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India Speak Daily > समाचार > मुद्दा > पढि़ए किस तरह से अजीत डोभाल की योजना फेल हुई कश्मीर में! मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता के रूप में सामने आयी कश्मीर नीति!
मुद्दा

पढि़ए किस तरह से अजीत डोभाल की योजना फेल हुई कश्मीर में! मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता के रूप में सामने आयी कश्मीर नीति!

ISD News Network
By ISD News Network 10 Min Read
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10 Min Read
PM Modi and Mehbooba Mufti (File Photo)
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आखिर भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी का गठबंधन कश्मीर में टूट ही गया। यह बहुत पहले टूट जाना चाहिए था, लेकिन भाजपा कीचड़ में इस कदर फंस गयी थी कि वह अपना चेहरा बचाने का मौका तलाश रही थी। यह मौका उसे आतंकवाद के शिकार हुए जवान औरंगजेब और पत्रकार सुजात बुखारी की हत्या के बाद सामने आया, और उसने उसे लपक लिया! मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता के रूप में कश्मीर नीति को दर्ज किया जा सकता है, हालांकि इसे सुधारने के लिए अभी भी एक साल का वक्त है।

भाजपा के समक्ष इस बेमेल सरकार से निकलने का अवसर इससे पहले भी आया था जब कठुआ पर महबूबा सरकार ने एक तरफा कार्रवाई करते हुए जम्मू के डोगरा हिंदुओं को हद दर्जे तक अपमानित और प्रताडि़त किया था। लेकिन भाजपा ने अपने मतदाताओं डोगरा हिंदुओं का समर्थन करने की जगह, उसके समर्थन में गये अपने दो विधायकों पर ही कार्रवाई कर दी। इसके बाद जम्मू के हिंदुओं का गुस्सा भाजपा के खिलाफ इतना बढ़ गया कि भाजपा डर गयी। इससे हुई फजीहत से बचने के लिए भाजपा ने जम्मू-कश्मीर सरकार के मंत्रीमंडल का पुनर्गठन कर पाप छुपाने की कोशिश की, लेकिन वहां भी मुंह के बल गिरी। भाजपा को अपने उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह को हटाकर कविंद्र गुप्ता जैसे डोगरा हिंदुओं के पक्षधर नेता को उपमुख्यमंत्री बनाना पड़ा। निर्मल सिंह सत्ता के लालच में महबूबा मुफ्ती के पिछलग्गू बन कर रह गये थे। वह तो इतने बेगैरत निकले कि भारतीय सेना के खिलाफ भी अलगाववादियों की भाषा बोलने लगे थे। डोगरा हिंदुओं को भड़काने में निर्मल सिंह जैसे नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई है।

डोगरा हिंदुओं के गुस्से को देखें तो जम्मू से 25 सीट जीतने वाली भाजपा यदि आज चुनाव हो जाए तो शायद 5 सीट भी नहीं जीत पाए! प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्रीय सलाहकार अजीत डोभाल की सोच को पहली बार झटका लगा है। यही नहीं, भाजपा के महासचिव राम माधव के अति आत्मविश्वास के कारण भी आज प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पैर पीछे खींचने पड़े हैं।

कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन की सोच अजीत डोभाल के दिमाग की उपज थी, और इसे राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने और इस पर निगाह रखने की जिम्मेदारी राम माधव को सौंपी गयी थी, जिसमें वह बुरी तरह से फेल हुए। हालांकि इस विफलता का ठीकरा तो टीम के नेता प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सिर ही फूटना है, क्योंकि बार-बार डोगरा हिंदू अपना दर्द पत्र, मेल, नमो एप, एवं सोशल मीडिया के जरिए इन दोनों को भेज रहे थे, लेकिन देर से ही सही उनकी सुनवाई इन दोनों ने सुन ली। हालांकि एक साल के भीतर मोदी सरकार ने इस विफलता को सफलता में नहीं बदला तो तय मानिए न केवल जम्मू, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी इसके नकारात्मक असर से भाजपा नहीं बचेगी।

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अजीत डोभाल की भूमिका

खुफिया एजेंसी के सेवानिवृत्त अधिकारियों से बात करेंगे तो पाएंगे कि कश्मीर की सारी पॉलिसी प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्रीय सलाहकार अजीत डोभाल ही हैंडल करते हैं। इन अधिकारियों के मुताबिक रॉ के पूर्व जासूस अजीत डोभाल ने एक समय कश्मीर के अलगाववादियों, खासकर हुर्रियत के नेताओं को बेअसर करने के लिए महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पार्टी पीडीपी को घाटी में बढ़ाने का काम किया था। हुर्रियत और उसके नेता गिलानी, यासीन मलिक आदि सभी पाकिस्तान परस्त अलगाववादी हैं। 1990 के दशक में शुरु हुए आतंकवाद को बढ़ाने का काम यही लोग कर रहे हैं। हुर्रियत घाटी में चुनाव का भी बहिष्कार करती रही है।

