श्वेता पुरोहित। भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण की इस पावन भूमि में आजकल सन्त रूप में अनेक ढोंगी असन्त हमारे समाज का शोषण करने में लगे हैं। हममें से ही अनेक स्त्री-पुरुष अपने भोले-भाले स्वभाव के कारण उनके कुचक्र में फँसकर अपना तन-मन-धन सब कुछ गवाँ बैठते हैं। झूठी आस्था और अज्ञान के कारण अपनी सारी पूँजी लुटाकर उनके वशीभूत हो जाते हैं। पाप और वासना में डूबे ऐसे तथाकथित सन्तों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है।
आजकल इन तथाकथित साधुओं के प्रपंचों में फँसकर हम सन्त और शैतान की पहचान नहीं कर पाते। इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करते हुए सन्त तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में लिखा है-
साधु चरित सुभ चरित कपासू ।
निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।
बंदनीय जेहिं जग जस पावा ॥
सन्तों का निर्मल चरित्र तथा शीतल स्वभाव कपास की भाँति स्वच्छ, निर्मल, उज्ज्वल और अनेकों गुण अपने आँचल में समेटे, रसरहित फल-जैसा होता है। जैसे कपास अनेक क्रियाओं द्वारा भाँति-भाँति के दुःख सहकर वस्त्ररूप में मर्यादा और सुख का आधार बनता है, उसी प्रकार सन्तों के समस्त कर्म जीवमात्र के लिये स्वार्थरहित हितकारक होते हैं। ऐसे सन्त निर्विकाररूप से लोक और परलोक सुधारने में सहायक बनकर संसार में वन्दनीय हो जाते हैं।
मानस के अरण्यकाण्ड में महर्षि नारद ने भगवान् श्रीराम से सन्तों के लक्षण बताने की प्रार्थना की है –
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा।
कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥
नारदजी के मुख से ऐसे प्रिय वचन सुनकर प्रभु ने कहा- हे ऋषिवर ! सुनिये, मैं आपको सन्तों के गुण कहता हूँ-
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ।
जिन्ह ते मैं उन्ह के बस रहऊँ ॥
षट बिकार जित अनघ अकामा।
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥
अमित बोध अनीह मितभोगी ।
सत्यसार कबि कोबिद जोगी ।
सावधान मानद मदहीना।
धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥
सन्तजन काम, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या-जैसे विकारों को अपने से दूर रखते हैं, वे कभी भी इनके वशीभूत नहीं होते। ये निष्पाप, निष्काम, निश्छल चित्तवाले तथा अन्तर और बाह्य दोनों में शुद्ध और सुख के धाम होते हैं।
ऐसे सन्तों का ज्ञान असीमित होता है, वे बड़े ही सचेत, सबका सम्मान करने वाले और स्वयं अहंकारहीन होते हैं।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं ।
पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती।
सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती ॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा।
गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया।
मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥
सच्चे सन्त स्वभाव से अपनी प्रशंसा सुनकर अप्रसन्न होते हैं और अन्यों की प्रशंसा और उनके गुणों की चर्चा सुनकर हर्षित होते हैं। वे राग-द्वेष से दूर, तीनों तापों से मुक्त और नीति में सदैव रत रहते हैं। स्वभाव से वे सरल और प्राणी मात्र में प्रीति रखने वाले होते हैं। जप-तप में लीन सन्त इन्द्रियों का दमन करनेवाले और ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखने वाले होते हैं। वे श्रद्धा, क्षमा, मैत्री और दया से सम्पन्न होते हैं।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना।
बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ।
भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥
हे ऋषिवर ! सन्त वैराग्य, ज्ञान, नम्रता और विज्ञान के साक्षात् स्वरूप होते हैं। उन्हें समस्त शास्त्रों, वेदों और पुराणों का भरपूर ज्ञान होता है। वे छल-कपट, पाखण्ड और अहंकार से मुक्त होते हैं, वे पापके मार्ग पर स्वप्न में भी पैर नहीं रखते।
सन्त तुलसीने मानसके उत्तरकाण्डमें लिखा है-
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥
सन्त का संग भवबन्धन से मुक्त होने तथा कामी और पापी असन्त का संग जन्म और मृत्यु के बन्धन में बँधे रहने का मार्ग है। विद्वानों तथा वेद-पुराणादि ग्रन्थों का भी यही मत है। अब भरत ने श्रीराम से सन्त-महिमा सुनाने का आग्रह किया।
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई।
मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई ॥
संतन्ह कै महिमा रघुराई।
बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई ॥
