प्रयागराज (इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो): ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी प्रत्यक चैतन्य मुकुंदानंद गिरि को पॉक्सो के झूठे मुकदमे में फंसाने की रची गई कथित साजिश अब बेनकाब होने की कगार पर है। प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत ने ऐतिहासिक रुख अपनाते हुए झूँसी पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मामले में आशुतोष ब्रह्मचारी, उसके सहयोगियों, अज्ञात पुलिसकर्मियों और चैनल ‘आजतक’ के मालिकों व मीडियाकर्मियों की भूमिका की गहन व निष्पक्ष जांच की जाए। अदालत ने साफ कर दिया है कि विवेचना एकतरफा नहीं हो सकती और यदि जांच में इन लोगों का आपराधिक कृत्य या षड्यंत्र सामने आता है, तो उनके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल कर विधि सम्मत अग्रिम कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) विनोद कुमार चौरसिया ने स्वामी प्रत्यक चैतन्य मुकुंदानंद गिरि की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत दाखिल आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने मामले की पूर्व दर्ज एफआईआर संख्या 58/2026 की विवेचना का दायरा बढ़ाते हुए आवेदक द्वारा पेश किए गए तमाम दस्तावेजी, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल साक्ष्यों को जांच का अनिवार्य हिस्सा बनाने का आदेश दिया है।
एफआईआर 58/2026 में ही जांच के दायरे में आए आशुतोष ब्रह्मचारी व आजतक
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्वीकार किया कि निष्पक्ष जांच आपराधिक न्याय व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है। पॉक्सो कोर्ट ने विवेचना अधिकारी (IO) को आदेश दिया है कि:
- दैनिक भास्कर का साक्षात्कार और डिजिटल साक्ष्य: आवेदक द्वारा प्रस्तुत दैनिक भास्कर के उस वीडियो साक्षात्कार को रिकॉर्ड पर लेकर जांचा जाए, जिसमें कथित पीड़ित नाबालिग और उसके परिजनों ने स्वीकार किया था कि उन पर दबाव डालकर कोरे कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे और उनका शंकराचार्य जी से कोई सीधा वास्ता नहीं था।
- आजतक के प्रसारण की जांच: चैनल ‘आजतक’ द्वारा 26 फरवरी 2026 को नाबालिग की पहचान उजागर करने वाले प्रसारण, उसकी मूल और अनएडिटेड फुटेज, मेटाडेटा तथा प्रसारण की अनुमति देने वाले मीडियाकर्मियों की भूमिका की विस्तृत जांच हो।
- फॉरेंसिक व तकनीकी पड़ताल: आशुतोष ब्रह्मचारी के सोशल मीडिया बयानों, 10 जून 2026 के कथित इंटरव्यू, वॉट्सऐप चैट्स, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स और मिटाए गए डिजिटल साक्ष्यों का विधिवत फॉरेंसिक विश्लेषण किया जाए।
- आरोपी पक्ष के साक्ष्यों की अनदेखी पर रोक: सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरों का हवाला देते हुए अदालत ने दो-टूक कहा कि किसी साक्ष्य को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह आरोपी पक्ष ने दिया है; विवेचक हर उस तथ्य की जांच के लिए बाध्य है जो बेगुनाही को साबित करता हो या साक्ष्य गढ़ने (fabrication of evidence) की ओर इशारा करता हो।
पृथक एफआईआर की जगह व्यापक जांच का फॉर्मूला
अदालत ने तकनीकी आधार पर अलग से दूसरी एफआईआर दर्ज करने के बजाय पूर्व दर्ज एफआईआर 58/2026 में ही इस पूरी साजिश की जांच को समाहित कर दिया है। कोर्ट का मानना था कि चूंकि मुख्य मुकदमे की विवेचना अभी जारी है, इसलिए अलग एफआईआर करने के बजाय उसी मुकदमे में इन सभी तथ्यों, साक्ष्यों और कथित षड्यंत्रकारियों की भूमिका को शामिल कर व्यापक (comprehensive) जांच की जानी चाहिए। यदि जांच में आशुतोष ब्रह्मचारी व अन्य सहयोगियों द्वारा गढ़े गए झूठे साक्ष्य, अपहरण या दबाव की पुष्टि होती है, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई का रास्ता पूरी तरह खुला रहेगा।
परिवाद संख्या 125/2026 पर नहीं पड़ेगा कोई असर
विशेष अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि स्वामी प्रत्यक चैतन्य मुकुंदानंद गिरि द्वारा पॉक्सो एक्ट की धारा 22 (झूठी सूचना/केस दर्ज कराने के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई) के तहत दाखिल परिवाद संख्या 125/2026 इस पुलिस विवेचना से पूरी तरह अप्रभावित रहेगा। उस परिवाद का न्यायिक विचारण पॉक्सो अदालत द्वारा स्वतंत्र रूप से पूर्ववत जारी रहेगा।
संपादकीय टिप्पणी: झूठे आरोपों की आड़ में सनातन परंपरा पर चोट की कोशिश?
इंडियास्पीकडेली आरंभ से ही इस पूरे प्रकरण में साक्ष्यों और तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल करता रहा है। पॉक्सो कानून जैसे गंभीर प्रावधानों का इस्तेमाल जब किसी संत परंपरा या प्रतिष्ठित पीठ को लांछित करने के लिए ‘हथियार’ के रूप में किया जाने लगे, तो न्यायपालिका की यह सक्रियता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अदालत के इस आदेश ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि केवल मीडिया ट्रायल चलाकर या झूठे शिकायती पत्र तैयार करवाकर कानून से नहीं बचा जा सकता। अब जांच की आंच सीधे उन षड्यंत्रकारियों तक पहुंचेगी, जिन्होंने कैमरे और माइक की आड़ में इस पूरे षड्यंत्र को हवा दी थी।
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बहुत बढ़िया, षड्यंत्र सामने आना चाहिए और षड्यंत्रकारियों को दण्ड मिलना चाहिए।🙏🚩