आइए, आज आपको एक बेहद रोचक किस्सा सुनाता हूँ, जिसे नेताओं की “थेथरई की मिसाल” कहना भी अतिशयोक्ति न होगा। पहले नहीं पढ़ा होगा तो मजा तो आएगा, साथ में हैरत और क्रोध की भी प्राप्ति होवेगी।
1976 में फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) नामक एक कानून लाया गया था, जिसका उद्देश्य भारत की राजनीतिक व्यवस्था में विदेशी धन के प्रवाह पर रोक लगाना था। अर्थात आप विदेशी मुल्कों की सरकारों, प्रशासनिक संस्थाओं, कंपनियों इत्यादि से धन नहीं ले सकते – किससे डोनेशन ले सकते हैं, किससे नहीं – इसका ब्यौरा और नियम-कायदे इस एक्ट में उल्लेखित थे।
2014 में भाजपा पर वेदांता ग्रुप की कुछ ऐसी कंपनियों से चंदा खाने का आरोप था, जो विदेश में रजिस्टर्ड थीं। इसी साल 28 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट ने भाजपा को FCRA के उल्लंघन का दोषी करार दिया – दोबारा पढिये – आरोप नहीं लगा, बल्कि दोषसिद्धि हुई। हाई-कोर्ट ने फैसले के बाद चुनाव आयोग को 6 महीने के भीतर भाजपा के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही का निर्देश दिया। कार्यवाही होती तो कोई बड़ी बात नहीं कि तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ जी भी टँग जाते।
भाजपा ने इस मामले को लंबे समय तक लटकाया और 2016 तथा 2018 में दो कानून लाए गए, जिसके द्वारा FCRA एक्ट में “विदेशी अनुदान” की परिभाषा बदल कर ऐसी कर दी, जिससे उपरोक्त मामला खारिज हो जाये। मजे की बात देखिए कि कायदे से कोई भी कानून जिस दिन बने, उसी दिन से भविष्य के मामलों पर प्रभावी होता है। पर भाजपा ने रेट्रोस्पेक्टिव जाते हुए इस कानून के लागू होने का समय 1976 तय कर दिया, ताकि कानूनी कार्यवाही का सामना न करना पड़े। हैं न कमाल की टाइम-ट्रैवलिंग?
और मजे की बात सुनिए। चूंकि भाजपा के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं था, इसलिए इस नए कानून को वित्त विधेयक की बजाय “धन विधेयक” की तरह प्रस्तुत किया, ताकि यह लोकसभा में ही पास हो जाये – धन विधेयकों को मंजूरी के लिए राज्यसभा में भेजे जाने की अनिवार्यता संविधान में नहीं है। अर्थात – बिल के धन विधेयक होने की शर्तों को पूरा न करने के बावजूद यह थेथरई नेताओं को बचाने के लिए की गई।
अब आपके दिमाग में चल रहा होगा कि ये सब हो रहा था तो कांग्रेस कहाँ घास छील रही थी? तो सबसे बड़ा सरप्राइज यह है कि सिर्फ भाजपा ही नहीं, कांग्रेस भी 2014 के फैसले में FCRA उल्लंघन की दोषी पाई गई थी। जो सजा भाजपा को सुनाई गई थी, वही कांग्रेस को भी। जो तलवार राजनाथ जी के ऊपर लटक रही थी – वही सोनिया जी पर भी। इसलिए इस बिल पर किसी के असहमत होने का सवाल ही नहीं था।
कमाल है न अपना भारत देश – विविधताओं में एकता वाला देश – जरूरत पड़ने पर चोर-चोर मौसेरे भाई बन ही जाते हैं। ![]()
