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India Speak Daily > Blog > राजनीतिक विचारधारा > संघवाद > ये सेंटा विरोध है या हमारा तालिबानीकरण?
संघवाद

ये सेंटा विरोध है या हमारा तालिबानीकरण?

ISD News Network
Last updated: 2025/12/26 at 2:49 PM
By ISD News Network 17 Views 16 Min Read
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Hemant Sharma हमारी परम्परा में चार्वाक ईश्वर के अस्तित्व को ही नहीं मानता था. उसने वर्तमान में जीने और कर्ज लेकर घी पीने का एलान किया था. हमने उसका सिर नहीं कलम किया. बृहस्पति के इस शिष्य को ऋषि का दर्जा दिया. कबीर पत्थर को पूजने (मूर्तिपूजा) के खिलाफ खड्गहस्त थे. हमने उन्हें हिन्दू भक्त माना. तुलसी सगुण उपासक थे. पर उन्होंने लिखा ‘पद बिन चले, सुनै बिन काना’ यानी ईश्वर बिना पैर के चलता और बिना कान के सुनता है. यानी वह निर्गुण है. एक ही बिस्तर पर मेरी सनातनी दादी ‘अतंकाल रघुवरपुर जाई’ गाती थी. तो आर्यसमाजी दादा ‘अतंकाल अकबरपुर (फैजाबाद पैतृक गांव) जाई’ का उद्घोष करते थे. एक मूर्ति पूजा करता दूसरा उसका विरोध. पर दोनों हिन्दू थे. एक ही छत के नीचे कोई राम भक्त कोई शिव भक्त कोई कृष्ण भक्त तो कोई केवल शक्ति की उपासना करता था. पर सब हिन्दू थे. एक दूसरे के परस्पर विरोधी पर कहीं कोई टकराव नहीं. यह है हिन्दू धर्म का मूल. हिन्दू धर्म की इसी संवादप्रियता के कारण ही भारतीय इस्लाम और भारतीय ईसाई यहां वैसे नहीं हैं जैसे अपने मूल रूप में अरब और पश्चिम में हैं. शायद इसीलिए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा कि भारतीय मुसलमान और हिन्दुओं का ‘डीएनए’ एक हैं. इसी सर्वसमावेशी परम्परा का निर्वहन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी कल क्रिसमस के मौक़े पर चर्च जाकर प्रार्थना की.

धर्म तो ‘हिन्दू’ है, जिसमें आस्तिकता की भी जगह है और नास्तिकता की भी जगह है. इसमें मूर्ति के मानने वाले भी हैं. मूर्ति को न मानने वाले भी हैं. द्वैत-अद्वैत और सगुण-निर्गुण को मानने वाले भी हैं. कुछ राम को मानते हैं तो कुछ केवल शिव को. कुछ राधा-कृष्ण के ही अनुयायी है. धर्म के व्यापक फलक में सनातनी भी हिन्दू हैं. आर्य समाजी भी और ब्रह्म समाजी भी. ऐसा विशाल और व्यापक धर्म दुनिया में नहीं है.

तो फिर हिन्दुत्व क्या है? क्या हिन्दुत्व कोई ऐसा दर्शन है जिसमें हिंसा है, टकराव है, आतंक है? क्या बजरंग दल और श्री राम सेना की सोच हिंदुत्व है? क्या हिंदुत्व सिर्फ ‘प्रेमी जोड़ों’ पर हमला है? पहनने ओढ़ने पर सामाजिक पुलिसिंग है? क्या ‘लव जिहाद’ के नाम पर आन्दोलन हिन्दुत्व है? घर वापसी हिन्दुत्व है? वैलेंटाइन-डे का डंडे से मुकाबला हिन्दुत्व है? प्राय: कट्टरता को नव राष्ट्रवादी हिन्दुत्व का लक्षण मान रहे हैं. इस शब्द का लगातार नकारात्मक प्रयोग हो रहा है. एक पवित्र शब्द का अर्थ ऐसे गिरा कि इस शब्द ने अपनी अर्थवत्ता ही खो दी है. हिन्दुत्व के नाम पर एक आक्रामक लठैत समाज खड़ा हो गया, जिसे कोई आलोचना बर्दाश्त नहीं है.

