*जय-जय-जय सरकार*
सत्ता मद में डूबा हुआ
गौ-हत्या पर क्यों मौन हूँ मैं,
हिन्दू हूँ या कोई विधर्मी,
आखिर बोलो कौन हूँ मै?
गाय कट रही हिन्दू देश में
फिर भी मैं रामधुन गाता हूँ
रत्तीभर भी फर्क ना मुझको
मैं चैन नींद सो पाता हूँ,
देखो, कितना बेशर्म हुआ मैं
कई तर्क-बयान भी गढ़ता हूँ
सत्ता की थूकी चौखट चाटने को
गीता छोड़ कुरान भी पढ़ता हूँ,
मरती है तो मरे, उसके करम से
आखिर मैं क्यों उसकी बात करूं?
मौज करूँ मैं धर्म-नशे की,
क्यों बेकार मुद्दे पर वक्त बर्बाद करूँ?
‘गौ’ मेरा मानबिंदु ही कब थी?
वो बस सत्ता की सीढ़ी थी,
आदर्शों पर मर-मिटने वाली
वो कोई और ही पीढ़ी थी,
मुझे मतलब है, सत्तासुख से
दिनरात उसी जुगत में रहता हूँ
बेमतलब की बातों में ना वक्त गंवाओं,
सब से हर दम यह कहता हूँ
नहीं बची गर गाय तुम्हारी,
आखिर ऐसा क्या बिगड़ जाएगा?
विदेशी नस्ल जगह लेगी इसकी
ज्यादा दूध भी पनप जाएगा
ग्रामीण अर्थव्यवस्था बिगड़ेगी तो,
बाजारवाद तभी तो उभरेगा,
सिंथेटिक दूध पीकर ही तो बच्चा फिर,
कैंसर जैसी बीमारियों से तड़पेगा
बहुत बड़ा षडयंत्र यही है
तुम मूर्ख गधे क्या समझोगे?
हिंदुहित की बात भुलाकर
चुनावी पलड़े में खुद को तौलोगे,
सत्तामद की बात यहीं है
ये ही उसका है चरित्र गहन,
सत्ता बदली तो सब सुधरेगा
टूटा या नही वो मिथ्या वहम?
क्षणिक भाव-उन्माद को छोड़ो अपने,
मुट्ठी भींच चीत्कार उठो,
झूठे धर्म का नशा चाट लो,
और, जय-जय-जय सरकार कहो….
