इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। भारतीय चिंतन परंपरा में दीपक केवल माटी, तेल और रुई की बत्ती का भौतिक जोड़ नहीं है। यह अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का आध्यात्मिक प्रतीक है। सनातन धर्म में संध्या काल की चौखट पर जब दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है, तो वाणी केवल एक ही मंत्र का उच्चारण करती है: “शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धि-विनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥” अर्थात, यह वंदना उस निराकार, सर्वव्यापी और अजन्मा परमब्रह्म की ज्योति को समर्पित है जो समूची सृष्टि का कल्याण करती है।
किंतु 17 सितंबर 2026 की शाम स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक अभूतपूर्व पतन के रूप में दर्ज हो गई। जो दीपक कभी देवालयों, तुलसी चौराहों और पितरों की स्मृति में जलाए जाते थे, वे आज जिलाधिकारियों, शिक्षा
अधिकारियों और बाल विकास निदेशालयों के तुगलकी फरमानों के तहत एक जीवित, नश्वर राजनेता की दीर्घायु और ‘आशीर्वाद’ के नाम पर सरकारी खर्चे से जलाए जा रहे हैं। यह महज किसी प्रधानमंत्री के प्रति पार्टी कार्यकर्ताओं का उल्लास नहीं है; यह एक संवैधानिक लोकतंत्र का उस मध्यकालीन सामंतवाद में रूपांतरण है जहाँ पूरी सरकारी मशीनरी को किसी एक व्यक्ति की ‘व्यक्ति-पूजा’ (Cult of Personality) का बंधक बना दिया गया है।
शास्त्रों की मर्यादा और भाषाई धृष्टता
जो राजनीतिक तंत्र खुद को सनातन धर्म का स्वयंभू ध्वजवाहक बताता है, उसने सनातन के मूलभूत आचार-संहिता को ही ताक पर रख दिया है। स्कंद पुराण के ‘कार्तिक मास महात्म्य’ और पद्म पुराण के उत्तर खंड में दीपदान की विशद मीमांसा है। दीपदान केवल और केवल भगवान विष्णु, शिव, देवालय, नदी तट या आकाशदीप के रूप में धर्मार्थ अर्पित होता है। अग्नि साक्षात देवता हैं और दीप को ज्ञान-ज्योति का रूप मानकर केवल ईश्वर को समर्पित किया जाता है। सनातन परंपरा में किसी जीवित, नश्वर मनुष्य के नाम पर दीप जलाना या उसकी आरती उतारना सर्वथा वर्जित और शास्त्रों की मर्यादा के विरुद्ध माना गया है।
अखबारों के पहले पन्नों पर जनता के टैक्स के पैसों से छपे पूरे-पूरे पन्ने के सरकारी विज्ञापनों को देखिए। नारा गढ़ा गया है— “जिसने जीवन संवारा, उसे नमन हमारा” और अभियान का नाम रखा गया है— ‘आशीर्वाद का दीया’। भारतीय संस्कृति में आशीर्वाद हमेशा श्रेष्ठ, ज्येष्ठ और ईश्वर द्वारा अनुज या प्रजा को दिया जाता है। यहाँ भाषा को उलटकर नागरिक को यह अहसास कराया जा रहा है कि उसका जीवन, उसकी सांसें और उसकी थाली की रोटी किसी शासक की खैरात है, और बदले में वह दीप जलाकर नमन करे। यह लोकतंत्र के ‘प्रधान सेवक’ की भाषा नहीं, बल्कि प्रजा को अपनी औकात याद दिलाने वाले किसी निरंकुश सुल्तान का मिजाज है।

कुपोषण के शिकार बच्चे और ‘पीआर’ की भूख
इस व्यक्ति-केंद्रित उत्सव का सबसे घिनौना चेहरा देश के उन आंगनबाड़ी केंद्रों में दिखा, जो भारत के सबसे गरीब और कुपोषित बच्चों के लिए जीवन-रेखा हैं। उत्तराखंड से लेकर देश के कई राज्यों में बाल विकास विभागों द्वारा जारी आदेशों का मजमून रोंगटे खड़े करने वाला है। आदेश दिया गया कि प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर बच्चों को ताजा पका भोजन (HCM) खिलाया जाए, शत-प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराई जाए, पोषण ट्रैकर ऐप पर लोकेशन-टैग्ड फोटो अपलोड किए जाएं और शाम को आंगनबाड़ी में दीप जलाए जाएं।

यह आदेश स्वयं में इस बात का कबूलनामा है कि बाकी के 364 दिन इन बच्चों को न ताजा भोजन मिलता है और न शत-प्रतिशत उपस्थिति होती है। क्या देश के नौनिहालों का पोषण किसी नेता के जन्मदिन के ‘इवेंट’ का मोहताज है? जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं चार-छह हजार के अल्प मानदेय के लिए सड़कों पर लाठियां खाती हैं, उन्हें हुक्म दिया गया कि वे ड्रेस कोड में रहें, जनप्रतिनिधियों का स्वागत करें और दीप जलाकर सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करें। बच्चों की भूख और कुपोषण को सत्ता के लिए पीआर सामग्री में तब्दील कर देना अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
शिक्षकों का अपमान और ‘डिजिटल चाटुकारिता’
शिक्षा तंत्र की स्थिति इससे भी अधिक दयनीय बना दी गई है। बिहार के जहानाबाद जिले के जिला शिक्षा पदाधिकारी द्वारा जारी आधिकारिक ज्ञापांक-2076 इस व्यवस्था के मानसिक दिवालियापन का खुला दस्तावेज है। आदेश दिया गया कि सभी शिक्षक और प्राचार्य संध्या 6:30 बजे स्कूल में एकत्र हों, 7:15 बजे कम से कम 100 दीये जलाएं, और उसका वीडियो, फोटो व ‘रील’ बनाकर व्हाट्सएप ग्रुप में भेजें ताकि जिला स्तर पर प्रदर्शनी बनाई जा सके। साथ ही चेतावनी दी गई कि ‘लापरवाही अवांछनीय होगी’।