रायपुर, जबलपुर, हिसार, दिल्ली में कुछ जोशीले ‘जिंगल बेल’ से चिढ़ गए. परेशान हो गए कि क्रिसमस कैरोल क्यों गाया जा रहा है. मैं इन हुड़दंगियों को लफंगों की श्रेणी में रखता हूं. ये सिर्फ क्रिसमस ट्री को नहीं तोड़ रहे थे. उस पुल को तोड़ रहे थे, जिसका एक सिरा भारत में क्रिसमस की कैंडल जलाता है तो दूसरा सिरा व्हाइट हाउस में दिवाली के दीए. इन परेशान आत्माओं को ज्ञान नहीं कि क्रिसमस ट्री और सेंटा क्लॉज का धर्म से कोई लेना देना नहीं. ये धार्मिक नहीं सांस्कृतिक परम्परा है. बाइबिल में न क्रिसमस का ज़िक्र है, न सदाबहार के पेड़ का, न बारहसिंगा का, न सेंटा क्लॉज का. श्रीगंगानगर में तो प्रशासन ने एक गजब का आदेश दिया. आदेश था कि बच्चों को सेंटा क्लॉज के कपड़े न पहनाए जाएं. इंदौर में भी कुछ लफंगे सेंटा क्लॉज के पीछे पड़ गए. ये जड़बुद्धि सेंटा क्लॉज को भारत की संस्कृति की दुश्मन मानते हैं. गोल-मटोल, सफेद दाढ़ी वाला सेंटा हमारे बचपन का सुपरहीरो है. बचपन का यकीन था कि सुबह आंख खुलेगी तो मोजे से मैजिक निकलेगा. सेंटा क्लॉज का अस्तित्व ही भरोसे पर टिका है. वो फक्कड़ मिजाजी है, कुछ मांगता नहीं है बस देना चाहता है. यही फक्कड़पना हमारी संत परम्परा का भी मूल है. सेंटा के पीछे डंडा लेकर घूमने वालों को सेंट निकोलस की कहानी सुननी चाहिए. आज के 1700 साल पहले की कहानी. रोमन साम्राज्य में एक जगह थी पटारा जो आज तुर्की में है. एक घोर मुस्लिम देश में. जहां एक बेहद अमीर परिवार में एक बच्चा पैदा हुआ, जिसका नाम रखा गया निकोलस. पटारा में एक महामारी फैली और उसके मां-बाप चल बसे. बस यहीं से निकोलस, सेंट निकोलस के रास्ते पर चल पड़ा. गरीब परिवारों की मदद करने लगा. खिड़की से सोने के सिक्के फेंकने लगा. कोई खर्ज में हो, घर में शादी हो, बीमारी हो हर जरूरतमंद के घर निकोलस के रहस्यमयी सिक्के गिरने लगे. एक बार पकड़ा भी गया तो शर्त रखी कि उसकी मदद गोपनीय ही होगी. यहीं से निकला सेंटा क्लॉज और उसकी सीक्रेट गिफ्टिंग का आइडिया. बरेली में सेंटा क्लॉज की धुनाई करने वालों को इस ‘पक्कल दाढ़ी वाले’ की असली कहानी भी नहीं पता होगी. सेंटा क्लॉज ईसाई धर्म का कोई पैगंबर नहीं है. तुर्की के सेंट निकोलस जब नीदरलैंड्स पहुंचे तो डच लोगों ने उन्हें अपनी भाषा में ‘सिंटरक्लॉज’ कहना शुरु कर दिया. जर्मनी में उन्हें पेल्ज निकेल कहने लगे यानी फर वाले कपड़े पहनने वाला निकोलस. फ्रेंच उन्हें ‘पेरे नोएल’ बुलाने लगे यानी क्रिसमस के पिता. रूस में ‘डेडे मोरेस’ बुलाया जाने लगा जिसका मतलब है बर्फ वाले दादाजी. और 17वीं-18वीं शताब्दी में जब डच अमेरिका में बसे तो ‘सिंटरक्लॉज’ बन गए ‘सेंटा क्लॉज’.

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भारत की गलियों में जो लफंगे सेंटा क्लॉज को दौड़ा रहे हैं, वो सेंटा क्लॉज की असली सूरत भी नहीं जानते होंगे. 1820 के आसपास तक सेंटा क्लॉज दुबले पतले हुआ करते थे. किसी जादूगर या डच सिपाही जैसे दिखते थे. लेकिन फिर क्लेमेंट क्लार्क मूर नाम के एक कवि ने सेंटा क्लॉज के हुलिए की अद्भुत कल्पना रची. रचना का नाम था ‘ए विजिट फ्राम सेंट निकोलस’. इसी रचना के बाद दुबले पतले सेंटा गोलमटोल हो गए, उन्हें बारहसिंहा की सवारी मिल गई. लेकिन कपड़े और घर मिला 1860 में, जब थॉमस नास्ट नाम के एक कलाकार ने सेंटा क्लॉज की पूरी जिंदगी का स्केच बना दिया. लबादेदार कपड़े बना दिए और दुनिया को बताया कि सेंटा क्लॉज नॉर्थ पोल यानी उत्तरी ध्रुव में अपनी पत्नी यानी मिसेज क्लॉज के साथ रहते हैं. उनका छोटा सा कारखाना है जहां बौने काम करते हैं. और उसी कारखाने में बच्चों के लिए खिलौने बनाए जाते हैं.

