संदीप देव । सुनो ओ दिल्ली के सुल्तानों!
सुनो ओ लखनऊ के नवाब!
धर्म की मर्यादा को
राजनीति की तराजू में मत तोलो,
तुमने सोचा था कि शंकराचार्यजी को सलाखों के पीछे डालकर,
सनातन का मस्तक झुका दोगे? फिर सुनो सनातन की यह हुंकार…
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इतिहास गवाह है,
जब-जब सत्ता अंधी और अहंकारी हुई,
तब-तब धर्म की मशाल ने ही,
उस अहंकार की बलि ली।
तुमने रचे थे षड्यंत्र गहरे,
झूठ के जाल बिछाए थे,
तुमने शंकर पर हमले के
छल-प्रपंच रचाए थे!
मगर सुनो!
मगर सुनो!!
यह ज्योतिषपीठ का तेज है,
कोई बुझता दीया नहीं,
यह वो अमृत है जिसे,
किसी काल ने अभी पिया नहीं।
तुममें इतना दम कहाँ,
जो सत्य को बांध सको,
तुम्हारी फाइलों में वो जोर कहाँ,
जो धर्म-दंड को लांघ सको!
सत्ता की कुर्सी पर बैठकर,
जो खुद को खुदा समझ बैठे,
वो देख लें आज कैसे,
मुंह के बल हैं गिरे हुए!
तुमने शंकर की गरिमा पर,
जो कीचड़ उछालना चाहा था,
वह कीचड़ अब तुम्हारे दामन पर,
कालिख बन कर उभरेगा!
‘खाकी’ की ताकत दिखाकर,
तुमने धर्म को डराना चाहा,
झूठे केसों की आड़ में,
सनातन का गला घोंटना चाहा।
पर याद रखना!
पर याद रखना!!
जब संतों का श्राप लगता है,
तो तख्त पलट जाते हैं,
मद में चूर सिकंदर भी,
खाली हाथ ही यहाँ से जाते हैं!
विजय हुई है सत्य की,
झूठ के किले ढह गये,
सनातन का ‘सूर्य’ बन फिर,
शंकराचार्य चमक गये!
हर-हर महादेव!
