संदीप देव, नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र की संप्रभुता पर मंडराते सबसे बड़े खतरे की कड़ियां अब एक-एक कर जुड़ने लगी हैं। फरवरी 2025 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय चुनावों में वोटर टर्नआउट के नाम पर दिए जा रहे 21 मिलियन डॉलर (लगभग 175 करोड़ रुपये) के फंड को रद्द करने का ऐलान किया था, तब इसे केवल एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलचल माना गया था। उस वक्त सरकारी इकोसिस्टम ने बड़ी चालाकी से झूठ फैलाया कि “यह फंड भारत के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश के लिए था।” लेकिन आज, जब निर्वाचन सदन के भीतर से ‘अमेरिका से आयातित लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी सॉफ्टवेयर’, आईटी महानिदेशक डॉ. सीमा खन्ना की भूमिका और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दो साथी आयुक्तों की 14 आपत्तियों का दस्तावेजी विस्फोट हुआ है, तो यह साफ हो चुका है कि यह कोई प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय जनमत के साथ किया गया सुनियोजित ‘साइबर और वित्तीय तख्तापलट’ था।
‘इंडिया स्पीक्स डेली’ की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में पढ़िए—कैसे विदेशी धन से लेकर विदेशी सॉफ्टवेयर के जरिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के गर्भगृह में सेंध लगाई गई।

एसीवायपीएल के गुर्गों ने सभी संवैधानिक संस्थाओं को भ्रष्ट और नष्ट करने में कोई कमी नहीं छोड़ी।