#संदीपदेव । मेरे पास आज जो मोबाइल नंबर है, वह वर्ष 2003 से मेरे साथ है! वर्ष 2003 में दैनिक जागरण में एक रिपोर्टर के तौर पर मेरी नियुक्ति हुई थी। फिल्ड रिपोर्टर के लिए मोबाइल लेना पहली प्राथमिकता थी। अखबार प्रबंधन का ऐसा आदेश था।
कुछ दिन पहले ही रिलायंस का ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ फोन लॉन्च हुआ था। उस दौर में जब इनकमिंग भी 8₹/मिनट थी तो रिलायंस 40P/मिनट कॉल दर पर मोबाइल ले आया था।
उस समय उसके सेट की कीमत 21,000₹ और 6500₹ थी। मैंने 6500₹ में रिलायंस का LG वाला सेट लिया था। दो ही सेट उसने लांच किए थे- LG और Sumsung. मुझे LG वाला सेट अधिक पसंद आया था। मेरा मोबाइल का पहला कॉलर ट्यून- ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ और दूसरा कॉलर ट्यून ‘सथिया’ फिल्म का टाइटल सांग का इंस्ट्रूमेंट था। मुझे यह अभी भी याद है!
मेरे मोबाइल लेने के एक महीने के अंदर रिलायंस ने अपने सेट की कीमत केवल 500₹ कर दिया। मैं जो पछताया पूछिए मत! मन ही मन रिलायंस को बड़ा कोसा कि थोड़े दिन पहले कीमत कम करता तो 6000₹ बच जाते! तब 6000₹ बड़ी रकम होती थी।
कुछ साल बाद रिलायंस ने मुझ जैसों के साथ एक और चीटिंग की। बिल लोगों के बढ़ते जा रहे थे। वह उपभोक्ताओं को हर महीने नियमित बिल नहीं भेजता था। उसने एक बार सभी पिछला बकाया जोड़ कर अचानक 16000₹ का बिल भेज दिया। फोन कहीं कट न जाए इसलिए जैसे-तैसे इसका बिल भरा। मेरे बिल भरने के केवल 15 दिन बाद रिलायंस ने 45000₹ तक के सभी के बिल को माफ कर दिया। मेरा जो पारा चढ़ा, मैं बता नहीं सकता।
रिलायंस का जो सेट मैंने लिया था उसका पैसा पिताजी ने दिया था। मेरी तनख्वाह उस समय मात्र 4500₹ थी जो रिलायंस के सेट से भी कम थी। मेरे घर का वह पहला मोबाइल फोन था। मैंने पिताजी को जब कहा कि अखबार प्रबंधन की ओर से मोबाइल खरीदने का आदेश है और मेरे पास पैसे नहीं है तो उन्होंने तुरंत पैसे भेज दिया। उन्हें इसी बात की खुशी थी कि उनका बेरोजगार बेटा अब नौकरी कर रहा है।
‘दैनिक जागरण’ से पहले मैं ‘वीर अर्जुन’ अखबार में कार्यरत था, जहां मेरी तनख्वाह मात्र 1500₹ थी। उस हिसाब से ‘दैनिक जागरण’ में अच्छे पैसे में मेरी ज्वाइनिंग हुई थी। पर वह पैसा इतना नहीं था कि मोबाइल खरीद सकूं।
मुकेश अंबानी की रिलायंस ने पहले CDMA तकनीक की WLL प्रणाली पर मोबाइल लांच किया था और लाइसेंस का सारा पैसा बचा लिया था। यह विशुद्ध चालाकी थी। बाद में अन्य ऑपरेटरों के विरोध को देखते हुए उसे भी मोबाइल ऑपरेटर के रूप में लाइसेंस का फीस भरना पड़ा, तब जाकर रिलायंस ऑफिशियल मोबाइल ऑपरेटर बना। उससे पहले उसने बड़ी चालाकी से यह पैसा बचा लिया था और बिना मोबाइल ऑपरेशन का लाइसेंस लिए ही वह मोबाइल सेवा प्रदाता बन बैठा था।