जिस मुल्क में हज़ारों प्राथमिक विद्यालय बुनियादी सुविधाओं, ब्लैकबोर्ड और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, वहाँ शिक्षकों की योग्यता अब इस बात से तय होगी कि वे शाम को 100 दीये गिनकर कैसी ‘रील’ बनाते हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ाने वाली महिला शिक्षिकाओं को शाम 7:30 बजे तक रुकने पर मजबूर किया गया। अंधेरे रास्तों पर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या वातानुकूलित कमरों में बैठकर फरमान जारी करने वाले नौकरशाहों ने एक पल के लिए भी उन महिला कर्मियों के जोखिम के बारे में सोचा? भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और शिक्षा महकमे को बच्चों के भविष्य संवारने के काम से हटाकर एक राजनीतिक दल का ‘इवेंट मैनेजर’ बना दिया गया है।
‘तेल की बचत’ का उपदेश और 25 करोड़ दीयों का पाखंड
इस पूरे तमाशे का आर्थिक पाखंड भी कम चौंकाने वाला नहीं है। कुछ ही समय पहले इसी देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जनता को नसीहत दी थी कि खाद्य तेलों के आयात पर देश की भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है, इसलिए तेल की खपत कम करना ‘देशभक्ति’ है।
नागरिकों को देशभक्ति के नाम पर अपनी रसोई में तेल की एक-एक बूंद बचाने का ज्ञान देने वाली सत्ता जब अपने ही जन्मदिन पर राष्ट्रीय स्तर पर 25 करोड़ और बिहार में 2.50 करोड़ दीये जलाने का लक्ष्य तय करती है, तो वह ज्ञान कहाँ चला जाता है? उज्जैन के क्षिप्रा तट पर सरकारी खजाने से 25 लाख दीये एक शाम में फूंक दिए गए। लाखों लीटर तेल, जिसे गरीब परिवारों के चूल्हों तक पहुंचना चाहिए था, वह सिर्फ एक व्यक्ति की राजनीतिक आभा चमकाने के लिए धुएं में उड़ा दिया गया। एक तरफ 160-180 रुपये लीटर तेल खरीदती आम जनता महंगाई से त्रस्त है, और दूसरी तरफ सरकारी फरमानों से तेल बहाया जा रहा है। क्या यही है ‘न्यूनतम सरकार और अधिकतम सुशासन’?

लोकतंत्र बनाम अधिनायकवादी भक्ति
जब किसी राजनीतिक दल का निजी प्रचार कार्यक्रम जिलाधिकारियों, खंड विकास अधिकारियों और प्रिंसिपलों के हस्ताक्षरित सर्कुलरों के जरिए अनिवार्य कर दिया जाए, तो यह स्पष्ट संकेत है कि ‘पार्टी’ और ‘राज्य’ (Party and State) के बीच की संवैधानिक लक्ष्मण रेखा पूरी तरह मिटा दी गई है। यह वही मॉडल है जो कम्युनिस्ट और फासीवादी मुल्कों में देखा जाता रहा है, जहाँ राज्य की पूरी मशीनरी केवल सर्वोच्च नेता की जय-जयकार के लिए इस्तेमाल होती है।
25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ठीक इसी खतरे के प्रति आगाह किया था। उन्होंने कहा था कि “धर्म के क्षेत्र में भक्ति भले मुक्ति का मार्ग हो, लेकिन राजनीति में भक्ति या व्यक्ति-पूजा सीधे-सीधे पतन और अंततः तानाशाही का निश्चित रास्ता है।”
आज जब फाइलों के खौफ से दीये जलवाए जा रहे हैं और आदेश न मानने पर निलंबन की तलवार लटकाई जा रही है, तो यह मान लेना चाहिए कि यह उजाला किसी उत्सव का नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं के जलकर राख होने का धुआं है। देश को आज किसी जीवित नेता के नाम पर जलने वाले 25 करोड़ दीयों की नहीं, बल्कि उन सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में जलने वाली ज्ञान व सेवा की उस लौ की जरूरत है, जिसे सत्ता की इस आत्ममुग्धता ने बुझा कर रख दिया है।

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बहुत ही शानदार शोध पूर्ण विश्लेषण।
Wow. Hiranyakashipu at his best! “Don’t do what I do; do what I tell you to.”
Sandeepji, you stated the facts about every aspect of Sanatan Dharma, as well as his so-called guru, Amlekar!
Kaalnemi is doing worse things every day, but we Sanatani Indians know that no matter how dark the night is, when the first ray of Dharma’s Sun appears, all these Asuric Shaktis (demons) will be destroyed.
Vande Vishnu.