संदीप देव। मेरे पिताजी की आकस्मिक मृत्यु पर हमारे परिवार को ढांढस बंधाने कल India Speak Daily के कार्यालय में श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर यति नरसिंम्हानंद गिरि जी महाराज पधारे।
यति जी के अलावा कल मेरे मित्र Kamal Rawat जी भी अपने परिवार के साथ पिताजी को श्रद्धांजलि देने पधारे। कमल जी और उनका परिवार हर सुख-दुख में मेरे साथ खड़ा रहता है। धन्यवाद कमल भाई और मीनाक्षी भाभी।
यति जी, कमल भाई एवं मेरे कुछ अन्य मित्र बिहार ही आना चाहते थे, परंतु इन सभी को वहां परेशानी होती, इसलिए मैंने ही इन्हें रोक दिया था।
यति जी ने कहा कि “माता-पिता की मृत्यु का घाव कभी नहीं भरता। आप कितने भी बड़े हो जाओ, माता-पिता का साया सिर से उठने पर अनाथ होने की अनुभूति होती है। जीवन की हर अच्छी याद माता-पिता से जुड़ी होती है।” उनका कहना था कि “मृत्यु तो परमात्मा के हाथ में है। क्या किया जा सकता है? अब तो हौसला के साथ ही आप सभी को आगे बढ़ना होगा।”
पिताजी की मृत्यु के बाद जब मैं मां को लेकर बहादुरगढ़ आया तो मेरे बहुत सारे मित्रों व शुभचिंतकों का फोन आया कि मैं आपके घर आ रहा हूं। ये सभी मित्र व शुभचिंतक ही मेरी शक्ति हैं। मेरी मां की स्थिति ठीक नहीं है। वह दिन रात रोती रहती हैं। वह किसी से मिलना नहीं चाहती। पिताजी अब कभी नहीं लौटेंगे, वह यह विश्वास नहीं कर पा रही हैं।
आप सभी मित्रों से १२ दिसंबर को हयात सेंट्रिक, जनकपुरी, दिल्ली में कुरुक्षेत्र धर्मालंकरण समारोह में तो मुलाकात होगी ही। तब तक शायद मां भी थोड़ी संभल जाए। श्रीहरि विष्णु सब संभाल लेंगे। आप सभी का आशीर्वाद और स्नेह ही मेरा और मेरे परिवार का संबल है। आप सभी का आभार।
