श्वेता पुरोहित। भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के तहत 1 अप्रैल 2025 को अमेरिका स्थित डेटा स्टोरेज और प्रबंधन कंपनी Iron Mountain Inc. ने भारतीय डेटा सेंटर ऑपरेटर Web Werks का पूर्ण स्वामित्व हासिल कर लिया है। हालांकि यह अधिग्रहण आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन कंपनी के शीर्ष नेतृत्व में अमेरिका और ब्रिटेन के रक्षा बलों से जुड़े अधिकारियों की मौजूदगी के चलते डेटा संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं।


अब Iron Mountain के पास भारत में मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और नोएडा में स्थित छह डेटा सेंटर्स का पूर्ण नियंत्रण है। इसके अलावा, कंपनी मुंबई, चेन्नई और नोएडा में तीन नए डेटा सेंटर कैंपस विकसित कर रही है, जिनकी संभावित कुल क्षमता 156 मेगावाट (MW) बताई जा रही है। यह अधिग्रहण भारत सरकार द्वारा जनवरी 2024 में किए गए 22,000 करोड़ रुपये के निवेश समझौतों (MoUs) के हिस्से के रूप में सामने आया है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े रणनीतिक अधिकारी
Iron Mountain के दो शीर्ष अधिकारी—जिन्हें कंपनी के डेटा सुरक्षा और वैश्विक संचालन में निर्णायक भूमिका दी गई है—पश्चिमी रक्षा प्रतिष्ठानों से आते हैं:
रेमंड सी. फॉक्स, कंपनी के एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और चीफ रिस्क ऑफिसर, संयुक्त राज्य अमेरिका मरीन कॉर्प्स के सेवानिवृत्त मेजर जनरल हैं। वे Iron Mountain की वैश्विक जोखिम प्रबंधन रणनीति और सुरक्षा नीतियों की निगरानी करते हैं। उनका सैन्य अनुभव ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म, इराक और अफगानिस्तान युद्ध अभियानों से जुड़ा रहा है।

गैरी एटकनहेड, एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और जनरल मैनेजर, डेटा सेंटर्स, पूर्व में ब्रिटेन के रक्षा विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला (Dstl) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहे हैं। वे ब्रिटेन में Novichok ज़हरकांड, COVID-19 प्रतिक्रिया, और सैन्य प्रौद्योगिकी रणनीतियों के प्रमुख योजनाकारों में शामिल रहे हैं।

इन दोनों अधिकारियों की रणनीतिक भूमिका और उनके सैन्य पृष्ठभूमि के कारण भारत के संवेदनशील डेटा की गोपनीयता और नियंत्रण पर विदेशी प्रभाव का खतरा वास्तविक है।
कौन चला रहा है भारत का क्लाउड?

Iron Mountain भारत में कोलोकेशन, हाइब्रिड क्लाउड, बैकअप, डिजास्टर रिकवरी और इंटरकनेक्शन सेवाएं प्रदान करता है। इन सेवाओं का उपयोग भारतीय सरकारी एजेंसियों, निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स द्वारा संवेदनशील डेटा को संग्रहित और प्रबंधित करने के लिए किया जाता है।


विशेषज्ञों का कहना है कि इस अधिग्रहण के बाद, डेटा निगरानी, पश्चिमी एजेंसियों के लिए संभावित एक्सेस, और भूराजनीतिक दबाव जैसे जोखिम बढ़ गए हैं।
यह केवल एक व्यावसायिक सौदा नहीं है। जब कंपनी के शीर्ष अधिकारी अमेरिका और ब्रिटेन की रक्षा सेवाओं से आते हैं, तो हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि क्या भारत का डेटा वास्तव में भारत के नियंत्रण में है?”
आगे की राह:
रणनीतिक स्तर पर, अब भारत में विदेशी कंपनियों द्वारा संचालित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कड़े नियामक ढांचे की मांग होनी चाहिए।
प्रश्न यह है:
क्या भारत के डिजिटल भविष्य की कमान उन लोगों के हाथों में होनी चाहिए, जिनका अतीत विदेशी सैन्य एजेंसियों से जुड़ा रहा है?
