पायलट एंड क्रू रेस्ट पालिसी को लागू करने में हुई मिसप्लानिंग के कारण इन दिनों इंडिगो एयरलाइन ठप्प हुई, एविएशन सेक्टर प्रभावित हुआ। एयरपोर्ट पर यात्रियों की लंबी कतार लग गयी। जनता-जनार्दन परेशान हुई।
इंडिगो की विफलता के मूल में सरकार का “मोनोपॉली मॉडल” है, जिसके तहत हर क्षेत्र में कुछ चुनिंदा कंपनियों को “फ़ेवरिटज्म” के कारण लाभ पहुंचाया जाता है, ताकि हर क्षेत्र में कुछ चुनिंदा खिलाड़ी ही दौड़ में सबसे आगे रहें। गौरतलब है कि इंडिगो एकमात्र एयरलाइन है, जो 56 करोड़ का इलेक्टोरल बांड खरीद कर राजनीतिक दलों को चन्दा देती है, जिसमें भाजपा का बड़ा हिस्सा है।
एहसान चुकाने के लिए सरकार लॉकडाउन के दौरान कैपिटल यूटिलाइजेशन पर लगी 80% की रोक हटा लेती है, जिससे इंडिगो को डिमांड के अनुसार फ्लाइट की संख्या बढाने की अनुमति मिल जाती है और कोडि’व के दौर में जब सब एयरलाइन्स घाटे में चल रही थीं, तो इंडिगो 1000 करोड़ मुनाफा कमा जाती है।
इस तरह कभी 100% FDI की इजाजत देकर तो कभी पालिसी रिवीजन के जरिये सरकार इस एयरलाइन को तमाम बार अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाती है। परिणामस्वरूप आज एविएशन सेक्टर में 70 परसेंट कब्जा एक सिंगल एयरलाइन का है, बाकी जो इलेक्टोरल चंदा नहीं दे रही हैं, वे सब एयरलाइन्स दिवालिया होने के कगार पर हैं।
सोचिए, अगर एविएशन सेक्टर में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती और मार्किट शेयर पर एक से ज्यादा कंपनियों का बराबर हिस्सा होता तो क्या यह यात्री संकट पैदा होता? क्या सरकार को अपनी ही गाइडलाइन वापस लेकर थूक के चाटना पड़ता? क्या मौके का फायदा उठा कर दूसरी एयरलाइन टिकट का भाव दस गुना बढ़ातीं? क्या यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ता? इस पूरे संकट की जड़ में सिर्फ और सिर्फ सरकार का “मोनोपॉली मॉडल” है।
वैसे मैं आपको बता दूं कि आज से एक साल पहले ही राहुल गांधी नामक व्यक्ति एक आर्टिकल के जरिये और कई पब्लिक सेमिनार में इस “मोनोपॉली मॉडल” पर बात करके इस खतरे की आहट की आशंका पहले ही जता दी थी। नोटबन्दी, जीएसटी, चीनी अतिक्रमण और दर्जनों अन्य विषयों की तरह इस विषय पर भी राहुल गांधी की भविष्यवाणी सही साबित हुई। जानते हैं क्यों?
वो इसलिए क्योंकि राहुल गांधी ने जिस विषय पर कैंब्रिज से डॉक्टरेट की है, उस विषय को “डेवलपमेंटल इकोनॉमिक्स” कहते हैं। किसी भी बिज़नेस या इकनोमिक मॉडल की ग्रास-रुट समझ अगर वर्तमान में किसी राजनेता को है, तो वह राहुल गांधी है।
आप उसे “पप्पू” प्रचारित करते रहिए, आपकी मजबूरी है। पर यकीन मानिए कि आज देश के हर पढ़े-लिखे आदमी को मालूम है कि असली पप्पू कौन है।
सच तो यह है कि यह देश पढ़े-लिखे नेताओं को डिजर्व ही नहीं करता।
