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India Speak Daily > Blog > धर्म > अब्राहम रिलिजन > खुमैनी ने कहा था: “पूरा इस्लाम राजनीति है।” पार्ट-२
अब्राहम रिलिजनविचार

खुमैनी ने कहा था: “पूरा इस्लाम राजनीति है।” पार्ट-२

ISD News Network
Last updated: 2025/11/05 at 1:17 PM
By ISD News Network 17 Views 12 Min Read
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शंकर शरण। खुमैनी ने कहा था: “पूरा इस्लाम राजनीति है।” उन्होंने सही कहा था। काफिरों के प्रति इस्लाम का व्यवहार ही राजनीतिक इस्लाम है। मुहम्मद की जीवनी, कुरान, और हदीस यह तीनों मिलाकर इस्लामी सिद्धांत और व्यवहार बनता है। इस की आधी से अधिक सामग्री काफिरों (गैर-मुस्लिमों) पर केंद्रित है।।।। इस्लाम का एक मात्र लक्ष्य है: पूरी दुनिया में इस्लाम का राज स्थापित करना। दूसरे शब्दों में, गैर-मुस्लिमों (काफिरों) को या तो इस्लाम कबूल कराना या खत्म करना।

राजनीतिक इस्लाम को जानना जरूरी-2

राजनीतिक इस्लाम के प्रति गफलत से निकलना अनिवार्य है। यह करना, और इस के प्रति जागरूकता फैलाने में कोई बड़ी बाधा भी नहीं भी है। क्योंकि अपनी ही परिभाषा से इस्लाम केवल मजहब नहीं, राजनीति भी है। यह खुद को ‘दीन और दौला’, रिलीजन और स्टेट, कहता है। जिस के कायदे-कानून, गैर-मुस्लिमों (काफिरों) समेत सब के ऊपर लागू होने के लिए बनाए गए हैं। तब उस राजनीति की चर्चा करना कौन रोक सकता है!

अतः यह हर काफिर, यानी हिन्दू, बौद्ध, जैन, क्रिश्चियन, आदि का जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह उन के ऊपर दावा रखने वाले मतवाद को जाने। उस की खुली समीक्षा करे। वरना, वह खतरा वास्तविक है जिस की चेतावनी योगी दे रहे हैं। और जो पीछे देश-विभाजन में, और फिर कश्मीर से हिन्दुओं के सफाए में हो चुका है। आगे वह बंद हो, इस के लिए पहली जरूरत राजनीतिक इस्लाम को जानना है। उस के दावे, और उस की तकनीक, और उस का इतिहास।

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ध्यान दें, अपनी राजनीति से ही इस्लाम पूरी दुनिया में दशकों से चर्चित है। उस की तमाम मजहबी हस्तियाँ भी राजनीतिक कामों से ही नामी हुईं। जैसे, यहाँ मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, मौलाना आजाद, मौलाना हसरत मोहानी, मौलाना सुबहानी, और बाहर अयातुल्ला खुमैनी, मुल्ला उमर, आदि। यह स्वाभाविक ही है। जैसा खुमैनी ने कहा था: “पूरा इस्लाम राजनीति है।”

उन्होंने सही कहा था। काफिरों के प्रति इस्लाम का व्यवहार ही राजनीतिक इस्लाम है। मुहम्मद की जीवनी, कुरान, और हदीस यह तीनों मिलाकर इस्लामी सिद्धांत और व्यवहार बनता है। इस की आधी से अधिक सामग्री काफिरों (गैर-मुस्लिमों) पर केंद्रित है। काफिर के विरुद्ध व्यवहार व जिहाद के बारे में हर तरह के निर्देश, उपाय, और उदाहरण। मुहम्मद की जीवनी में तीन चौथाई से अधिक सामग्री काफिरों/जिहाद के बारे में हैं। कुरान में लगभग दो तिहाई और हदीस में एक तिहाई, लगभग दो हजार हदीसें, केवल काफिरों के बारे में हैं।

वह सब काफिरों को जानना ही चाहिए। वरना वे गफलत में अनिवार्यत: मारे जाते रहेंगे, जो गत सौ सालों से पंजाब, बंगाल, कश्मीर, आदि अनेक बड़े-बड़े क्षेत्रों में हुआ। और शेष दुनिया के कई देशों में भी सदियों से होता रहा है। उस की पूरी व्याख्या राजनीतिक इस्लाम को जानकर ही हो सकती है। अन्यथा नहीं।