अजीत डोभाल की योजना थी कि घाटी में एक हिंदुस्तान परस्त सॉफ्ट अलगावादी नेतृत्व उभरे, जो मूलतः भारत की सरकार में आस्था रखता हो और जो देश के चुनावी प्रक्रिया के जरिए सत्ता में हिस्सेदारी का पक्षधर हो। इसी के तहत मुफ्ती मोहम्मद सईद को आगे बढ़ाया गया। वह अलगाववादियों की भाषा बोलते थे, लेकिन हुर्रियत की तरह पाकिस्तान परस्त नहीं थे। वह अलगाववादियों की भाषा बोलते थे, लेकिन वह कश्मीर विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेते थे। इस तरह अजीत डोभाल की योजना के कारण धीरे-धीरे हुर्रियत घाटी में बेअसर होने लगी। हुर्रियत को इसका ऐहसास था, इसलिए डर के मारे वह कभी चुनाव मंे हिस्सा नहीं लेती थी। उसे पता था कि वह चुनाव नहीं जीत पाएगी, इसलिए बार-बार वह विधानसभा चुनाव का बहिष्कार कर अपना दबदबा बनाए रखने का प्रयास करती रही थी।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में जब जम्मू व लद्दाख की 25 सीट भाजपा को और कश्मीर घाटी की 28 सीट पीडीपी को मिला तो अजीत डोभाल ने अपनी पुरानी योजना को आगे बढ़ाया। उनकी सोच सही थी। वह मुफ्ती मोहम्मद सईद के जरिए कश्मीर के अलगाववादियों को मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास कर रहे थे, जिसके तहत यह मिली-जुली सरकार बनाई गई। लेकिन कुछ समय बाद ही तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु हो गयी। उनकी बेटी महबूबा की सोच कहीं अधिक कट्टर थी। वह अलगाववाद की समर्थक थी।

महबूबा यह मिलीजुली सरकार नहीं बनाना चाहती थी, लेकिन डोभाल को विश्वास था कि यदि सरकार बन गयी तो महबूबा के जरिए हुर्रियत को घाटी से अप्रासांगिक बनाया जा सकता है। लेकिन महबूबा तो कुछ और ही निकली। भाजपा के साथ रहकर भी वह अलगाववाद की सबसे बड़ी पैरोकार निकली। भाजपा आखिर तक इस उम्मीद में थी कि पीडीपी के जरिए वह घाटी के अलगावादियों को या तो मुख्यधारा में ले जाएगी या पूरी तरह से मिटा देगी। इसीलिए महबूबा की बात मानकर पत्थरबाजों को छोड़ने से लेकर रमजान में संघर्ष-विराम जैसी अपनी विचारधारा के विपरीत मोदी सरकार ने निर्णय लिया, लेकिन महबूबा अपनी कट्टरता से बाज नहीं आ रही थी। महबूबा की कट्टरता के कारण भाजपा जम्मू के हिंदुओं का भरोसा खोती जा रही थी।

कठुआ मामला भाजपा के गले की फांस बन गयी!

दूसरी तरफ कठुआ मामले ने भाजपा को पूरी तरह से पीछे ढकेल दिया। कठुआ में महबूबा की सरकार ने कट्टरपंथियों की तरह व्यवहार किया। जम्मू में रोहिंग्याओं को बसाने के लिए कठुआ का कुचक्र रचा गया और इसकी जांच एक ऐसे कट्टर मुसलिम अधिकारी को सौंपी गयी, जिसका चरित्र खुद ही संदिग्ध है। इसके कारण जम्मू पूरी तरह उबल पड़ा। जम्मू का एक-एक प्रबुद्ध और आम हिंदू भाजपा के खिलाफ खुलकर अपने गुस्से का इजहार कर रहा था। भाजपा को हराने के लिए वहां के दुखी और पीडि़त डोगरा हिंदुओं ने बकायदा अभियान चलाया और लंबे हड़ताल और राजमार्ग को जाम करने का सिलसिला चला। इसका असर देश के अन्य हिस्सों पर भी पड़ रहा था।

देश के अन्य हिंदुओं के मन में भी यह सवाल उठने लगा था कि भाजपा हिंदुत्व की अपनी राजनीति को विकास के नाम पर सेक्यूलरपंथ की ओर ढकेल रही है। धारा-370, अनुच्छेद-35 ए, जैसे मुद्दे को तो जैसे भाजपा और मोदी सरकार पूरी तरह से भूल ही दिया था। भाजपा के मूल मतदाताओं का देश भर में गुस्सा बढ़ता जा रहा था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हमेशा नजर रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों से यह सब बच नहीं सकता था और उन्होंने महबूबा की सरकार से निकलने का निर्णय ले लिया।

संभवतः आगे अजीत डोभाल की बैक-अप योजना मोदी सरकार को फायदा पहुंचा दे, लेकिन फिलहाल तो मोदी सरकार को बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था और इससे बचने के लिए महबूबा सरकार से निकलने के अलावा और कोई चारा नहीं था। भाजपा के लिए यह सबक भी जरूरी था कि वह राममाधव जैसे गैर जमीनी नेता नेता और निर्मल सिंह जैसे पिछलग्गू नेताओं की हर रिपोर्ट पर भरोसा करने की जगह, स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं पर भरोसा करे। कार्यकर्ता की इच्छा और जनता की राय ही किसी पार्टी की ताकत हैं! भाजपा इसे जितनी जल्दी समझ जाए, 2019 का आम चुनाव उतना अधिक उसके लिए आसान होगा, अन्यथा जम्मू-कश्मीर का रिसता दर्द 2019 के बाद मोदी-शाह को कहीं सपने में न डराने लगे!

URL: Kashmir policy emerged as the biggest failure of the Modi government

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ISD News Network June 19, 2018
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