2026 में वह खुद ‘सत्ता’ हैं, जहाँ घोषणा करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही स्वयं उन पर है। जब जिम्मेदारी खुद पर आती है, तो ‘राष्ट्र माता’ का कानून बनाने के बजाय अमूर्त और दार्शनिक कुतर्कों के पीछे छिप जाना ही संघी राजनीति का असली चरित्र है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी का आंदोलन और भाजपा का असली लिटमस टेस्ट!
वर्तमान में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज देश भर में गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित कराने और गोहत्या के कलंक को मिटाने के लिए ‘गो संसद’ और गविष्टि यात्राएं कर रहे हैं। वह सीधे तौर पर देश के सत्तासीनों को उनके पुराने वादों की याद दिला रहे हैं।
यहाँ भाजपा का असली लिटमस टेस्ट है:-
यदि भाजपा और संघ का यह कुतर्क मान भी लिया जाए कि मुस्लिम समुदाय द्वारा गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ कहना गाय का अपमान है, तो फिर देश के सर्वोच्च धर्माचार्य—शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी—तो गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ नहीं, बल्कि ‘राष्ट्र माता‘ घोषित करने की मांग कर रहे हैं! यह तो वही मांग है जो खुद योगी आदित्यनाथ 2016 में जंतर-मंतर पर कर रहे थे। तो फिर आज केंद्र की पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार संसद में कानून बनाकर गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित क्यों नहीं कर देती? शंकराचार्य जी के आंदोलन के सामने ये सरकारें पुलिस और प्रशासन को आगे करके बाधाएं क्यों खड़ी कर रही हैं?
संपादकीय टिप्पणी:-
यह पूरा घटनाक्रम नयी पीढ़ी के सामने यह साफ कर देता है कि संघ और भाजपा के लिए गाय कभी भी आस्था का विषय नहीं रही, बल्कि वह विशुद्ध रूप से ‘राजनीतिक हथियार’ (Political Weapon) रही है। विपक्ष में रहते हुए गो-वंश के नाम पर दंगे भड़काना, आंदोलन करना, राष्ट्रीय पशु और राष्ट्र माता के नारे लगाना बेहद अनुकूल होता है क्योंकि उससे बहुसंख्यक हिंदू समाज के वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकता है। लेकिन सत्ता में आते ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार, बीफ एक्सपोर्ट में देश को आगे बढ़ाने, बीफ एक्सपोर्टर्स से चुनावी चंदा लेने, कॉर्पोरेट हित और प्रशासनिक जवाबदेही के कारण वही गाय इनके गले की फांस बन जाती है।
भाजपा और संघ का यह चरित्र साफ करता है कि वे गाय को पूजते जरूर हैं, लेकिन केवल तब तक—जब तक वह उन्हें सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाने का जरिया बनी रहे। सत्ता मिलने के बाद गाय को उसका वैधानिक हक (भारतीय संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्व के तहत अनुच्छेद 48 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह गो-वध पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान करे) देना उनकी प्राथमिकताओं से पूरी तरह गायब हो जाता है, और जो धर्मगुरु या समाज इसे मांगता है उसे ही ‘देशद्रोही’ घोषित कर उनके पीछे अपने ‘पेड ट्रोलर्स’, ‘पालतू पत्रकारों’ और ‘दरबारी संतों’ को छोड़ दिया जाता है!
सत्य को दबने न दें!
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जय सियाराम हर हर महादेव संदिपजी!आपने संघ भाजप का असली चेहरा दिखा दिया!धन्यवाद