यह साफ समझ लेना चाहिए कि इस्लाम की असली ताकत गैर-मुस्लिमों में उस के प्रति गफलत है। वरना, भौतिक, आर्थिक, तकनीकी, शैक्षिक, सांस्कृतिक, आदि सभी क्षेत्र में पूरे विश्व में मुस्लिम समाज प्राय: शून्य रहा है। आरंभ से ही। किन्तु उस की राजनीति के बारे में दूसरों के अज्ञान के बल पर अपनी दृढ़ता, शिकायत, कपट, और हिंसा धमकी से उस का जिहाद हर कहीं सफल होता बढ़‌ता रहा है। यही सौ साल से भारत में और पचास सालों से यूरोप में हो रहा है।

जिहाद मूलतः हिंसा नहीं है। जिहाद है किसी भी तरह इस्लाम को जिताना और गैर-इस्लामी धर्म, संस्कृति, कानून, समाज, आदि को इस्लामी बनने के लिए मजबूर करना। इस के लिए छल, विश्वासघात और हिंसा समेत हर तरीका जायज है। चूँकि किसी भी मानव समूह को झुकाने या मिटाने में हिंसा कारगर रही है, और मुहम्मद ने भी तलवार के जोर से ही मदीना और मक्का को झुकाया था — इसलिए हिंसा करना इस्लाम के साथ आरंभ से स्थापित है। कुरान में स्पष्ट लिखा है, कि जिहाद का मतलब “कत्ल करना और कत्ल होना”, slay and be slain। (कुरान, 9:111, 47:4)। इस्लाम-त्रयी, यानी मुहम्मद की जीवनी, कुरान, और हदीस, इन तीनों मूल किताबों में कुल मिलाकर राजनीतिक हिंसा को समर्पित 3,27,547 शब्द हैं — लगभग एक तिहाई!

इतनी बेधड़क जिद और मरने-मारने के लिए उतारू मतवाद के समक्ष दूसरे समाज की पहली प्रतिक्रिया अविश्वास की होती है। कि अरे, कोई धर्म ऐसा कैसे हो सकता है! विशेषकर हिन्दू नेताओं, लेखकों, विचारकों की पहली और प्रायः अंतिम प्रतिक्रिया होती है कि यह सब झूठा प्रचार है। इस भावना का इस्लामी नेता जमकर उपयोग करते हैं, उन का भ्रम बढ़ाते हैं, शान्ति व‌ सुख से जीने की उन का लालसा का, तथा उन की सत्ता-लिप्सा (वोट, धन) का उपयोग करते हैं, आदि। ताकि हिन्दू, क्रिश्चियन, या वामपंथी भ्रमित रहें और अपने-अपने देशों, क्षेत्रों में इस्लाम को आदर, सुविधा, बढ़त देते रहें। इस तरह, काफिरों की गफलत और इस्लाम की दृढ़ता से भारत और यूरोप में इस्लाम बेरोकटोक अपने पैर, कानून, और जमीन बढ़ाता जा रहा है। यह शान्ति पूर्ण जिहाद है। पर जिस का परिणाम वही होता है जो इस्लाम का लक्ष्य है: काफिर समाज को मिटाना।

इसलिए सभी लोगों का सहज अधिकार है, कि इस्लाम के राजनीतिक रूप की आमूल  समीक्षा करें! ऐसा न करना अपने विनाश को प्रोत्साहन देना है, चाहे उस में दशकों क्यों न लगें।

इस्लाम का एक मात्र लक्ष्य है: पूरी दुनिया में इस्लाम का राज स्थापित करना। दूसरे शब्दों में, गैर-मुस्लिमों (काफिरों) को या तो इस्लाम कबूल कराना या खत्म करना।  कुरान में लगभग 400 बार काफिर (अंग्रेजी अनुवाद में disbeliever, rejector, denier, आदि) का उल्लेख है। कोई 345 बार काफिर का सीधा अर्थ यह मिलता है: ‘जो अल्लाह और उस के प्रोफेट मुहम्मद को न मानता हो’।

कुरान आधे से अधिक इस पर है कि काफिर बुरे और घृणित हैं। उन के लिए एक भी अच्छा शब्द उस में नहीं है। उदाहरण के लिए, ‘अल्लाह काफिरों का दुश्मन है’ (कुरान, 2:98)। ‘‘दुश्मन वे हैं जो अल्लाह के कहे से इन्कार करते हैं।’’ (60:1)। काफिर से अल्लाह और मुसलमान घृणा ही नहीं, बल्कि ‘तीव्र घृणा’ करते हैं (40:35)।

काफिरों का दोष?  केवल यह कि वे अपना धर्म-विश्वास मानते हैं, उसी के अनुसार चलना चाहते हैं। इस्लाम को अस्वीकार, reject करते हैं। मुहम्मद और कुरान को नहीं अपनाते। बस, इसीलिए अल्लाह और मुहम्मद उस के दुश्मन हैं। तदनुरूप,  अल्लाह और मुहम्मद ने मुसलमानों से वही दुश्मनी निभाने की कड़ी ताकीद की है!