हे रघुनाथजी, मैं आपके प्रति धृष्टता करते हुए वेद-पुराणों में वर्णित सन्तों की महिमा आपके श्रीमुख से सुनना चाहता हूँ। भरत की जिज्ञासा शान्त करते हुए प्रभु श्रीराम ने कहा, हे तात, अब मैं सन्तों के गुण और असन्तों के अवगुण विस्तार से तुम्हें बताता हूँ। उन्होंने कहा-
संत असंतन्हि कै असि करनी।
जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई।
निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥
बिषय अलंपट सील गुनाकर।
पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी।
लोभामरष हरष भय त्यागी ॥
सन्तों के लक्षण वेद और पुराणों में विस्तार से वर्णित किये गये हैं। सन्त और असन्त की परस्पर ऐसी करनी होती है, जैसे चन्दन और कुल्हाड़ी की होती है। कुल्हाड़ीरूपी असन्त चन्दन को काटते हैं, परंतु चन्दनरूपी सन्त उस कुल्हाड़ीरूपी खल को अपनी सुगन्ध से सुवासित कर देते हैं।
सन्तजन विषयों से दूर रहते हैं, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। वे पराये दुःख में दुःख और पराये सुख में सुख का अनुभव करते हैं। वे जगत्के सभी प्राणियों में समान भाव रखते हैं, शत्रुभाव को न जानते हैं और न पहचानते हैं। वे अहंकार से मुक्त और वैराग्य में लीन रहते हैं, ऐसे सन्त लोभ, हर्ष, क्रोध और भय का त्यागकर जीवन जीते हैं।
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर।
जानेहु तात संत संतत फुर ॥
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं।
परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥
हे तात ! ये सब लक्षण जिस मनुष्य में दिखायी देते हैं, वही सच्चा सन्त होता है।
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ।
भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई।
जिमि कपिलहि घालइ हरहाई ॥
खलन्ह हृदयं अति ताप बिसेषी।
जरहिं सदा पर संपति देखी ॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई।
हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
काम क्रोध मद लोभ परायन ।
निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥
बयरु अकारन सब काहू सों।
जो कर हित अनहित ताहू सों ॥
अब असन्तों के स्वभाव सुनो।
जाने-अनजाने कभी भी ऐसे जीवों की संगति नहीं करनी चाहिये। इनका संग सदैव दुःखदायी होता है। दुष्ट प्रवृत्ति के लोग परायी सम्पत्ति देखकर ईर्ष्या से जलते रहते हैं, दूसरों की निन्दा सुनने में हर्ष का अनुभव करते हैं, मानो उन्हें कोई अनचाही निधि मिल गयी हो। ऐसे लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह और मदके वशीभूत होकर सदा पापपूर्ण कृत्यों में लीन रहते हैं, वे अकारण ही किसीसे भी वैर ठान लेते हैं। भलाई करने वाले के साथ ऐसे लोग बुराई ही करते हैं।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन।
सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न ॥
काहू की जौं सुनहि बड़ाई।
स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं।
आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा।
संत संग हरि कथा न भावा ॥
जो जन परायी स्त्री, पराये धन और परायी निन्दा में आसक्त रहते हैं, ऐसे पापी मनुष्य नररूप में राक्षस ही होते हैं। वे सदा लोभ के वशीभूत होकर ही अपने कार्य करते हैं। वे पशुओं के समान खाने-पीने और मैथुन में लीन रहते हैं। इन्हें मृत्यु का भी भय नहीं लगता। ऐसे दुष्टजन माता, पिता, गुरु और ब्राह्मणों का भी सम्मान नहीं करते। इन्हें संस्कारित जनों का संग भी अच्छा नहीं लगता।
अवगुन सिंधु मंदमति कामी।
बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा।
दंभ कपट जियँ धरे सुबेषा ॥
ऐसे पापीजन अवगुणों के समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी, वेदोंकी निन्दा करने वाले और पराये धनको हड़पने वाले होते हैं, वे लोग सत्पुरुषों से द्रोह करने में कभी भी नहीं चूकते। छल और कपटसे भरे हृदय वाले ऐसे नीच लोग सुन्दर और आकर्षक वेष धारण किये रहते हैं।
सन्त तुलसी कहते हैं, हे देवभूमि भारत के निवासियों, मैंने तुम्हें भगवान् श्रीराम के माध्यम से सन्तों और असन्तों के गुण और दोषों से अवगत कराने का प्रयास किया है। प्रभु ने अपने श्रीमुख से ऐसा भी कहा है –
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥
दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने से बड़ा कोई पाप नहीं है।
इस प्रकार भगवान्ने मोक्ष प्राप्ति के लिये भी मार्गदर्शन किया है और घोर नरक का कष्ट झेलने का भी मार्ग बताया है। एक ओर सन्त और दूसरी ओर असन्त। आप किसे अपनाते हैं, निर्णय आपके विवेक पर निर्भर करता है।