सेंटा के पीछे क्या है? यह जिज्ञासा लगातार बनी रही. इसलिए मौका पाते ही मैं फिनलैंड गया. सेंटा का गॉंव वही माना जाता है. मौजूदा सेंटा क्लाज वहीं रहते है. हेलसिंकी के उपर आर्टिक सर्किल के पास, जिसके उस पार सिर्फ उत्तरी ध्रुव है. प्राइमरी की किताबों मे पढ़ा था, एक्सिमो बालक, स्लेज गाड़ी, रेंडियर,इग्लू, हस्की कुत्ते सब वहां मिले.लगा सपनो के देश में आ गया हूँ. इस पूरे देश की आबादी सिर्फ पचास लाख. उसके चार गुना रेंडियर यानी नीलगाय और बारहसिंगा का मिलाजुला रूप. वही चौपाया इस अंनत बर्फ में लोगों का भोजन और परिवहन का साधन है. सूरज रात के एक बजे तक आकाश में टंगा रहता है और फिर तडके तीन बजे उग आता है. यानी रात सिर्फ दो घंटे की होती थी. साथ ले गए सारे गर्म कपड़े कम पड़ने लगे थे। तापमान माईनस पन्द्रह डिग्री. हम सरकार के मेहमान थे। रहने घूमने की चौचक व्यवस्था थी। भोजन में रेंडियर और पीने को शराब यही वहॉं जीने का तरीका था. हम ठहरे बनारसी.गंगाजल संस्कृति के. तो गर्म पानी और सब्जियों से अपना गुजारा हुआ. आज कल संपादक जी यानी पंडित पारितोष चतुर्वेदी Paritosh Chaturvediवहीं गए हैं. किसके साथ यह उन्होंने बताया नहीं.

वहॉं जाकर इस बात पर गुस्सा आता है कि पूरी दुनिया में खाने पीने का सामान बांटने वाले सेंटा के देश में, खाने पीने की इतनी सांसत. ऐसी किल्लत! हम आर्टिक सर्किल पर थे. यहॉं एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी को बर्फ जोड़ती है. बर्फ के नीचे धंसे पेड़ों की फुनगियां तक सफेद थी. इसी माहौल में मेजबान ने हमें स्लेज गाड़ी पर बैठा दिया जिसमें पांच हस्की कुत्ते जुते हुए थे. मेरे गाड़ी पर बैठते ही वे हवा से बात करने लगे. शरीर में फटने वाली सारी चीजें फटने लगी.लगा अब सेंटर से मुलाकात नहीं हो पायेगी. मैंने इशारे से किसी तरह गाड़ी रूकवायी और कान पकड़ा की अब नहीं बैठूंगा. स्थानीय गाड़ी वाले ने कहा, थोड़ी गर्मी है इसलिए कुत्ते हांफ रहे हैं. मैंने कहा, भाई साहब यह हाड़तोड ठंडक आपको गर्मी लग रही है.उसने कहा ये कुत्ते माईनस तीस में रहते है.अभी माईनस पंद्रह है इसलिए इनके लिए गर्मी है.आप बैठिए हम आपको इसी गाड़ी से रोवानिएमी ले चलेंगे. मैंने कहा, इस गाड़ी पर नहीं जाऊंगा पर्यटन जाय भाड में.

फिनलैंड में रोवानिएमी में सेंटा का स्टेट है. वे यही रहते हैं. बिल्कुल राजा साहब सिंगरामऊ या राजा साहब औसानगंज की तरह. उनका अपना छोटा सा पैलेस है. अपना पोस्ट ऑफिस है. अपना जहाज है. पूरा सचिवालय है. सैकड़ों कर्मचारी है. लाखों खत दुनिया भर से बच्चों के आते हैं. हमारे शंकराचार्य की तरह उन्हें भी नामित किया जाता है. एक के मरने के बाद दूसरा सेंटा नामित होता है. हर साल मेरे जैसे लाखों लोग उनका पैलेस, पोस्टऑफिस और स्टेट देखने आते हैं. मैं वहां से सेंटा उनकी बीबी और सचिव की मूर्तियां भी लाया था. साढ़े छ फीटके सेंटा से मिलकर मैं चमत्कृत था. बचपन की मुराद पूरी हुई. उन्होंने बताया कि वे यहां कुछ महीने रहते है. बाकी समय दुनिया भर में उनके कार्यक्रम लगे होते हैं. फिनलैंड में स्थित सेंटा के स्टेट रोवानिएमी में कड़ाके की ठंड पड़ती है. 6 महीने दिन और 6 महीने रातवाला यह देश 12 महीने बर्फ की चादर से ढका रहता है.सेंटा के इस गांव की खासियत है कि यहां घुसते ही लकड़ी से बनी झोपडि़यां नजर आती हैं. यहां का हर एक नजारा बचपन में सुनी कहानियों को हकीकत में होने का अहसास कराता है.

