मैं कायर , कमजोर , नपुंसक , मैं अब्बासी-हिंदू नेता ;
महामूर्ख हिंदू-जनता ! को , सदा-सदा से मूर्ख बनाता ।
मेरा भेद खुल चुका पूरा , फिर भी हिंदू ! पगलाया है ;
विकल्पहीन ये समझे खुद को , मेरी शरण में आया है ।
बस बढ़ती-उम्र दगा देती है , उफ ! मेरा कमबख्त बुढ़ापा ;
मैंने ही ये नियम बनाया , इसीलिये कुछ कह न पाता ।
लगता मेरी जान जा रही , जान है मेरी कुर्सी में ;
पता नहीं क्या होगा मेरा ? सब कुछ है दल की मर्जी में ।
दल भी कुछ न कर पायेगा , मैं गिरा हूॅं अपने गड्ढे में ;
अपने हाथों से गड्ढा खोदा , गिरना ही होगा इस गड्ढे में ।
पर मैं ऐसे नहीं जाऊॅंगा , सब-कुछ चौपट कर जाऊॅंगा ;
फिर न कोई बचा सकेगा , ऐसा भारत कर जाऊॅंगा ।
“अग्निवीर” लाया सेना में , सेना पूरी ध्वस्त हो गयी ;
भ्रष्टाचार बढ़ाया इतना , सत्यनिष्ठता हर जगह मिट गयी ।
राज्य के तीनों-अंग बिगाड़े , प्रेस-मीडिया किया गुलाम ;
बॉलीवुड को जहरीला कर , बन गया हूॅं मैं उनका गुलफाम ।
मैं जहरीला जहर उगलता , महामूर्ख समझें अमृत ;
अमृत-महोत्सव एकदम फर्जी, हिंदू ! पीता है समझे अमृत ।
हिंदू ! जनता को मूर्ख बनाना , मेरे बायें-हाथ का खेल ;
शत-प्रतिशत मैं झूठ बोलता , सच में पूरा है घालमेल ।
चरित्रवान से मैं डरता हूॅं , जैसे प्रकाश से डरे अंधेरा ;
चरित्रवान को दूर ही रखता , उनका दूर-दूर ही फेरा ।
जहाॅं कहीं भी चरित्रवान हों , ऐसी जगह कभी न जाता ;
बस पुरस्कार लेने जाता हूॅं , कटी हुयी ही नाक कटाता ।
देश के हित से कोई न मतलब , पूरी-दुनिया में मेरे अड्डे ;
चौथेपन में वही रहूॅंगा , पास न आने दूॅंगा बुड्ढे ।
वैसे काफी कुछ कर गुजरा हूॅं , बस इतना ही मलाल है ;
गजवायेहिंद करा न पाया , जो मेरे लिये हलाल है ।
पर मेरा दल करेगा पूरा , सब के सब मेरे ही जैसे ;
समलैंगिक है मातृसंस्था , क्या छोड़ेगें देश को ऐसे ?
मूर्ख ! हमेशा बोझा ढोता , चतुर-खिलाड़ी मौज मनाता ;
टैक्स-डकैती हिंदू ! पर है , मर जायेगा रोता – रोता ।
मेरा क्या है मौज मनाता , रंगरेलियां करता हूॅं ;
मेरे जितने चंटू – घंटू , टुकड़े फेंका करता हूॅं ।
यही तो हैं मास्टरस्ट्रोक-वादी , प्रोपेगेण्डा का स्ट्रोक ;
भयभीत किये हैं सच्चे-हिन्दू , यही रहे हैं मुझको ठोंक ।
