निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु Nigrahacharya Shri Bhagavatananda Guru स्वामी का एक संदेश सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं आदि शंकराचार्य परंपरा से दीक्षित पी.एन.मिश्र के लिए आया तो मैंने मिश्र जी को भेज दिया। चूंकि मिश्र जी के पास अपना कोई सोशल प्लेटफार्म नहीं है, तो उन्होंने मुझे अपना जवाब निग्रहाचार्य जी को भेजने और मेरे सोशल प्लेटफार्म पर प्रसारित करने को कहा है ताकि सनातनी जनता इससे अवगत होती रहे।
मैंने निग्रहाचार्यजी को यह मैसेज Whatsapp कर दिया है और मिश्र जी का यह संदेश यहां सनतनियों के लिए प्रकाशित कर रहा हूं। दोनों महानुभाव का साक्षात्कार भी मैं शीघ्र करूंगा इस विवाद पर। दोनों ने इसकी संस्तुति दे दी है।
मिश्र जी का निग्रहाचार्यजी के नाम संदेश:-
१) यह मैंने कब कहा कि शंकराचार्य के भाष्य को मैं नहीं मानता?
२) शंकराचार्य जी ने अपने भाष्य में कहाँ कहा है कि ऋषिकाएँ मंत्र द्रष्टा नहीं हैं अथवा ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्यवर्ण के लोग मंत्र द्रष्टा नहीं हैं ?
३) शंकराचार्य परंपरा में व्यास जी उनके पूर्ववर्ती सिद्ध हैं । उन्होंने पुराण लिखे हैं । जहाँ वेद अथवा शंकराचार्य जी का भाष्य मौन है वहाँ व्यास जी के पुराण प्रमाण हैं ।
४) रही बात आचार्य सायण के भाष्य की तो वे एक महान विद्वान थे। राजा के मंत्री थे, परंतु संन्यासी नहीं थे। यदि कहीं उनका भाष्य आदि शंकराचार्य और व्यास जी के मत के विरुद्ध पाया जायेगा तो वहाँ इन दोनों आचार्यों के मत के आधार पर चलना पड़ेगा।
५) करपात्री जी महाराज का भाष्य या उनकी मान्यतायें यहाँ शास्त्रार्थ का विषय नहीं हैं। वैसे सम्भवतः अब तक न तो करपात्री जी का ऋग्वेदभाष्य और न ही ऐतरेय ब्राह्मण भाष्य प्रकाश में आया है ।
६) यहाँ तो शास्त्रार्थ का विषय यह है कि क्या कवष ऐलूश जन्मना शूद्र थे और वत्सप्रीत भालंदि वैश्य थे?
७) क्या चारों वर्ण में जन्मे व्यक्ति, और महिलायें मन्त्रद्रष्टा ऋषि/ ऋषिकाएँ हैं या नहीं ?
८) क्या पी एन मिश्र महा मूर्ख हैं या निग्रहाचार्य जी महामूर्ख हैं?
९) क्या शंकराचार्यों के विरुद्ध निग्रहाचार्य का आक्षेप सत्य है या असत्य?
१०) करपात्री जी के मत से बलवान आदि शंकराचार्य का मत है और आदि शंकराचार्य के मत से बलवान व्यास जी का मत है, व्यास जी के मत से बलवान स्पष्ट वेदमत है । यही चारों शंकराचार्यों को मान्य है और यही मुझे भी मान्य है।
११) वितण्डावाद त्याग कर जो शास्त्रार्थ का अति संक्षिप्त विषय है उसी पर मुझे और निग्रहाचार्यजी को अपना मत सत्य सिद्ध करने हेतु हुए शास्त्रार्थ करना चाहिए।
१२) निग्रहाचार्य जी शंकराचार्य संप्रदाय के नहीं हैं उन्हें अपने संप्रदाय की गुरुता बढ़ाने के लिए शांकर भाष्य के खंडन की आवश्यकता पड़ सकती है। मैं तो उस भाष्य को मानता हूँ जब तक कि निग्रहाचार्य या अन्य कोई उसे वेद विरुद्ध नहीं सिद्ध कर देता जो कि असंभव है।
१३) विभ्रम न फैलायें अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए निग्रहाचार्य जी शास्त्रार्थ में हार या जीत को वरण करने का साहस करें।
१४) उन्होंने वृंदावन के नाम से बनाए गए अपने वीडियो में मेरे विरुद्ध जो कुछ कहा है उसका मैं खंडन करूँगा और वे उसका मण्डन करें। शास्त्रार्थ का विषय यही है।
