विजय सिंह ठकुराय। बैंकों और कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ, देश का पूंजीपति वर्ग उनसे नाराज हुआ। इंदिरा ने “प्रिवीपर्स” नामक राजाओं का गुजारा भत्ता खत्म कर दिया, तमाम रजवाड़े इंदिरा से नाराज हो गए। फॉरेन एक्सचेंज बिल ला कर उन्होंने विदेशी कंपनियों को भी नाराज कर दिया। 1971 के बाद अमेरिका तो उनसे बेहद नाराज चल ही रहा था। होना भी था, इंदिरा भारत की इकलौती ऐसी पीएम हैं, जिन्होंने सुपरपॉवर अमेरिका को “तू कौन है बे” बोलकर पाकिस्तान के टुकड़े किये और एक नए मुल्क को जन्म दिया।
1975 आते-आते इंदिरा विरोध के नाम पर देश को अराजकता में झोंका जा चुका था। जगह-जगह धरने और आंदोलन हो रहे थे, काम ठप्प, रेलवे की पटरियां उखाड़ी जा रही थीं। और तो और, तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण तक को बम धमाके में उड़ा दिया गया था।
इसी साल 1975 में 12 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा की सदस्यता को रद्द कर उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटने को कहा। कारण – एक सरकारी अफसर रिटायरमेंट से दो हफ्ते पहले इंदिरा का चुनाव प्रचार करते पकड़ा गया था। सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का मामला था। तब कोर्ट का इकबाल ही अलग था, देश का प्रधानमंत्री तक अदालत में तलब कर लिया जाता था। आज तो चुनाव से पहले दस हजार की घूस देकर वोट खरीद लिए जाते हैं, मजाल जो कोई चूं कर सके।
बहरहाल, जो इस फैसले का जिक्र कर इंदिरा को आपातकाल के लिए कोसते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि 12 दिन बाद, यानी 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर स्टे देकर इंदिरा को पीएम पद पर बने रहने की अनुमति दे दी थी। था तो ये भी कोर्ट का फैसला। इसका आदर नहीं किया जाना चाहिए क्या?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, जेपी नारायण नारे लगा रहे थे कि “जिंदा कौमें 5 साल इंतजार नहीं करतीं”
देश के अराजक हालात तो मैं आपको ऊपर बता ही चुका हूँ। मामला तब बिगड़ा, जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निराश जेपी ने देश की सेना और पुलिस से विद्रोह का आव्हान कर डाला। यह खुले तौर पर राजद्रोह था, जिसमें इंदिरा की हत्या का मंसूबा निहित था।
परिणाम – देश ने आपातकाल देखा।
आपातकाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। कोई उसका दोष इंदिरा को देना चाहे तो कोई आपत्ति नहीं। पर आपको इतना तो पता होना चाहिए कि आपातकाल का कारण इंदिरा की सदस्यता को बचाना नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अराजकता और तख्तापलट संस्कृति से बचाये रखना था।
इंदिरा को तानाशाह ही बने रहना होता तो 21 महीने बाद वो खुद आपातकाल खत्म क्यों करतीं? इंदिरा ने खुद इमरजेंसी हटाई, चुनाव कराए, चुनाव हारी, जेल गयी, तमाम जांचों और भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना किया।
नतीजा? सिर्फ दो साल बाद प्रचंड बहुमत से वापस देश की प्रधानमंत्री बनीं।
आप चाहें इंदिरा से सहमत हो, या नहीं पर इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि डंके की चोट पर कठोर फैसले लेने का जिगरा अगर इस देश के किसी नेता में था – तो वो इंदिरा थीं।
किसे पता था कि इस मासूम सी दिखने वाली बच्ची का नाम एक दिन भारत के इतिहास में “Iron Lady of India” के तौर पर दर्ज होगा।