पहले इसका नं राज्यों के कोड से आरंभ होता था। मोबाइल ऑपरेटर के रूप में लाइसेंस लेने पर 93 अंक से इसने नंबर आरंभ किया, जिसमें पुराने WLL no का आखिरी पांच अंक वही रहा। पहले मेरा नं 011-32365127 था, जो बदल कर आज वाला हो गया जिसमें आखिरी पांच अंक अभी भी वही है।
भाईयों के बंटवारे में रिलायंस मोबाइल अनिल अंबानी को मिला। आरंभ में कुछ वर्ष वह अच्छा चला, लेकिन नेटवर्क की समस्या आने लगी। बाद में जब मुकेश अंबानी ने #jio लांच किया तो मैंने पुनः मुकेश अंबानी की कंपनी में इसे कन्वर्ट करा लिया।
आज #jio का नेटवर्क बेहद खराब है। कॉल ड्रॉप की जबरदस्त समस्या है। फिर भी मैं ऑपरेटर नहीं बदल पा रहा हूं, क्योंकि मेरा पहला मोबाइल रिलायंस का था और मुझे मेरे पिताजी ने इसे खरीद कर दिया था। इसलिए इसमें मेरे पिताजी की यादें बसी हैं।
मुझे याद है। पत्रकारिता में आने से पूर्व मैं अपने एक दोस्त के साथ दिल्ली में रहता था। मेरे पिताजी जब मुझे उसके मोबाइल पर फोन करते थे तो वह दोस्त घबरा जाता था कि ‘इनकमिंग लग रहा है। संदीप जल्दी बात खत्म करना।’ पिताजी से मेरी पूरी बात नहीं हो पाती थी। घर के अन्य लोगों से बात करना तो बहुत दूर की बात थी!
जब मेरा अपना मोबाइल हुआ तो इनकमिंग के झंझट से मुझे मुक्ति मिल गई। पिताजी बड़े खुश थे कि अब मैं सभी से लंबी बात कर सकता हूं। मेरा विवाह भी हो गया था। पत्नी Shweta Deo गांव में ही थी। गांव में मेरे घर पर पिताजी ने लैंड लाइन लगा रखा था। उसी पर उससे बात होती थी। WLL वाला नं श्वेता को आज तक जुबानी याद है!
हम मानव छोटी-छोटी यादों से मिलकर ही तो बने हैं! इस मोबाइल नंबर और इसके ऑपरेटर कंपनी से मेरे पिता की, मेरे संघर्ष के दिनों की, मेरे पत्रकारिता के शुरुआत की, मेरे फोन की बाट जोहती मेरी पत्नी की, मेरे छोटे से बेटे उमंग की, मेरी मां, मेरे भाई Amardeep Deo– सबकी यादें जुड़ी हैं। सभी बारी-बारी से मुझसे बात करते थे। इसलिए खराब नेटवर्क के बाद भी मैं अपने इस मोबाइल नेटवर्क को नहीं बदल पाता।
जानता हूं अन्य ऑपरेटरों में भी नंबर वही रहता है, परंतु जब कम लोगों के पास मोबाइल होता था और मेरे पिताजी सब से कहते थे कि ‘मेरे बेटे ने रिलायंस का मोबाइल लिया है’, तो उनके चेहरे पर जो खुशी उभरती थी, वह मैं दूसरे ऑपरेटर से जुड़ कर खो दूंगा! मेरे पिताजी की याद है इसमें, इसलिए ऑपरेटर बदल नहीं पाता!
क्या आपमें से कोई है, जिसके पास इतना पुराना नं हो? पहला मोबाइल नं हो? वह पहला ऑपरेटर आज भी बरकरार हो? कोई ऐसी याद हो जो आपके पहले मोबाइल से जुड़ी हो? तो लिखिएगा जरूर!
मुझे जब मेरे पिताजी की याद आती है तो मैं उनसे जुड़ी यादों को लिखता हूं और फिर आंखों से ढुलकते आंसू के साथ मन का भारीपन भी चला जाता है। लिखना और पढ़ना आपको हर दुख, हर अकेलेपन से मुक्त कर देता है!
