रामेश्वर मिश्र पंकज। विविध नामधारी आचार्य रजनीश एवं जेद्दु कृष्ण मूर्ति आदि से प्रभावित मुरारी बापू के मन में प्रारंभ से ही यह लालसा थी कि वह अपना एक नया पन्थ चलाएं ।इसमे कुछ गलत नहीं।
परंतु यह मानना होगा कि उनमें आत्मविश्वास और नैतिक बल की बहुत अधिक कमी रही है क्योंकि वे रजनीश या कृष्ण मूर्ति की तरह घोषणा करने का साहस नहीं कर पाए कि वह एक नया पंथ चला रहे हैं ।
उसके स्थान पर उन्होंने सनातन धर्म की मुख्य धारा का स्वयं को प्रतिनिधि प्रचारित करते हुए और सनातन धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण कर्म काण्ड आदि के अधिकांश भाग का एक तरफ पालन करते हुए उसी के समानांतर धीरे-धीरे अनेक परंपरागत मान्यताओं को चुपके से अस्वीकार करते हुए और सनातन धर्म के नाश की घोषणा करने वाले समुदायों से गहरी आत्मीयता विकसित करते हुए एक तरह से भूमिगत रूप में अपना एक स्वतंत्र पन्थ चलाने का प्रयास किया जो उनमें नैतिक बल और आत्मविश्वास की कमी का प्रमाण है।
कितना अच्छा होता यदि वे प्रारंभ से ही रजनीशादि की तरह घोषणा करते या प्रचारित करते कि वह एक नया पन्थ चला रहे हैं परंतु इतना आत्म बल और साहस उनमें नहीं था ।
इस प्रकार वे जिनका अनुसरण करने का प्रयास जीवन भर करते रहे, उनकी तुलना में आत्म बल की दृष्टि से बहुत छोटे और आचरण में बहुत ही छद्माचारी हैं।
यह सबसे अधिक दुखद बात है।
प्रतिभा तो उनमें कम नहीं है पर आत्मबल बहुत कम है और नैतिक साहस बिल्कुल नहीं है।
