#संदीपदेव। भारत-अमेरिका के बीच हुए ‘ट्रेड डील’ पर दोनों देशों का औपचारिक प्रेस रिलीज सामने आ गया है। मेरी जो आशंका थी और जिसे एक लेख के माध्यम से मैंने व्यक्त किया था, वह सही साबित हुआ!
प्रेस रिलीज को देखकर यही लगता है कि भारत सरकार ने समझौता नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक सरेंडर’ किया है। कुछ बिंदुओं से इसे समझते हैं!

जब हम वैश्विक कूटनीति की बिसात पर इस ‘डील’ को देखते हैं, तो EpsteinFiles का संदर्भ और टैरिफ का यह भारी अंतर (अमेरिकी वस्तुओं पर 0% VS भारतीय वस्तुओं पर 18%) कई असहज सवाल खड़े करता है!
इन तथ्यों और संभावनाओं पर मेरा आलोचनात्मक विश्लेषण निम्नलिखित है:-
1. एप्सटीन फाइल और ‘डील’ का ‘समय’ (Timing): 30-31 जनवरी 2026 को जारी हुई एप्सटीन फाइल्स में 2017 की इजरायल यात्रा के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी का उल्लेख आना और ठीक उसके तुरंत बाद (फरवरी के पहले सप्ताह में) इस व्यापार सौदे का होना, कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है।
तर्क: कूटनीति में ‘ब्लैकमेल’ या ‘दबाव’ (Leverage) एक अदृश्य हथियार होता है। यदि फाइल्स में ऐसा कुछ है जिसे अमेरिका ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में उपयोग कर सकता है, तो भारत का व्यापारिक मोर्चे पर रक्षात्मक या आत्मसमर्पण करना स्वाभाविक है, जो इस ‘डील’ से लग रहा है!
विमर्श: क्या यह समझौता एक ‘पॉलिटिकल शील्ड’ की तरह काम कर रहा है? भारत ने रूसी तेल छोड़ने और $500 बिलियन की अमेरिकी उत्पादों की खरीद की जो प्रतिबद्धता जताई है, वह किसी भी सामान्य व्यापारिक बातचीत से कहीं अधिक बड़ी और त्वरित है। यह भारत की संप्रभुता पर आघात लगाने वाला है।
2. टैरिफ का गणित: 0% बनाम 18%: भारत जहां अमेरिकी उत्पादों (विशेषकर औद्योगिक माल) पर टैरिफ ‘जीरो’ करने को स्वीकार कर चुका है, वहीं अमेरिका भारतीय उत्पादों पर 18% टैरिफ लगा रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ: वाजपेयी और मनमोहन सिंह के समय में भारत को GSP (Generalized System of Preferences) के तहत कई लाभ मिलते थे, जिससे प्रभावी टैरिफ बहुत कम थे। ट्रंप प्रशासन ने उसे समाप्त किया और अब 18% को ‘राहत’ के रूप में पेश किया जा रहा है। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि वाजपेयी दौर में जब 3% टैक्स था थो आज 18% क्यों? और इस पर संसद में माला पहनने-पहनाने का इवेंट क्यों?
आलोचनात्मक विश्लेषण: यह ‘Reciprocal’ (पारस्परिक) होने का दावा करता है, लेकिन वास्तव में यह असमान है। 18% का टैरिफ भारतीय कपड़ा, चमड़ा और रत्न उद्योग के लिए अभी भी एक बड़ी बाधा है।
इसे ‘जीत’ केवल इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि कुछ समय पहले यह 50% (रूसी तेल खरीद पर जुर्माना सहित टैरिफ) तक पहुँच गया था। यह वैसी ही स्थिति है जैसे किसी का गला दबाकर उसे थोड़ा ढीला छोड़ दिया जाए और उसे ‘साँस लेने की आजादी’ का नाम दे दिया जाए!
3. ‘सरेंडर’ के तर्क और व्यापारिक विवशता:-
जब हम इस समझौते की शर्तों को देखते हैं, तो ‘सरेंडर’ शब्द की प्रतीति निम्नलिखित कारणों से स्पष्ट होती है:-
* ऊर्जा गुलामी: रूस से सस्ता तेल छोड़कर अमेरिका से महंगा ऊर्जा आयात करने की शर्त भारत की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक बोझ डालेगी।
* कृषि क्षेत्र का खुलना: पहली बार भारतीय कृषि बाजार को इस तरह खोलना, भारत की दशकों पुरानी नीति के विपरीत है। अभी सोयाबीन आदि सहित कुछ फसलों के लिए इसे खोला गया और पशु चारे के आयात को स्वीकार कर डेरी उद्योग पर भी खतरा पैदा कर दिया गया है! इस पर एक विस्तृत पोस्ट बाद में देता हूं।
* अदृश्य शर्तें: $500 बिलियन के अमेरिकी उत्पादों की खरीद की गारंटी देना एक संप्रभु राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी प्रतिबद्धता है, जो आमतौर पर केवल युद्ध या अत्यंत गंभीर संकट के समय दी जाती है।
निष्कर्ष: यदि यह सौदा वास्तव में एप्सटीन फाइल जैसी किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक कमजोरी को दबाने के लिए किया गया है, तो यह भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है।
एक तरफ हम ‘विश्वगुरु’ बनने की बात करते हैं, और दूसरी तरफ व्यापारिक नियमों में 18% बनाम 0% का अंतर स्वीकार करते हैं—यह विरोधाभास दर्शाता है कि पर्दे के पीछे की शक्ति संतुलन (Power Dynamics) भारत के पक्ष में नहीं है।
यह ‘Surrender’ नहीं तो कम से कम ‘Tactical Capitulation’ (रणनीतिक आत्मसमर्पण) अवश्य प्रतीत होता है।
और हां, इस औपचारिक सरकारी प्रेस रिलीज से साबित हुआ कि ‘डील’ वाले दिन अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पोस्ट तथ्यात्मक था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पोस्ट भारत की जनता से जानकारी को छुपाने और भ्रम पैदा करने वाला! और हां, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भी झूठ बोल रहे थे मीडिया में कि कृषि श्रेत्र को नहीं खोला गया है। आज सरकारी प्रेस रिलीज ने ही सरकार के झूठ पर हथौड़ा मार दिया है!
धन्यवाद।