बल्कि, काफिरों से दोस्ती करने पर मुसलमानों को भी दंड की धमकी दी है (कुरान, 3:28; 4:144)। जिहाद से हिचकने वाले मुसलमानों को भी दंड मिलेगा (9:38-39, 41-49)। अब सरलता से समझ सकते हैं कि क्यों मिल-जुलकर रहना चाहने वाले या मानवतावादी मुसलमान भी राजनीतिक इस्लाम के सामने व्यर्थ हैं। यद्यपि सारी दुनिया में काफिर नेता उन्हीं के भरोसे अपने को भ्रमित रखते हुए, इस्लाम को खुला मौका दिए रहते हैं।

जबकि कुरान में साफ लिखा है कि कुरान चेतावनी और धमकी है, ‘…warn by the Quran him who fear My threat।’ (50:45)।  यह धमकी काफिरों और मुसलमानों दोनों के लिए है। इसीलिए किसी मुस्लिम देश में भी शान्ति मुश्किल से दिखती है। चूँकि मूलतः धमकी और हिंसा ही राजनीतिक इस्लाम के तरीके हैं, इसलिए उन में आपसी मतभेद पर भी प्राय: वही प्रयोग होता है।

अतः सभी विचारशील मनुष्यों का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है कि राजनीतिक इस्लाम का इतिहास व वर्तमान, उस का सिद्धान्त और व्यवहार अच्छी तरह जानें। राजनीतिक इस्लाम काफिरों के साथ किसी भी स्थाई शान्ति या बराबरी के संबंध को सिद्धांततः खारिज करता है। ऊपर उद्धृत जिन्ना के बयान में भी देख सकते हैं कि भारत-विभाजन का एक मात्र कारण वही सिद्धांत था। वही सदियों से दुनिया के विविध भागों में भी देखा गया है। कश्मीर से हिन्दुओं के सफाए का भी सिद्धांत वही था। वही अनेकानेक मुस्लिम देशों में भी है, जहाँ गैर-मुस्लिमों को निचले दर्जे के नागरिक जैसे रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यानी, अंततः इस्लाम कबूल करने की दिशा में ढकेलना।

अतः राजनीतिक इस्लाम को आमूल समझे बिना इस का मुकाबला असंभव है। बेहिसाब धन या आधुनिकतम हथियारों से भी नहीं। क्यों कि यह मनोबल और विचार की लड़ाई है। अफगानिस्तान में तालिबान के हाथों अमेरिकी और यूरोपीय फौजों की शर्मनाक पराजय का वही सबक है!

सो, असल में, राजनीतिक इस्लाम के विरुद्ध लड़ाई मुख्यतः वैचारिक-शैक्षिक है। जिसे काफिर जगत उपेक्षित करता रहा है, या बचना चाहता है। जो उसी तरह हास्यास्पद है जैसा कम्युनिज्म से लड़ते हुए मार्क्स-लेनिन और उन की किताबों पर श्रद्धा रखना! पर जिहादी संगठनों, और इस्लामी सत्ताओं से लड़ने में ठीक वही हो रहा है। तालिबान या इस्लामी स्टेट या इंडियन मुजाहिदीन के विचारों, उन के मदरसों के सिलेबस, किताबों, आदि को श्रद्धास्पद मानकर तालिबान से महज भौतिक, सैनिक लड़ाई लड़ने के काम होते रहे। तब परिणाम सुनिश्चित है। मुल्ला उमर, बगदादी, ओसामा, या मुहम्मद अफजल को मारने के बाद दूसरे आते ही रहेंगे। क्योंकि अपने मतवाद पर उन का भरोसा यथावत है। वह भरोसा तोड़ना आवश्यक है। इस पर अमेरिकी, यूरोपीय, भारतीय नेता, नीतिकार, बौद्धिक, आदि सब लोग कमोबेश भ्रमित हैं। उन्हें समझ में नहीं आया है कि वे किस से, और किसलिए लड़ रहे हैं? किसे संतुष्ट कर रहे हैं? क्या पा या खो रहे हैं?

इसलिए, योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद कि उन्होंने सही बिन्दु पर ध्यान दिलाया है। अच्छा हो कि हमारे बौद्धिक, अकादमिक लोग, तथा शैक्षिक, अकादमिक,‌ शोध संस्थान इस उपेक्षित पर नितांत जरूरी विषय पर विचार-विमर्श, शोध, लेखन, प्रकाशन को प्रोत्साहन दें। इस निहायत शान्तिपूर्ण कार्य में ही राजनीतिक इस्लाम की पराजय छिपी है। मानवता की भलाई भी। साथ ही, मुसलमानों की मुक्ति भी!

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