इस गांव में एक ऐसी हट है जिसमें सिर्फ सेंटा और उनकी पत्नी रहते हैं. लाल और सफेद रंग से सजी सेंटा की झोपड़ी में खास चीज दूर से ही दिखाई देती है और वो हैं नन्हें बच्चों के ढ़ेर सारे खत. इन खतों को सेंटा और उनकी वाइफ बहुत संभाल कर रखते हैं. सेंटा की हट में एक हिस्सा ऐसा है जहां से सेंटा क्लाज लोगों से मिलता है. जिसे सेंटा का ऑफिस कहा जाता है. खास बात यह है कि सैंटाविलेज घूमने आए लोग यहां सेंटा से मिलने के अलावा उससे बातें और तस्वीर भी खिंचवा सकते हैं.यही मेरी सेंटा से मुलाकात हुई थी.

हालांकि सेंटा हट में घुसने की तो आपको कोई कीमत नहीं चुकानी लेकिन वहां खिंची फोटो सेंटा के पोस्ट ऑफिस से कुछ पैसे देकर खरीदनी पड़ती है यहीं सेंटा आईस पार्क भी है. सेंटा का यह पार्क उनकी हट से कुछ ही दूरी पर बना हुआ है. इस पार्क में एंट्री करने के लिए आपको थोड़ी सी कीमत एंट्री फीस के रूप में चुकानी पड़ती है.

दो रोज से देश में कई जगहों से सेंटा क्लॉज पर हमले की खबर आई. कुछ मंद बुद्धि प्रौढ़ों ने इस देश में क्रिसमस मनाने और उसकी छुट्टियों का भी विरोध किया. मेरे एक मित्र ने तो सेंटा क्लॉज से बच्चों को दूर रखने की अपील कर दी. मुझे अपने पर क्षोभ हो रहा है कि इतने सालों तक मित्रवर हमारे साथ रहे. मैं उनके भीतर नफ़रत के इस ज्वालामुखी को देख नहीं पाया. हम कहॉं पहुँच गए हैं. जिनका हिंदुत्व ‘सैंटा क्लॉज’ से भी खतरे में आ जाता है उन बेचारों को इलाज की जरूरत है. कैसा रहा होगा ऐसे लोगों का बचपन? कैसे भर गयी होगी मन में इतनी नफ़रत?

ये हमारी बहुलतावादी संस्कृति के तालिबानीकरण में लगे हैं. ऐसे लोग मिलें तो ग़ुस्सा मत कीजिए इनसे अच्छे से बात करिए, तोहफे दीजिए, इन्हें सभ्य समाज की झलक देखने और समझाने की जरूरत है. सेंटा सर्वव्यापी हैं. देश, काल, धर्म, मजहब, संप्रदाय, विचारधारा के दायरे से परे. वे जिंदगी के सबसे मासूम वक्त के हमसाए हैं. बच्चो की उम्मीदों, आकांक्षाओं, सपनों की प्रतिध्वनि बनकर. वे साल में एक दिन आते हैं मगर साल भर उनके आने का इंतज़ार होता है. सेंटा यूं तो सर्दियों के मौसम में आते हैं मगर वे अपने आप में एक मौसम की तरह होते हैं. मासूमियत के घरौंदे खिलखिलाते हैं. सपनों के इंद्रधनुष तन जाते हैं. समूचे घर को इस अनूठे मेहमान की आहट का इंतजार रहता है. कल भी कुछ दोस्त, मित्र हमारे परिवार के साथ शाम को जुटे. बच्चों ने गिफ्ट लिए. खाना, खेलना और बातें करना. ईशानी के दोनों बच्चे सेंटा ड्रेस में अपना पहला क्रिसमस मना रहे थे. इस पूरे माहौल में प्रेम था, बचपन था, खुशी थी, उत्साह और ऊर्जा थी, उत्सव और आनंद था. इसे विकृत, घृणित और विकारित कैसे समझा जा सकता है. ऐसी सोच रखने वालों को ईश्वर सदबुद्धि दे, यही कामना है.

नए वर्ष की मंगलकामनाओं के साथ.

साभार: फेसबुक पेज से।

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