संदीप देव। ब्राह्मण अर्थात् ज्ञान,
न कि भेड़ समान!
ब्राह्मण अर्थात तेज,
न कि कालनेमी का वेश!
ब्राह्मण अर्थात् गुरु-शिष्य परंपरा,
न कि निर्जीव झंडे और डंडे के सामने सिर धरा!
ब्राह्मण अर्थात् त्याग,
न कि ‘समलैंगिकता का राग’!
ब्राह्मण अर्थात् संस्कार,
न कि हिंदू बेटियों का ‘लव जिहाद’!
ब्राह्मण अर्थात् पूजा,
न कि मंदिरों का विनाश!
ब्राह्मण अर्थात् तपस्या,
न कि तीर्थ लूटने का प्रयास!
ब्राह्मण अर्थात् गो सेवा,
न कि गो मांस का मेवा!
ब्राह्मण अर्थात् सत्य,
न कि जुमलेबाजी और असत्य!
ब्राह्मण अर्थात् संन्यास,
न कि वीडियो में बंद ‘कई राज’!
ब्राह्मण अर्थात् गृहस्थ,
न कि अविवाहित, परंतु भ्रष्ट!
ब्राह्मण अर्थात् धर्म,
न कि म्लेच्छ डीएनए का अधर्म!
ब्राह्मण अर्थात् बलिदान,
न कि देश लूटने का अभियान!
ब्राह्मण अर्थात् राष्ट्र प्रेम,
न कि राष्ट्रद्रोह का ‘गेम’!
ब्राह्मण अर्थात् वीतराग,
न कि सत्ता का अहंकार!
ब्राह्मण अर्थात् निष्ठा,
न कि देश से ऊपर अपनी प्रतिष्ठा!
ब्राह्मण अर्थात् सब एक समान,
न कि हर भाषण में जातिवादी गान!
ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मांड,
न कि व्यक्तिवादी भांड!
