संदीप देव। “गवां दु:खमपाकर्तुं शस्त्रं जग्राह भार्गव: ।”
अर्थात्:- गायों (गवाम) के दुख/पीड़ा (दुखम) को दूर करने (अपाकर्तुम) के लिए, भार्गव (परशुराम) ने शस्त्र (शस्त्रम) धारण किया/उठाया (जग्राह)।
यह श्लोक दर्शाता है कि जब गायों पर अत्याचार होने लगा, तब ऋषियों के वंश में जन्मे भगवान परशुराम ने सज्जनों की रक्षा और गायों के दुख को दूर करने के लिए परशु (फरसा) उठाया। यह उनके सात्विक होकर भी गो विरोधी दुष्टों के संहार के लिए शस्त्र उठाने के संकल्प को बताता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब हैहयवंशी राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसकी सेना ने ऋषि जमदग्नि (भगवान परशुराम जी के पिता) की कामधेनु गाय का अपहरण करने की कोशिश की और ऋषियों को कष्ट पहुँचाया, तब परशुराम जी ने शस्त्र धारण किया था।
भगवान परशुराम ने बाद में एक गो प्रदेश ही बसाया, जिसे आज आप गोवा के नाम से जानते हैं और जहां हिंदुओं के संहारक पुर्तगाली सेंट फ्रांसिस के विरुद्ध बोलने पर गौतम खट्टर को गिरफ्तार किया गया था और जहां के भाजपाई मुख्यमंत्री ने गर्व से कहा था कि हम गोवा में उच्च क्वालिटी का बीफ उपलब्ध कराएंगे!
शंकराचार्य जी के अनुसार बहुत कम लोग जानते हैं कि गोवा का पूर्व नाम गोंएं हैं, जो कोंकणी भाषा का शब्द है। गोंएं अर्थात् गो की भूमि। पुर्तगाली गोंएं का उच्चारण नहीं कर पाते थे, फिर उन्होंने इसे गोवा कहना प्रारंभ किया।
कथा आती है कि भगवान परशुराम ने अपने फरसे के वार से समुद्र के बीच इस टापू अर्थात् गोंएं भूमि का निर्माण किया। इसके अलावा केरल का निर्माण भी भगवान परशुराम ने किया। यहीं से उन्होंने कलरिपट्टू और मार्शल आर्ट की शिक्षा आरंभ की। भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र प्रदान किया और उनकी अजेय नारायणी सेना को युद्ध में पारंगत बनाया। भगवान श्रीकृष्ण की ‘नारायणी सेना’ को ‘गोप सेना’ भी कहा जाता था। युद्ध के साथ-साथ इसका प्रमुख कार्य गाय की रक्षा करना भी था।
बाद के समय में बोधिधर्मन के जरिए भगवान परशुराम द्वारा विकसित मार्शल आर्ट की यह विधि चीन पहुंची और वहां से यह पूरे पूर्वी एशियाई देशों में फैली। आज चीन, जापान, कोरिया आदि में जो मार्शल आर्ट प्रचलित है, उसके जनक भगवान परशुराम ही हैं।
बोधिधर्मन का भी बड़ा इतिहास है। वह दक्षिण भारत के पल्लव (कांचीपुरम) राजवंश के राजकुमार थे। उन्होंने मार्शल आर्ट सीखा, ध्यान की विधि सीखी और चीन पहुंचे जहां उन्होंने ‘चान (ज़ेन) बौद्ध धर्म’ की स्थापना की। उन्होंने भगवान परशुराम की मार्शल आर्ट शिक्षाओं में अपने तरीके से विकास कर उसे ‘शाओलिन कुंग फू’ का रूप दिया। चीन में जो ध्यान पर आधारित बौद्ध धर्म (Zen) की शुरुआत हुई वह बोधिधर्मन की ही देन है।
बुद्ध की ध्यान की शिक्षा में उन्होंने भगवान परशुराम की मार्शल आर्ट की शिक्षा को मिलाया और शाओलिन मंदिर में भिक्षुओं को शारीरिक व मानसिक मजबूती के लिए कुंग फू सिखाया।
तो सोचिए भगवान परशुराम द्वारा गाय के जीवन की रक्षा के लिए छेड़ी गई लड़ाई ने कितनी बड़ी संस्कृति के निर्माण का आधार तैयार किया। और आज? आज के तथाकथित हिंदू, गाय से अधिक पार्टी व नेता का चरण पूजने में लीन हैं!
वेदों में गाय को ‘अघ्न्या’ (न मारने योग्य), ‘माता’, और ‘सर्व सुखप्रदा’ (सुख देने वाली) माना गया है। ऋग्वेद में गाय का 723 बार उल्लेख है, जो इसके सर्वोच्च महत्व को दर्शाता है। वेदों के अनुसार गाय संपत्ति का भंडार है और इसका दूध-घी यज्ञ तथा स्वास्थ्य के लिए परम पवित्र है। आज गाय की दुर्गति के कारण ही हिंदुओं की दुर्गति है और जहां इस्लाम, ईसायत और यहां तक कि छोटे-से बौद्ध धर्म के भी कई देश हैं, वहीं हिंदुओं का एक भी देश आज विश्व में नहीं है! जय गो माता! जय भगवान परशुराम!
